इश्क़ ए बिस्मिल - 26 Tasneem Kauser द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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इश्क़ ए बिस्मिल - 26

“तुम क्या सच में पागल हो?” यह क्या खिला रही हो तूम उसे, तुम्हारा दिमाग तो ठीक है?.....वह बच्ची खाना नहीं चाह रही हैं ये।“ उमैर सच में हैरान रह गया था। दुसरी तरफ अरीज को आसिफ़ा बेगम की दी हुई धमकी याद आई थी। उमैर उसे ग़लत पे ग़लत समझे जा रहा था मगर वह अपनी सफाई में एक लफ़्ज़ भी नहीं कह सकती थी।
अरीज उमैर को कुछ नही कह सकती थी की वह ऐसा खाना अपनी छोटी बहन को क्यों खिला रही है, मगर ९ साल की अज़ीन को वाकई बोहत जोरों की भूक लगी थी और वह रो रोकर अपना मन मार कर आचार रोटी पानी में डुबो डुबो कर(ताकि सूखी रोटी हलक में फँसे नहीं) ₹खाने पर मजबूर हो गयी थी इसलिए उमैर के कहने पर अज़ीन को हिम्मत मिल गयी थी। उसकी नज़र में कल ही उमैर की अच्छाई सामने आ गयी थी। अरीज को डांटते ही अज़ीन दौड़ कर उमैर से जा कर लिपट गयी थी और ज़ोर ज़ोर से रो रो कर कहने लगी।
“भाईजान मुझे बोहत ज़ोर की भूक लगी है, मैंने सुबह भी कुछ नही खाया था। ये रोटी मेरे गले में फँस रही हैं, मुझे नहीं खाना ये।“ उमैर घुटनों के बल बैठ कर उसे अपने सीने से लगा कर रखे हुए था और साथ ही अरीज को खा जाने वाली नज़रों से घूरता रहा। अरीज को उसकी खतरनाक नजरें बर्दाश्त नहीं हो पा रही थी इसलिए उसने नज़रें चुरा ली थी।
उमैर को लग रहा था कि अरीज या तो psycho है या फिर बोहत बड़ी ड्रामेबाज़। इतनी बड़ी ड्रामेबाज़ के वह जाने क्या साबित करना चाह रही थी, वह रूखा फिका खा कर गुजरा कर रही है। वह इतनी अच्छी है के किसी भी चीज़ को हाथ नही लगा रही है, चाहे उसकी बहन भुक से रोती क्यों ना रहे। उसके नज़र में अरीज और एक लेवल नीचे उतर गई थी, अपनी वाह वाही के लिए उसे अपनी बहन की भी फ़िक्र नही थी और यूँ तो वह ऐसे साबित करती रहती है जैसे की अज़ीन में उसकी जान बस्ती है।
उमैर अरीज को घूरता हुआ अज़ीन को गोद में उठा कर कमरे से बाहर निकल गया था। नीचे डाइनिंग एरिया में आकर उसने नसीमा बुआ को आवाज़ लगाई थी।
“नसीमा बुआ... नसीमा बुआ.... जल्दी से खाने लिए कुछ अच्छा सा ले आयें।“ उमैर ने अज़ीन को चेयर पे बैठाते हुए कहाँ था।
नसीमा बुआ अपने बिल से निकल आई थी और अब बड़ी परेशान सी बड़ी गहरी कश्मकश में खड़ी सोच रही थी के क्या करे उमैर को क्या जवाब दे। वह घबराहट में चुपचाप अपनी उंगलियाँ मरोड़ रही थी। पहले ही अरीज से काम करवाने पर पानी फिर चुका था और अब इन दो बहनों को खाना ना देने की हुक्म पर आसिफ़ा बेगम की शान पर गुस्ताखी हो जायेगी।
“नसीमा बुआ मैं आप से कुछ कह रहा हूँ, बच्ची भूकी है, जल्दी से कुछ ले आयें। “ उमैर का दिमाग़ अरीज की वजह से पहले ही बोहत खराब था और अब नसीमा बुआ भी आग में घी डालने का काम कर रही थी।
“वो...वो बात ये है ना उमैर बाबा की लंच तो पुरा खतम हो गया। है।“ नसीमा ने बुआ लड़खाड़ाते हुए कहा था। वह परेशानी में अभी भी अपनी उंगलियाँ मरोड़ रही थी।
“तो कुछ और ले आए... मैंने लंच नही माँगा है आपसे... बस कुछ खाने के लिए माँगा है अच्छा सा जो बच्ची शौक से खा ले।“ वह खड़े खड़े आज नसीमा बुआ को आड़े हाथों ले रहा था।
“घर पे फिल्हाल ऐसा कुछ नही है उमैर बाबा... बनाना होगा और उसमे टाइम लगेगी। “ उमैर के तेवर से आज नसीमा बुआ भी घबरा रही थी। एक तरफ़ माँ कुआं बनी हुई थी तो दूसरी तरफ़ बेटा उसके लिए खाई बना बैठा था। वाह जाती तो आखिर कहाँ जाती, दोनों ही तरफ़ जान को खतरा था। उनके इस जवाब पर उमैर झल्ला गया था। पहले अरीज की हरकतें और अब नसीमा बुआ की बेतुकी जवाब।
“ये क्या कह रही है आप? घर पे क्या गिना और नापा हुआ खाना बनता है? और वैसे भी अज़ीन ने तो खाना ही नही खाया है... ना सुबह ना ही दोपहर में.... क्या इसके लिए खाना ही नही बना था?” उमैर को बोहत ज़्यादा गुस्सा आ गया था। वह अपनी हैरानी ज़ाहिर करते हुए बोल रहा था।
“बना था उमैर बाबा, मगर वो क्या है ना.... वो... वो आती है ना शकिला... वो सारा बचा हुआ खाना अपने घर ले कर चली गयी।“ आखिरकार नसीमा बुआ ने कुछ तो बहाना बना ही लिया था।
“प्लिज़ मेरा खून already बोहत खोल रहा है, ऐसी वैसी excuse देकर मेरा सब्र मत आज़माये। घर पे अगर कोई भूका है तो ये आपका काम है की उसे खिलाये अगर वो ना खाना चाहे तो उसके हिस्से का खाना रख दे या फिर घर पे कुछ रेडी टू ईट फूड हमेशा available होनी चाहिए और मेरे ख़्याल से इसे पहले हुआ भी करती थी, मगर पता नही आज क्या हो गया है। हाथ से घर ज़रूर गया है मगर यहाँ की चीजें नही गयी है... समझी आप?” वाह इतना कह कर रुका नही था। अज़ीन को गोद में वापस से उठा लिया था और किचन काउंटर के उपर रखे हुए फ्रूट bowl में से एक सेब उठा लिया था और अज़ीन को थमा दिया था। अज़ीन ने तुरंत सेब के साथ इंसाफ करना शुरू कर दिया था (खाना शुरू कर दिया था) उसके बाद उसका इरादा अज़ीन को लेकर बाहर जाने का था सो वह dining room से निकलता हुआ अब बाहर की तरफ़ आ गया था तभी अज़ीन ने उसे पूछा था।
“हम कहाँ जा रहे है? वही डॉक्टर के पास क्या?” अज़ीन डॉक्टर का सोच कर ही डर गयी थी।
“नहीं हम बाहर जा रहे है ताकि कुछ अच्छा सा खा सकें उसके बाद फिर देखा जायेगा के कहाँ जाना है। “ उमैर अज़ीन के डर को भाप गया था इसलिए डॉक्टर के पास जाने वाली बात को गोल कर दिया था।
“भाईजान” अज़ीन ने बोहत धीमे से कहा था।
“क्या हुआ” वह चलते चलते रुक गया था।
“आपी ने भी सुबह से कुछ नही खाया है। उनको भी साथ लेकर चलते हैं।“ उमैर अज़ीन को बिना कुछ कहे बस देखने लगा।
“आपी के बग़ैर मुझे कहीं भी नही जाना खाने के लिए। मैंने apple खा लिया है मेरा पेट भर गया है.... थैंक यू...।“ वह मायूस होकर बोल पड़ी थी। एक सेब से उसकी भूख थोड़ी देर के लिए शांत हुई थी मगर मिटी नहीं थी। कार में बैठ कर बाहर जाकर खाना उसे पसंद था। उमैर ने उसे एक सुनेहरा मौका दिया था मगर वह अपनी बड़ी बहन के लिए इस मौके को दिल पर पत्थर रख कर ठुकरा रही थी।
उमैर इस छोटी सी बच्ची की कुर्बानी पर हैरान रह गया था। उसकी बड़ी बहन उसे रूखा फिका खाना खिला रही थी और बदले में उसकी छोटी बहन अच्छे खानों को उसके लिए ठुकरा रही थी। उमैर कुछ देर यूँही अज़ीन को देखता रह गया फिर वह उल्टे पाँव चलता हुआ अपने कमरे की तरफ़ बढ़ा था। यह देख अज़ीन का चेहरा खुशी से चमक उठा था।
ज़िंदगी में ज़रूरी नहीं की बड़ी बड़ी ही क़ुर्बानियाँ किसी को ख़ुशी या किसी का भला कर सकती है। कभी कभी छोटी छोटी क़ुर्बानियाँ ही मोहब्बत को सही तरीके से दर्शाती है,
और मोहब्बत?
मोहब्बत तो ज़िंदगी के लिए बोहत ज़रूरी शय है। मोहब्बत दिलों को नर्म बनाती है। मोहब्बत हो तो पत्थरों में भी फूल खिल सकते है, मोहब्बत हो तो पहाड़ों और चटनों को भी गिराया जा सकता है। मोहब्बत की बुनियाद पर ही ये दुनिया बनाई गई थी। ये ना हो तो ज़िंदगी बेमायने है। मोहब्बत सिर्फ़ वो नहीं होती जो दो लोवर्स के बीच हो। मोहब्बत किसी को भी किसी से भी हो सकती है।
जैसे अरीज को अज़ीन से है और अज़ीन को अरीज से।
क्या होगा इन दोनों बहनों की आपस की मोहब्बत का?
कौन कितनी क़ुर्बानियाँ देगा ज़िंदगी में एक दूसरे के लिए?