इश्क़ ए बिस्मिल - 14 Tasneem Kauser द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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इश्क़ ए बिस्मिल - 14

यूं तो जि़न्दगी के मेले है.....
फिर भी यहॉ हम सब अकेले है....
मेहफ़िलों में तन्हाई है....
यूं तो रौनकों के रेले है....
दर्द किसी का ले सकते नही....
ख़ुद ही अपनों ने झेले है....
सफ़र होता तमाम नही....
मन्जि़लों के झमेले है....
काश के ख़्वाहिशों पे लगाम होता....
हसरतों ने अज़ाब उन्डेले है।

उस लिफ़ाफे के देने के ठीक दो दिन बाद इन्शा जो रात में सोई तो फिर उसकी कभी सुबह नहीं हुई।

वह अरीज और अज़ीन को तन्हा छोड़ कर चली गई थी। कितना मुश्किल होता है ज़िन्दगी मां बाप के बग़ैर गुज़ारना। मां-बाप का साया औलाद को बेफ़िक्र बनाता है, एक ग़ुरूर बख़्शता है, निडर बनाता है। अगर मां-बाप अपाहिज हों तो भी आपको दुआ देने के काम आते हैं। उनका साया ही रहमत का बाइस होता है।

जाने कितनी सारी आफ़त मुसीबत हम से होकर कट जाती है सिर्फ़ और सिर्फ़ मां बाप की दुआओं के बदौलत। मगर अब अरीज और अज़ीन मां और बाप जैसी नेमतों से दूर हो गई थी।

उनकी मां उन्हें कैसे इस तरह छोड़ कर जा सकती थी? क्या वह नहीं जानती थी की यह दुनिया कितनी ज़ालिम है? यहां इन्सानों के रूप में दरिन्दे फिरते हैं, उस जैसी जाने कितनों को चीर फाड़ कर खा जाते हैं। फिर वह उन दोनों को रोता बिलखता क्यों छोड़ कर चली गई?

बाप के दुनिया से जाते ही सोलहा साल की अरीज बड़ी हो गई थी लेकिन मां के जाने के बाद अठारह साल में ही वह जैसे बूढ़ी हो गई थी। उसके हाथ पांव में जैसे अब ताक़त ही नहीं रही थी, इतना कमज़ोर उसने खुद को कभी महसूस नहीं किया था लेकिन आज जैसे वह हार गयी थी।

अरीज को हैरानी हुई थी, सुबह के दस बज रहे थे और अभी तक उसकी मां जागी नहीं थी, वह उसे उठाने गई थी उसकी मां इन्शा बेसूद बिस्तर पर पड़ी थी, उसे एक डर ने अपने लपेटे में ले लिया, उसने कांपती हाथों से मां के हाथ को छुआ और एक दर्द भरी चीख उसके मुंह से निकल गई। उसकी मां बर्फ़ की मुजस्सिमा (मुर्ती) बन गई थी, बर्फ़ की तरह ठंडी पड़ी हुई थी।

वह उनके सीने पर सर रख कर दहाड़े मार मारकर रो रही थी, अब उसे मां से लिपट कर रोने का मौका कभी नहीं मिलेगा, उसके आंसू पोंछता मां का आंचल अब नहीं मिलेगा, अब वह कभी सुकून से सो नहीं पाएगी। अरीज के रोने की आवाज़ से अड़ोस-पड़ोस के लोग उसके घर में जमा हो गए थे। छोटी सी अज़ीन भी मां से लिपट कर रो रही थी।

ज़ुहर की नमाज़ के बाद इन्शा को दफ़ना दिया गया था, वह ढेरों मिट्टी के नीचे चली गई थी, तन तन्हा सिर्फ़ अपने आमाल (करनी) के साथ।

अड़ोस-पड़ोस का दिया हुआ खाना घर में काफ़ी जमा हो गया था लेकिन उसके हलक से एक निवाला भी नहीं उतरा, उसने अज़ीन को खिला दिया और खुद ख़्यालों में खोई रही। मां बाबा के साथ गुज़ारे अच्छे पल अब सिर्फ़ यादों का हिस्सा था। अठारह साल बहुत ज़्यादा तो नहीं होते इस तरह की आज़माइशों के लिए। अठारह साल की उम्र में उसने क्या कुछ नहीं देख लिया था और ना जाने आगे क्या कुछ देखना बाकी था।

दुसरे दिन उसे लिफ़ाफे का याद आया, उसने लिफ़ाफे को हाथ में लेकर कुछ देर सोचा, एक बार दिल ने कहा कि खोलकर देख ले फिर दूसरा ख़्याल यह आया कि यह उसकी मां का आख़री हुक़्म था उसने उसे पोस्ट करने के लिए कहा था अगर यह उसके देखने वाली चीज़ होती तब वह लिफ़ाफे को सील ना करती। अरीज ने अपनी मां की अमानत को बिना खोले उनकी बात को मानते हुए उसे डाक घर में लगा दिया था।

लिफ़ाफे को डाक में लगाने के तीसरे दिन उसकी चौखट पर एक १३-१४ साल का बच्चा एक आदमी को लेकर आया और बोला " यह है अरीज मिस का घर।" वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी इसलिए ज़्यादातर बच्चे उसे अरीज मिस कहा करते थे।

उस आदमी ने बन्द दरवाज़े को खटखटाया, दोपहर के १ बज रहे थे अरीज ने सोचा कोई फिर जानने वाला उसे उसकी मां की मौत के सबब हमदर्दी देने आया हैं। वह ऐसे लोगों से मिल मिल कर थक चुकी थी। इस दुनिया ने हर मौके पर अलग अलग तरह की रस्म बना कर रखी है। पैदाइश, शादी, मौत और ना जाने क्या क्या, सब चीजों के लिए अलग अलग रस्म है। लोग आते और हमदर्दी के दो बोल थमाकर चले जाते या यूं कहें ज़ख़्मो पर जमती सूखी परत को उधेड़ कर चले जाते।

अरीज ने दरवाज़ा खोला था सामने लगभग 49-50 की उम्र का एक आदमी खड़ा था, उनकी शख्सियत काफ़ी शानदार थी, वह काफ़ी अमीर दिख रहे थे, उन्हें देख कर लग रहा था जवानी में बहुत ख़ूबसूरत रहे होंगे जैसे उसके बाबा इब्राहिम ख़ान। उन्हें देखते ही उसे अपने बाबा याद आ गये थे और साथ में हैरानी भी हुई थी कि इतने अमीर दिखने वाले आदमी को उस से क्या काम था? थोड़ी दूरी पर उनकी चमचमाती गाड़ी खड़ी थी जिसे वहां के बच्चों ने घेर रखा था, उन्हें देखने आस पड़ोस की औरतें अपने घर के दरवाज़े पर खड़ी हो गई थी। वह सब भी जानना चाहते थे कि वह कौन है और क्यों आऐं हैं।

"आप कौन?"

वह आदमी बिना कुछ बोले उसे हैरानी से देख रहा था, अरीज उनकी नज़रों से कन्फ़्यूज़ हो रही थी, इसलिए उसने पूछा था।

"मैं कोलकाता से आया हूं.... मेरा नाम ज़मान ख़ान है, मैं इब्राहिम ख़ान का कज़िन हूं। अरीज ने उन्हें हैरानी से देखा अचानक से उसके बाबा का कज़िन कहां से आ गया था। उसके बाबा ने तो कभी अपने किसी भी रिश्तेदार का ज़िक्र ही नहीं किया ना ही कभी उसकी मां ने, तो फिर अचानक से कैसे कोई रिश्तेदार आ गया।

वह डर गई थी अपनी ज़िंदगी की चालबाज़ी से, अब कौन सा नया इम्तिहान लेने वाली हैं, यह कौन उसकी चौखट पर आकर खड़ा हो गया है, वह किससे इस आदमी के सच्चे होने की गवाही मांगेंगी? यह कौन है जो उसका कोई अपना होने की बात कर रहा है।

अरीज को यूं चुपचाप खड़ा देख ज़मान ख़ान उसकी कशमकश समझ गये थे इसलिए उसके सामने एक फ़ाइल बढ़ाएं थे। अरीज ने नासमझी में उस फ़ाइल को थामा था और खोलकर देखा था, उसे जैसे शाॅक सा लगा था।

आख़िर क्या था उस फ़ाइल में?