खाली हाथ - भाग 7 Ratna Pandey द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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खाली हाथ - भाग 7

अर्पिता के उल्टी करने से अरुण घबरा गया और उसने तुरंत डॉक्टर को फ़ोन लगा कर बुलाया। तब पता चला कि अर्पिता माँ बनने वाली है। अरुण अब उसे इस परिस्थिति में और कुछ भी नहीं कह सकता था। बल्कि उसे अब डॉक्टर के कहे मुताबिक अर्पिता का ख़्याल रखना था। उस रात, रात भर अरुण बिस्तर पर करवटें बदल-बदल कर सुबह का इंतज़ार करता रहा ताकि सुबह होते से वह अपने माता-पिता को ढूँढने निकल जाए।

उधर सूरज और नताशा के घर छोड़ कर जाने की ख़बर आग की लपट की तरह फैल गई। इस ख़बर ने अर्पिता के घर पर भी दस्तक दे दी। अर्पिता के माता-पिता अपनी बेटी की इस हरकत से शर्मिंदा थे, वे उससे नाराज थे।

तभी उसके पापा का फ़ोन आया, "हेलो अर्पिता"

"हेलो पापा"

"अर्पिता तुमने यह क्या कर डाला, मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं थी।"

तभी उसकी मम्मी ने फ़ोन लेते हुए कहा, "तुम्हें अपनी बेटी कहने में भी हमें शर्म आ रही है। धिक्कार है तुम पर। तुम्हें ऐसे संस्कार तो नहीं दिए थे हमने। तूने कहाँ से भर लिया अपने मन में इतना ज़हर कि परिवार ही तोड़ डाला छीः," कहते हुए उन्होंने फ़ोन काट दिया।

अर्पिता रोने के सिवाय कर भी क्या सकती थी।

दूसरे दिन सुबह होते ही अरुण ने सारे रिश्तेदारों से फ़ोन करके अपने माँ-पापा के बारे में पूछा। कहीं से कुछ भी पता नहीं चलने के बाद उसने शहर के वृद्धाश्रमों की तरफ़ रुख किया। दो-तीन वृद्धाश्रम देखने के बाद वह 'आसरा' वृद्धाश्रम पहुँचा। अनुमति लेने के बाद वह उस बगीचे में पहुँचा, जहाँ उसके माँ-पापा टहल रहे थे। वहाँ सूरज और नताशा को देखकर वह दौड़ कर उनके पास गया और नताशा के गले लग कर रोने लगा।

रोते हुए उसने कहा, "माँ-पापा घर चलो, यह क्या किया आप लोगों ने? वह घर आपका है, मैं भी तो आपका ही हूँ। आप मुझे छोड़ कर कैसे यहाँ रह सकते हो।"

"नहीं बेटा तुम्हें छोड़ा कहाँ है, तुम तो हर वक़्त हमारे दिल के करीब ही रहते हो। तुम्हारे सिवाय हमारा इस दुनिया में है ही कौन," अपनी आँखों से आँसू पोंछते हुए नताशा ने कहा।

सूरज ने कहा, "बेटा हम सभी की भलाई इसी में है और हम दोनों यहाँ बहुत ख़ुश हैं। कोई दुख तकलीफ कुछ भी नहीं है। वहाँ अर्पिता भी ख़ुश होगी। सुकून के साथ रह सकेगी।"

"नहीं पापा मैं कुछ नहीं जानता आपको मेरे साथ अभी इसी वक़्त घर चलना पड़ेगा।"

"नहीं अरुण अब हम वापस नहीं लोटेंगे, तुम जाओ। आते रहना, मिलते रहना और ख़ुश रहना। अर्पिता को भी ख़ुश रखना। शायद भगवान को यही मंजूर था और भाग्य में भी ये ही लिखा था।"

अरुण ने बहुत समझाया, उसके बहुत ज़िद करने पर सूरज के मुँह से अंततः निकल ही गया, "बेटा मैं नताशा का दिन-रात होता हुआ अपमान नहीं देख सकता। उसने बहुत कोशिश की किंतु सब कुछ ठीक नहीं कर पाई, वह हार गई अरुण," कहते हुए सूरज की आँखों से भी पानी बह निकला।

अरुण उदास होकर खाली हाथ घर लौट गया। अर्पिता के ऊपर उसे बहुत गुस्सा था लेकिन उसके प्रेगनेंट होने के कारण वह उसे कुछ भी ना कह सका।

अर्पिता को वह बहुत ज़्यादा प्यार करता था लेकिन उसकी इस हरकत ने अरुण का दिल तोड़ दिया था। अब उसके दिल में अर्पिता के लिए ना ही वह सम्मान था और ना ही उतना प्यार। यदि कुछ था तो वह था समझौता ताकि उनकी आने वाली संतान को माता पिता दोनों का प्यार मिल सके।

 

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः