मीत (भाग-५) - अंतिम भाग Vaidehi Vaishnav द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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मीत (भाग-५) - अंतिम भाग

अब तक आपने पढ़ा - मीत को लेकर प्रिया असमंजस की स्थिति में है।

अब आगे...

मैं आज की पीढ़ी के अनुसार बोरिंग हो सकती हूँ पर हम दोनों जब भी साथ रहें ज़िन्दगी खुशनुमा सी लगीं । पर अब मीत के लिए मेरी भावना बदल रहीं हैं..बदलतीं भावनाओं के बावजूद मन अब भी मीत से बंधा हुआ था। मीत हर बात में अच्छा था.. शायद मैं ही समझ नहीं पाई उसकी बात को। मन अब भी मीत की पैरवी कर रहा था।

मैंने अलमारी से हरे रंग की ड्रेस निकाली जो कपड़ो की तह में सबसे नीचे रखी हुई थीं । जबसे मीत मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बना तबसे ही मैं उसकी पसन्द नापसंद के अनुसार ही तैयार होतीं थीं। पर आज मैंने हरे रंग की ड्रेस पहनी ,, हरा रँग मीत को बिल्कुल पसन्द नहीं था।

मैं मीत का इंतजार करने लगीं । वह ठीक 11 बजे आया। जैसे ही मैंने दरवाजा खोला वह मुझें हरे रंग की ड्रेस में देखकर चौंक गया पर बोला कुछ नहीं। मुझें देखकर वो बोला - " सोई नहीं ना रातभर " मैंने कहा - "जल्दी ही सो गई थीं"। पर तुम्हारी आँखे तो कुछ औऱ ही बता रहीं हैं मैडम जी - वो मुस्कुराकर बोला।

चलों अब जल्दी से बाहर आओ डॉक्टर से अपॉइंटमेंट ले लिया हैं मैंने - कहते हुए मीत सीढ़ियों की औऱ जानें लगा। मैंने मीत को आवाज़ लगाई औऱ कहा मैं ठीक हुँ । क्या हम बैठकर बात कर सकतें हैं...? मीत ने मुझें इस तरह से देखा जैसे मेरे चेहरे को पढ़ रहा हो । वो चुपचाप बिना कुछ कहे चला आया औऱ सोफ़े पर बैठ गया ।

मैं समझ ही नहीं पा रहीं थीं कि कैसे अपनी बात को कहूं । मुझें चुप देखकर वह बोला - कुछ बोलोगी भीं ..क्या हुआ हैं तुम्हें .. ऑफिस नहीं आ रहीं औऱ ये ड्रेस ..?? मोबाईल भी स्विच् ऑफ़ करके रखतीं हों ..भले ही कोई परेशान होता रहें ।

मैंने धीरे से कहा - मीत ! हम...दोनों एकदूसरे के लिए नहीं बनें हैं..औऱ मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती ।

मेरी इस बात वह चुप रहा...लेकिन उसकी आंखों से आँसू छलक आए । उसने मेरे हाथ को थामते हुए कहा - साथ रहने के लिए प्यार जरूरी हैं ..
जो हम दोनों को एकदूसरे से बेशुमार हैं।

प्रिया ! हम इंसान बहुत डरपोक होते हैं….अपनों से दूर जानें का डर , अपनों को खो देने का डर ।पता नहीं औऱ भी कितने ही अनजान डर से हम अपनों को ही तकलीफ़ में डाल देते हैं… जैसे मैंने तुम्हें…” कहते-कहते मीत रुक गया । फिर कुछ पल बाद बोला -

“काश मैंने समझा होता तुम्हें ! तूमने खुलकर मुझे बताया होता, थोड़ा वक्त दिया होता मुझे…दूरी बना लेनेभर से क्या तुम मुझें भूल जाती..? बस इतनी सी बात नहीं कह सकी की मैं बिना शादी के साथ नहीं रहना चाहती ..

मैं तुम्हें खोंना नहीं चाहता हुँ , इसलिए हमेशा तुम्हें अपने पास अपने साथ रखना चाहता हुँ । जानता हुँ बिना शादी के साथ रहना तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा । समाज भी स्वीकार नहीं करेगा । लोग क्या कहेंगे जैसा सवाल तुम्हें परेशान कर रहा होगा..मैं भी नहीं चाहता कि तुम मेरी जिंदगी में राधा बनकर रहो , मैं हमेशा यही चाहता रहा की तुम रुक्मिणी बनकर मेरी ज़िंदगी में आओ ।

“मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा लेकिन तुम्हारी मुस्कुराहट के साथ! तूम वही चुनो जिसमें तुम्हारी ख़ुशी है…. समझी मेरी प्रिया !”

मीत से बात करने के बाद मुझें समझ आ गया था कि दुःख का बीज जो मेरे मन की मिट्टी में पनप रहा था वो अब प्रेम का विशाल वृक्ष बन गए हैं , जिसके तले मैं मीत के साथ आजीवन सुकून से रहूँगी ।

मैं मीत से कुछ भी नहीं बोल पाई, एक शब्द भी नहीं। बस मीत को देखती रहीं , औऱ मुस्कुरा दी । अरसे बाद दुःख की धूप मुस्कुराहट के बादलों ने ढक ली थी।

-----------------समाप्त--------------------

लेखिका - वैदेही वाटिका