अधूरी मुलाकात... - 3 Sonali Rawat द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी मुलाकात... - 3


राजीव ने मुस्कुराते हुए उसकी ओर देखकर, जवाब का इंतजार किया और अर्चना अपने दिमाग पर जोर देते हुए कुछ भुले-बिसरे शब्द अपने होंठो पर जुटा ही रही थी कि राजीव बोल पड़ा,” बारिश की हर एक बूंद का स्वाद चखना है, मुझको । कुछ यूं भीगना है आज मुझे कि…”

तभी अर्चना ने आखिरी वाक्य को खत्म करते हुए कहा, ” अपने तन से घुलकर, रुह मे मिल जाऊं कही, ” ।

राजीव का चेहरा दमक उठा पर वही अर्चना शायद अपने बीते कल में ही कही ठहर गई कि उसकी नजरें गुमराह हो चली ।

”हैरानी होती है मुझे, कि आज तुम उसी बारिश की बूंदो से दूर भाग रही हो” राजीव ने उसका ध्यान भंग करते हुए कहा ।

” वक्त हमेशा एक सा नही रहता और न ही हम, और हो सकता है कि आज उसकी कोई मजबूरी हो जिसकी वजह से वो इस बरसात का सामना नही कर सकती”

”भला ऐसी क्या मजबूरी आ पड़ी उस पर, मैं भी तो जानू ”

इस पर अर्चना ने लफ्जो की जगह सिर्फ अपनी मुस्कान से जवाब दिया । कुछ तो छिपा था उस मुस्कान के पीछे जिसे राजीव भांप नही पाया ।

” मेरी बाते याद है तुम्हे पर क्या मैं याद रही तुम्हे इतने सालो में ?”

” ये सवाल तो मै भी तुमसे कर सकता हूं न ?”

”हां, पर पूछा तो पहले मैनें है ”

”तो ?”

”तो जवाब जानने का हक मेरा ज्यादा बनता है”

इस पर राजीव अपने माथे पर अंगुलियां फिराने लगा । वो जानता था कि बहस में उससे जीतना लगभग नामुमकिन था और कुछ खामोश पलो का सहारा लेते हुए उसने कहा, ” किसी की याद आने के लिए पहले उस शख्स का भुलाया जाना जरुरी होता है और तुम तो मेरी यादों से कही गई ही नहीं थी कभी । तुम मुझे हमेशा मिलती रही जब ऐसी ही बरसात में किसी अजनबी को मुस्कुराता हुआ पाया । मेरी कहानियों के किरदारो में भी तुम हमेशा नाम बदलकर आ जाया करती थी । यूं ही कभी राह चलते, कई सफरों में अक्सर कोई ऐसा शख्स हमेशा मिल जाता था जिसमे मुझे तुम्हारी झलक मिला करती थी । इतने सालों के दरम्यान, मै ऐसे ही टुकड़ो मे तुमसे मिलता हुआ आया हूं कि तुम्हें भुलाने की कोशिश करने की फुर्सत भी तुम्हारी यादों ने नहीं दी, मुझे । मैं भला, कैसे भुला सकता था उस शख्स को जिसने मेरे नोटबुक के पिछले पन्नो पर लिखी कहानियों पर विश्वास करके मुझे ये यकीन दिलाया था कि मैं एक राइटर बन सकता हूं ”।

बाहर रिमझिम की फुहारें तेज़ हो चली थी । शीशों से झांकती बाहर की दुनिया पल-पल उन फुहारो में खोती जा रही थी और वही उन शीशो के परे, टेबल पर बैठे दो शख्स भी पुरानी यादों की लहरों में उलझते जा रहे थे । अर्चना, राजीव के जवाब में कुछ ऐसे उलझी कि वो शब्द भुला बैठी और परेशान सी, अपनी जगह बैठी रह गई । कॉफी से निकलता धुआं अब ठंड़ा पड़ने लगा था पर अब उसका ध्यान कॉफी पर था भी नहीं ।

” मै जानता हूं कि मैने ही हमारे रिश्ते को खत्म किया था पर सच तो ये है कि तुम्हें भूलने की मैने जितनी बार कोशिश की है, न जाने क्यों मैने तुम्हे उतना ही खुद के करीब पाया है । वक्त के साथ बढ़कर मैने वो सब हासिल किया जिसकी तमन्ना पाले तुमसे दूर हुआ था पर आज तुम्हे पास देखकर, मन फिर से उन बीते पलों में लौट जाने का कर रहा है जहां हम अजनबी थे और वहां तुमसे मिलकर फिर से एक नई शुरुआत करने का दिल चाहता है ”। अपनी बात खत्म कर, राजीव एकटक उसे देखता रह गया ।

अर्चना उसका जवाब जानकर अचरच हो गई और आंखो में हैरानी लिए वो राजीव को देखती रह गई । दोनों की नजरें आपस में न जाने कैसी गुफ्तगू में व्यस्त हो चली कि खामोशी का साया उन दोनो के बीच पसर गया । तभी अर्चना ने अपनी नजरें झुकाई और कहा,” बातो में उलझाना तुम्हे बेहतर आता है । आखिर तुम एक राइटर जो ठहरे, पर इंसानी जज्बातो को समझना उतना आसान नहीं होता जितना कि कहानी के किरदारों का होता है ”।

अपनी बात कहकर, अर्चना ने अपने बाएं हाथ की अनामिका अंगुली पर चढ़ी अंगुठी राजीव को दिखाई और कहा, ” तुम्हें नहीं लगता कि शायद बीते कल में लौटने के लिए अब काफी देर हो चुकी है ”।

उस अंगुठी को देख राजीव की दौड़ती धड़कनो को अचानक एक गहरा धक्का सा लगा । उसकी सुनहरे रंग से सनी वो अंगुठी राजीव की आंखो को चुभती सी लगी जिसे वो ज्यादा पल देख नहीं पाया और नजरें फेर, होंठो पर मुस्कान का मुखौटा चढ़ा लिया ।

” और मैं कितना अजीब हूं,” राजीव ने बारिश की बरसती बूंदो को कुछ पल निहारा और फिर वापस अर्चना की ओर लौटते हुए बोला,” अपनी कॉफी के कप को जानबूझकर खत्म नहीं कर रहा था, ताकि इसके बहाने तुम्हें कुछ पल ओर थाम सकूं पर भूल गया था कि वक्त को तो कोई थाम ही नहीं सकता ”।

इतना कहकर वो अपने कॉफी के कप को सहलाने लगा । उसकी अंगुलियों के स्पर्श से स्पष्ट था कि वो कप भी अब ठंडा हो चला था । उसे अभी-अभी ये एहसास हुआ कि वो अर्चना के लिए जो महसूस करता है, उसे वो शब्दो में समेट नहीं सकता और वो ऐसा अगर कर भी लेता तो भी बहुत देर हो चुकी थी । बस, यही एहसास उसके दिल को कचोटने के लिए काफी था । वो मुस्कुरा तो जरुर रहा था पर अर्चना भी उसकी मुस्कान में छिपी उस चुभन को महसूस कर सकती थी जिसे वो अपने दिल में छिपाए बैठा था ।

” मैं और अर्जुन आज मिलने वाले थे” अर्चना ने अपनी अंगुठी को छुआ और कहा,” पर बारिश की वजह से यहां मजबूरन रुकना पड़ा । मुझे क्या पता था कि तुम भी आज इसी कॉफी शॉप में मिलोगे” ।

” इत्तेफाक ” राजीव ने थके स्वर में कहा, ” उतनी भी अच्छी चीज़ नहीं है जितना कि हम समझते हैं । पर वो कहते हैं न, अक्सर खूबसूरत कहानियों की शुरुआत लाईब्ररी में होती है और अंत किसी कॉफी शॉप पर । शायद हमारी कहानी भी कुछ ऐसी ही थी ” ।

राजीव ने कॉफी का कप होंठो से लगाया और उसे एक झटके में खत्म कर गया । अपनी दबी मुस्कान लिए वो खुद पर ही हंस पड़ा । उसके हालातों ने कैसा मजाक खेला था उसके साथ कि वो ठीक से खुद पर हंस भी नहीं पाया । आज उसके होंठो को पता चला कि मुस्कुराहटों का भी कोई बोझ होता है जो उन्हे कभी-कभी हालातों के चलते उठाना पड़ जाता है ।

चंद पलो की खामोशी में जहां अर्चना ने भी अपनी कॉफी खत्म की, वही बारिश भी अपनी साजिश में नाकामयाब होकर थमने लगी ।

बरसात को रुकता देख, अर्चना ने कहा, ” मुझे अब चलना चाहिए । क्या पता ये बरसात फिर कहीं शुरु न हो जाएं ”।

”हम्म”

”तुम्हारी नई किताब का इंतजार करुंगी” अर्चना ने कुर्सी से उठते हुए कहा ।

राजीव के मन ने उसे रोकना तो खूब चाहा पर वो उसे क्या कहकर रोके, ये वो कोशिश करके भी सोच नहीं पाया । शायद ऐसे लफ्ज़ बने ही नहीं थे जो किस्मत की लकीरों को बदल सकते । मजबूरन, राजीव को हार माननी पड़ी और वो खामोश अपनी कुर्सी पर बैठा रह गया । अर्चना ने एक मुस्कान भरी नजरों से उसे अलविदा कहा और मुड़ गई ।

तभी कुछ पल दूर जाने के बाद, दरवाजे पर अर्चना के बढ़ते कदम अचानक थम गए । शायद कुछ भूल गई थी वो या फिर किसी बात ने उसे उलझा दिया था । दरवाजे के हैंडल को थाम, वो वहीं खड़ी रह गई ।

उसे यूं खड़ा देख, राजीव उठने को हुआ ही था कि अर्चना ने भी उसकी ओर अपनी निगाहें कर दी और फिर उसने कहा, ” तुम गलत हो राजीव । हो सकता है कि हमारी कहानी अभी खत्म नहीं हुई ”।

कुर्सी पर बैठा राजीव हैरानी से उसे ताकता रह गया ।

” वो कहते है न, ” अर्चना ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, ” जिदंगी उस किताब की तरह है जिसके पन्ने सिर्फ वक्त पलट सकता है, हम नहीं । हो सकता है , शायद हम भी उन पन्नो की बिसात पर दोबारा मिल जाएं कहीं ” ।