वो पहली बारिश - भाग 48 Daanu द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

वो पहली बारिश - भाग 48


“कहाँ हो?”

“ऑफिस में।"

“फटाफट नीचे आ जाओ।"

“काम कर रही हूँ मैं।"

“ठीक है फिर, मैं वहीं आकर बोल देता हूँ, जो मुझे कहना है।"

“रुको.. आ रही हूँ मैं।", दीवेश की अधीरता का चिड़ कर जवाब देते हुए नीतू बोली और उसने अपनी डेस्क से उठ कर नीचे जाने की लिफ्ट ली।

“यहाँ ऐसे क्यों बैठे हुए हो आप?”, दीवेश को देखते हुए नीतू ने पूछा।

“बहुत फालतू टाइम है मेरे पास।"

“हह?”

"वो क्या है ना, तुम्हारे जाने के बाद जिसने काम संभाला है ना, वो बहुत अच्छा है अपने काम में, तो हर तरफ बस शांति ही शांति है।"

“अच्छा.. अच्छी बात है।”, अपने दांत दबाते हुए नीतू बोली।

“हहम्म.. वो तो है।", बोलते हुए दीवेश ने बाहर की तरफ देखा।

“अब आप बताएंगे की आपने मुझे यहाँ क्यों बुलाया है?”

“हाँ।"

“तुम्हें याद नहीं रहा क्या, मैंने कहा था की तुम्हें ऐसे बनाना है, की मैं तुम्हें ना पसंद करू?”

“याद है।"

“तो फिर क्यों.. क्यों तुम मेरी बहन की आगे अच्छी बनी?”

“हह?”

“तुमने बात करी ना कल उससे, अपनी बुआ के साथ।"

“नहीं.. नहीं तो.. एक मिनट, वो आपकी बहन थी, पर वो तो आपसे बहुत बड़ी होंगी ना..”

“तभी तो.. तभी तो और मुश्किल है, मेरे लिए उनकी किसी भी बात को टालना।", दीवेश थोड़ा गंभीर होते हुए बोला।

“उन्होंने कुछ कहा क्या?”, नीतू ने भी गंभीरता से पूछा।

“हाँ.. की अभी की अभी इस लड़की से भाग के शादी कर लो।", दीवेश ने उतनी गंभीरता से जवाब दिया।

दीवेश की ये बात सुनकर नीतू भोंचक्की रह गई और एकटक उसे देखने लगी।

“मज़ाक कर रहा हूँ।", दीवेश ने नीतू का चेहरा देख कर हँसते हुए बोला। "मेरे कसन ने नया घर लिया है, तो उसके यहाँ आज एक छोटी सी पार्टी है, तो मेरी बहन चाहती है, की मैं तुम्हें दोस्त बना कर वहाँ ले जाऊ, ताकि हम दोनों को साथ में थोड़ा समय बिताने को मिल जाए।"

“पर?”

“पर वर कुछ नहीं.. अगर दिक्कत है, तो उनके सामने अच्छा नहीं बनाना था ना तुम्हें। और हाँ, तुम्हारी बुआ से अनुमति उसने ले ली है, तो तैयार रहना, ठीक 7:30 बजे।"

“ठीक है।", धीरे से बोलते हुए नीतू वहाँ से वापस अपनी बिल्डिंग में चली गई।
***********************

तयअनुसार शाम को ठीक 7:15 बजे, दीवेश नीतू के घर के बाहर आ गया, और तभी वो भी बाहर निकलती है। हल्के नीले कलर का जम्पसूट और उसके ऊपर क्रीम से कलर की हल्की सी जैकिट पहने हुए, अपने रोज़ के अंदाज से अलग लगती हुई नीतू, बाहर आकर दीवेश की कार में बैठ जाती है।

“बात नापसंद करने की हुई थी।", नीतू के गोल बूंद से बड़े बड़े इयररिंगस की तरफ देखते हुए दीवेश बोला।

“हह?”

“अच्छे लग रहे है ये।", उन इयररिंगस की तरफ इशारा करते हुए बोला, "और साथ ही तुम भी।", उसने धीरे से बोलते हुए अपनी पहली वाली बात में ये जोड़ा।

लगभग 15-20 मिनट में वो दोनों दीवेश के कसन के घर पहुँच गए।

“हाय.. कैसा है?”, दीवेश अपने कसन को गले लगते हुए पूछता है।

“ठीक हूँ।"

“इनसे मिल, ये मेरी दोस्त है.. नीतू।"

“हाय नीतू..”, दीवेश का कसन आगे बढ़ कर उसे मिला, दोनों को अपनी पत्नी से मिलवाया और तोहफे की आदान प्रदान के बाद, दोनों अंदर चले गए।

पार्टी में कुछ ही लोग आए थे, और उनमें से काफी सारे लोग दीवेश को जानते थे।
कुछ कुछ खाने का लेकर नीतू और दीवेश साथ बैठ गए थे।
“तो?”, दीवेश ने नीतू से बोला।

“तो..”, नीतू ने हैरानी से देखा।

“तुम्हें पता है क्या, की तुम बहुत बोरिंग हो गई हो। जिस नीतू को मैं जानता था, वो तो मेरे तो बोलते ही ऐसे शुरू होती थी, की दोबारा मुझे कुछ बोलने का मौका ही नहीं मिलता था।", दीवेश नीतू के कानों की ओर देखते हुए बोला।

“नहीं.. वो ऐसा नहीं है..”, नीतू ने अभी धीरे से बोलना शुरू किया ही था, की दीवेश के पास एक लड़की आई, और उसके कान में कुछ फुसफुसाते हुए बोली। उसकी बात सुनकर दीवेश मुस्कराया और खड़े होकर उसके साथ चल दिया।
वहाँ बैठे ज्यादातर लोग दोस्त थे, और जब ऐसे दोस्त मिलते है, तो आपस में कई फरमाइशे करी जाती है, इसी कारण वहाँ अब एक लड़का बैठ कर गाना गा रहा था, और उसी गाने पे डांस करने के लिए, वो लड़की दीवेश को अपने साथ ले गई थी।

डांस के लिए खड़ा हुआ दीवेश, धीरे से उस लड़की का हाथ अपने कंधे पे रखता है, और अपना हाथ उसकी कमर पे रखते हुए, उसकी तरफ मुस्करा कर देखते हुए कर डांस करना शुरू करता है।

दीवेश को ये सिर्फ इसलिए अच्छा लग रहा था, क्योंकि इससे वो नीतू को दिखा पाएगा, की वो हो या ना हो, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता और वो खुश है।

पर डांस करते हुए अभी कुछ चंद ही मिनट हुए थे, की नीतू दीवेश की नज़रों से ओझल हो गई। उसे अपने सामने ना पाकर दीवेश हल्का परेशान सा हो गया, और अपना डांस छोड़ कर उसे इधर उधर ढूँढने लगा।

वाशरूम से बाहर आती हुई नीतू, अचानक उसे ढूंढते हुए दीवेश से टकरा गई।

“तुम?”, दीवेश बड़ी सांस लेते हुए, उसे देख कर बोला।

“वाशरूम गई थी, क्या हुआ?", वाशरूम की तरफ हाथ से इशारा करते हुए नीतू बोली।

“सब खाना खा रहे है, तो मैंने सोचा की तुम्हें भी बुला लू।"

“हाँ।", नीतू के ये बोलते ही दोनों हॉल की तरफ बढ़े तो, सही पे डाइनिंग टेबल पे खाना लग रहा था।

“तो नीतू.. आप दीवेश के साथ कॉलेज में थी?", दीवेश के कसन ने पूछा।

“नहीं.. हम एक ही ऑफिस में है।"

“ओह. तुम कॉलीग्स हो?”

“मैं इनसे एक साल जूनियर हूँ।"

“ओह, तो तुम 32 की हो।", दीवेश के कसन एकदम से बोला।

“ये क्या लगा रखा है तूने?”, उसकी बात सुनते ही दीवेश ने बड़ी बड़ी आँखें करके उससे पूछा।

अपना खाना खत्म करके वो दोनों जब निकल रहे थे, तो नीतू को देखते हुए दीवेश बोला।

“अगर तुम्हें मेरे कसन की किसी भी बात का बुरा लगा हो, तो आइ एम सॉरी।"

“बुरा क्यों लगना है, बात ही तो कर रहे थे।"

“क्यों.. क्यों.." अपनी गाड़ी की तरफ जाता हुआ दीवेश नीतू को देखते हुए बोला। "क्यों तुम मुझ पे गुस्सा नहीं हो, की वो तुमसे ऐसे बात कर रहा था, क्यों तुम मुझपे गुस्सा नहीं हुई, की मैंने तुम्हें बोरिंग कहा, क्यों तुम मुझपे गुस्सा नहीं हो, की मैं तुम्हें छोड़ कर उस लड़की के साथ डांस करने चला गया, क्यों तुम इतनी अच्छी लग रही है, क्यों ये सब होने के बाद भी मेरा मन तुम्हारे अलावा कुछ सोच नहीं पा रहा, क्यों बार बार मेरा मन तुम्हें आगे बढ़ कर तुम्हें गले लगाने को कर रहा है।"

******"""


ऑफिस के लिए लेट होती हुई निया, भागते भागते बस स्टैन्ड पे पहुँची ही थी, की उसने देखा, उस बस स्टैन्ड पे ध्रुव बैठा हुआ था।

“ये तो ध्रुव है।", अपने आपसे ये बोलते ही उसके चेहरे पे मुस्कराहट आई और वो आती हुई बस के नंबर पे ध्यान देने लग गई।

“एक मिनट.. ध्रुव।", अपने आपसे फिर से ये बोलते हुए वो ध्रुव की तरफ हैरानी से मुड़ी।

“तुम यहाँ कर रहे हो।", बस स्टैन्ड पे पीछे होकर बैठे ध्रुव को देखते हुए, निया उसके पास जाकर उससे पूछती है।

“बस का इंतज़ार...”, ध्रुव ने धीरे से, बिना किसी हैरानगी के बोला।
“पर यहाँ कैसे.. क्यों?”

“वो तो मुझे भी नहीं पता..”, ध्रुव अपने आप से बहुत हल्के से बुदबुदाया।

“हह?”

“कुछ नहीं... तुम कहाँ जा रही हो?"

“इतने दिनों बाद मिले हो मुझसे.. और तुम्हें ये पूछना है।"

“हाँ... नहीं मतलब कैसी हो? पूछना तो बहुत कुछ है, पर समझ नहीं आ रहा कैसे पूछूँ।"

“ऐसा भी क्या है", निया बोल ही रही होती है, की इतने उसकी बस आ जाती है। "मुझे ना जाना होगा, मैं तुमसे बाद में मिलूँ?”
“हाँ..”, ध्रुव वहीं खोया खोया बैठ कर बोल रहा होता है।

निया के बस में बैठते ही, वो बड़ी सी सांस लेते हुए, खुद के सिर पे मारता है, और खुद से बोलता है।
“पागल है क्या, तो ध्रुव..”, उसे कुछ दिनों में हर चीज में बस निया की याद आ रही थी, और आज सुबह तो बस में उसके साथ की खाली सीट देख कर उसे निया के साथ बस में सफर करने का इतना मन किया, की वो यहाँ की टिकट ले कर आ गया।

निया के आने से कुछ देर पहले, बस स्टॉप पे बैठ ध्रुव खुद से बोल रहा था।
“हाय निया.. कैसी हो? साथ में बस में ऑफिस चले?.... नहीं नहीं.. अगर मैं उसे ऐसे बोलूँगा तो, वो मुझे मार डालेगी। कुछ और सोचना होगा। वो कहीं मुझे पागल तो नहीं सोचेगी ना.. की मैं उसके साथ जाने के लिए यहाँ तक आ गया.. कहीं क्या, पक्का पागल ही समझेगी, क्योंकि मुझे कोई बोलता तो मैं भी यही सोचता।", ध्रुव अभी खुद से बातें कर ही रहा होता है, की उसकी नजर सामने से आती हुई निया पे जाती है। "क्या करू.. क्या करू..”, ऐसे बोलता हुआ वो, इधर उधर मंडराने लग जाता है, और आखिरी में फैसला लेकर, बस स्टैन्ड पे कोने में चुप कर बैठ जाता है पर वो निया की नज़रों से बच नहीं पाता।

***********************

“तुम्हारा और ध्रुव का झगड़ा अभी भी चल रहा है?”, रिया को देख कर उनदेखा कर रहे, कुनाल के पास जाते हुए रिया पूछती है।

“झगड़ा? हमारा कोई झगड़ा नहीं हुआ, बस मेरा उससे बात करने का मन नहीं है। तुम क्यों पूछ रही हो?”

“क्योंकि तुम्हारे चेहरे पे दिखाई दे रहा है।",

“हह? और क्या क्या दिखता है मेरे चेहरे पे?”, कुनाल ने थोड़ा हैरान सा होते हुए पूछा।

“शिपि का नया बॉयफ्रेंड..”

“तुम्हें मेरे चेहरे वो दिखता है?”

“नहीं वो नहीं दिखता.. उसके बारे में सुना है मैंने।", रिया ने हँसते हुए बोला।

“क्या सुना है?”

“की वो बहुत अच्छा है।"

“हह?”

“तुम्हें याद है, मैंने कभी बताया था, की कभी यहाँ मेरे कॉलेज का फ्रेंड सर्कल हुआ करता था।"

“हाँ।"

“वो लड़का उसी में से एक है।"

“ओह..”

“बस इतना ही?”

“हाँ.. तो तुम्हें क्या लगा था, की नाम पता मांग कर उसे ढूँढने निकल जाऊंगा। आई एम ओवर हर।", कुनाल दृढंता से बोला।

“पक्का?”

“हाँ.. "

"फिर ध्रुव से अभी नाराज़ क्यों हो? तुम तो पहली बारिश में कभी मानते भी नहीं थे।"

“बात ये नहीं है, की ध्रुव, मेरे और शिपि के बीच जो हुआ, उसका जिम्मेदार है या नहीं, बात ये है, की ध्रुव मेरा दोस्त था, पर फिर भी उसने मुझसे झूठ बोले, अपने और निया को लेकर झूठ.. मेरी परवाह को लेकर झूठ। उसे एक बार भी नहीं लगा, की ब्रेकअप के बाद मुझे कितना दर्द होगा।"

“शायद उसने सोचा हो.. पर उसे अभी वाला दर्द बाद वाले दर्द से छोटा लगा होगा। क्या पता उसे लगता हो, की ये होना ही है, तो जितनी जल्दी हो जाए, उतना अच्छा है।"

“अगर ऐसा कुछ है भी, तो मैं उससे ये सुनना चाहता हूँ। पर वो तो कहीं और ही मगन है आजकल।", कुनाल ने ना में सिर हिलाते हुए ये बोला।


***********************

ऑफिस में बैठे कुनाल को उनके घर पे बैठा ध्रुव फोन करता है।

“हाय..”

“हाँ जल्दी बोल क्या हुआ, मेरी मीटिंग है कुछ देर में?”, कुनाल धीरे से बोलता है।

“ठीक है, तो फिर जल्दी से सुन.. मैं ना फ्लैट छोड़ कर जा रहा हूँ।"

“हह?”

“मतलब हमेशा के लिए नहीं.. सिर्फ कुछ दिनों के लिए। सिर्फ कुछ दिनों के लिए मैं शुभम के यहाँ जाकर रहूँगा।"

“अच्छा.. तुझे जाने से पहले शुभम के साथ समय बिताना है, क्या?"

“हाँ.. ये ऐसे तो मैंने सोचा ही नहीं।", ध्रुव धीरे से खुद से बोला।

“क्या?”

“कुछ नहीं.. चल मैं निकल रहा हूँ, कुछ हो तो मुझे कॉल कर दियो।"

“ठीक है।"

***********************

कुछ देर बाद ध्रुव शुभम को भी कॉल करके बताता है, की वो वहीं रहेगा।

“पर क्यों? मुझे चाहिए ही नहीं तू... फिर क्यों? तुझे पता है ना की मेरी एक गर्लफ्रेंड है.. है.. एकदम ध्यान से सुन ले, अगर ना सुना हो तो।"

“मैं तुझे बिल्कुल भी परेशान नहीं करूंगा.. मैं सारा सारा दिन घर से बाहर ही रहूँगा, और रात को भी आऊँगा, तो सीधा बस अपने कमरे में चला जाऊंगा, पक्का।"

“वाह.. तो तुझे यहाँ आना क्यों है?”

“तू कुछ दिन में पराया हो जाएगा, तो मैंने सोचा, तुझे जी चाह कर देख लूँ।"

"तो पागल वागल हो गया क्या??..”

“तो आ जाऊ?”

“जो मर्जी कर..”

***********************

अगले दिन ऑफिस जाते समय ही ध्रुव अपना बैग पैक करके साथ ले गया था। ऑफिस का काम खत्म करते ही वो शुभम के घर पहुँचा और अपनी चाबी से उसका घर खोलते हुए उसने वहाँ अपना समान रख दिया।

“चलो.. ये तो हो गया, अब क्या करना है... अब निया के पास चला जाए।", ये बोलते हुए ध्रुव वहां से निकल गया।

निया का घर अब शुभम के घर से बस दो ही स्टॉप दूर था, तो वो वहीं के लिए तुरंत निकल जाता है।

बस स्टैन्ड से निया के सोसाइटी तक जाने के रास्ते में, ध्रुव निया को फोन लगता है, पर पूरी घंटी जाने के बाद भी सामने से कोई फोन नहीं उठाता।

वो सोसाइटी के गेट पे पहुंचता है, तो देखता की निया वहीं खड़ी है, और उसके सामने एक सुंदर सा लड़का खड़ा है, जिससे निया बहुत हँसते हुए बात कर रही थी।

ये देख कर खुद को ना रोक पाते हुए, वो आगे बढ़ कर निया और उस लड़के के सामने जाता है, और उसे गले लगा लेता कर कहता है।

“हाय निया।"


*******************"""

ऑफिस से घर वापस आ रही चंचल, बस से उतार कर कुछ सोच में डुबे हुए बाहर रोड पे दिखते एक बेंच पे जा बैठी थी। उसका फोन कई बार बजा, तो जेब से निकालते हुए चंचल ने देखा, स्क्रीन पे सुनील का नंबर फ्लैश हो रहा था, जिसे देख कर अपने फोन को लॉक करके उसने अपने जेब में वापस रख दिया, और दोबारा से कुछ सोचने लग गई।

वो यूं ही अपने ख्यालों में कहीं होती है, जब अचानक से झमाझम बारिश होने लगती है, पर चंचल को कुछ फर्क नहीं पड़ता।

चंचल के काला टॉप और नीली जीन्स, बारिश से पूरी तरह भीग चुके थे, और चोटी में बंधे उसके बालों से भी टप टप करके पानी टपक कर रहा था, पर वो वहीं परेशान सी शक्ल बनाए बैठी हुई थी। कुछ दूर से चंचल की ऐसी हालत देख कर सुनील उसकी तरफ भागा आया, और अपना छाता उसके ऊपर कर दिया, साथ ही उसके भीगे हुए कपड़ों को देखते हुए, उसने छाता चंचल को पकड़ाते हुए अपने रैन्कोट की जैकेट उतारी और उसके ऊपर डाल दी।

“पागल हो गई हो क्या तुम?”, उसने चंचल की तरफ देखते हुए तेज़ आवाज़ में पूछा।

“नहीं.. वो क्या है ना नीतू की जगह कोई और आ गया है, और उसने मेरी सारी छुट्टियाँ कैन्सल करने को कहा है।"

“तो?”

“तो माँ को पता लग गया तो वो पक्का मेरी नौकरी छुड़वा देगी।", चंचल ने परेशान होते हुए सुनील से कहा।

“पर ये क्यों होगा, सिर्फ छुट्टियों की तो बात है?”

“क्यों आज सुबह सुना नहीं तुमने, क्या कह रही थी वो। तुम भी तो उनका पूरा साथ दे रहे थे ना।"

“हां... मैं शायद उनका साथ दे रहा था पर, मुझे ये पता है की नहीं कोई तुम्हें नौकरी छोड़ने को नहीं कहेगा।"

"हमारे अलग होने की बात सुन कर भी नहीं?"

"नहीं...अब बाकी की बात हम घर चल करके करे?", धीरे से चंचल का हाथ पकड़ कर उठाने की कोशिश करते हुए सुनील बोला।

“नहीं.. यहीं बात करते है। क्यों करते हो तुम ऐसा?", अपनी बड़ी सी ठहरी हुई आँखों से चंचल ने बोला।
“मैं जैसा भी करता हूँ, बस इसलिए करता हूँ, ताकि मेरे परिवार को ठेस ना पहुँचे।"

“और मैं?”

“मैं अपने जिस परिवार की बात कर रहा हूँ, तुम्हें क्या लगता है उसमें कौन है?"

"सब"

"तुम.. हमारे किसी भी फैसले में तुमसे ज्यादा ज़रूरी कुछ नहीं होता।", सुनील ने चंचल की बड़ी परेशानी भारी आँखों में देखते हुए कहा और साथ ही वहाँ जो बारिश के जो बादल छाए हुए थे, वो भी धीरे धीरे छटने लगे।

“मैं सच कह रहा हूँ, मैं अपने जिस परिवार की बात कर रहा था, वो तुम थी..”, चंचल के कोई जवाब ना मिलने के बाद सुनील एक बार फिर उसकी आँखों में देखते हुए बोला।
सुनील की ये बात सुनते ही, चंचल को जैसे बारिश का होश आ गया, और उसने अपने कंधे पे रखा रैन्कोट उठाया और सुनील के हाथों में देते हुए, छाते को भी थोड़ा और उसकी ओर किया।

वहीं चंचल के सामने खड़ा हुआ सुनील, उसकी साइड पे ही गीले बेंच पे बैठ कर, उसकी तरफ मुंह करके गर्दन को हल्का झुकता हुआ सा बोला।

“आई एम सॉरी चंचल.. शायद मैं उतना अच्छा नहीं हूँ, जितना खुद को समझता हूँ। तुम्हें पता है, मैंने हमारी शादी में तुम्हारे पापा को कहते हुए सुना था, की मैं उनकी इकलौती बेटी के काबिल नहीं हूँ।"

“हह?”, चंचल ने अजब सा चेहरा बना कर पूछा।

“हाँ.. और तब से मैं बस इन्हीं कोशिशों में लगा हूँ की किसी तरह, किसी तरह मैं उनकी इस बेटी के काबिल बन जाऊँ। तुम्हारे काबिल बनाना था तो मैंने बड़ी कंपनी में नौकरी ढूँढी, ज्यादा से ज्यादा पैसे कामने की कोशिश की। पर शायद..”

“पर शायद??..”, बोलते बोलते चुप हुए सुनील को देखते हुए चंचल ने पूछा।

“पर शायद, इन सब में मैं एक ज़रूरी चीज़ भूल गया।"

“क्या?”

“तुम्हारा ख्याल रखना.. काबिल बनने के लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी तो वही था ना।"

सुनील की ये बात सुन कर भी जब चंचल ने कुछ नहीं बोला, तो वो आगे बोला।

“अगर मैं बहुत लेट नहीं हुआ हो तो एक बात बोलूँ, एक मौका और दे दो मुझे, बस एक मौका और, अब मैं जिंदगी हम दोनों के साथ जीना चाहता हूँ, एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड में नहीं।
एक बात थी, जो तुम्हें मैंने नहीं बताई, जब ज़रोर जाने की बात हुई, तो मैंने ये बात अपने सीनियर को बताई थी, की तुम भी वही हो, और इसलिए शायद मुझे वहाँ नहीं जाना चाहिए, और जानती हो, उसने मुझसे क्या कहा.. उसने कहा तो अच्छा है ना, फिर तो ये प्रोजेक्ट और आगे वाले की प्रोजेक्ट हमे आराम से मिल सकते है, और फिर मेरी प्रमोशन तय, और हम दोनों की ज़िंदगी सही। उसकी बात पे उस टाइम तो मुझे थोड़ा गुस्सा आया था, पर फिर शायद मैं तुमसे मदद की उम्मीद से ही ज़रोर आया था। जब भी काम को लेकर हमारी लड़ाई हुई, मुझे खुद को तुमसे बेहतर साबित करना हुआ, तो मेरे मन में एक खिच सी होती थी, की तुम क्यों मेरे साथ ऐसा कर रही हो। पर अब जब ज़रोर से बाहर आया तो पता लगा, की इससे भी ज्यादा ज्यादा बुरा होता है बाहर, और ये नौका तो कब की डूब जाती, अगर इसे मजबूत बनाने में तुम्हारा इतना बाद हाथ नहीं होता।", सुनील चंचल की तरफ देखते हुए बोला, जो अब उसे बहुत ही शांत भाव से देख रही थी।

“अकेले तुम नहीं.. मैं भी इस रिश्ते में बराबर की भागीदार थी, पर शायद फिर भी.. फिर भी मैं इतना नहीं समझ पाई की तुम मुझे हराना चाहते हो, ताकि तुम खुद को मेरे लिए ही काबिल बना सको। ये जानते हुए भी, की तुम्हें टेंशन में अक्सर, अपने आस पास की चीजों की साज सजावट करनी पसंद करते हो, मैंने तुम्हें कुछ कुछ कह दिया, एक बार भी कोशिश नहीं की ये जानने की इसकी वजह क्या हो सकती है, क्योंकि उस समय मेरे भी दिमाग में बस एक ही बात चल रही थी, की मुझे हारना नहीं है, मुझे मां को बताना है, की मैं लड़की होकर भी अच्छा काम कर सकती हो। कितनी अजीब सी बात है ना, हम दोनों ही दूसरों को दिखाने के लिए खुद की जिंदगी भूल गए, अपने शादी के इस रिश्ते को भूल गए।"

“क्या कर सकते है, हम दोनों ही पागल है इस रिश्ते में। पर कोई ना, पहली बार शादी हुई है ना हमारी, तो इन उतार चड़ावों का पता कैसे ही चलता। अब हम समझ रहे है, तो धीरे धीरे सिख भी जाएंगे।", सुनील थोड़ा मुस्कराता हुआ बोला।

“पक्का ना, सिख जाएंगे?”, चंचल ने शरारती अंदाज में पूछा।

“हहम्म..”, सुनील ने सिर हाँ में हिलाते हुए बोला, और चंचल धीरे से अपने पास बैठे सुनील की तरफ बड़ी और उसके बाय तरफ की गाल के ओर जाते हुए, अपने होंठों से उसके गालों को चूम लिया।
“बस?”, चंचल ने जब सुनील की आँखों में आँखों डाली, तो सुनील ने उससे पूछा और फट से आगे बढ़ कर चंचल को गले से लगा लिया, और धीरे से उसका माथा चूम लिया।