अग्निजा - 25 Praful Shah द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अग्निजा - 25

प्रकरण 25

सुबह उठने के बाद यशोदा ने रणछोड़ दास द्वारा किए गए अत्याचार को छुपाने के लाख प्रयास किए लेकिन वह अपने शरीर के कितने जख्मों को छुपा पाती? दोनों हाथ, माथा, गला, पैर और...घाट-घाट का पानी पी चुकी शांति बहन कुछ बोली नहीं...लेकिन जयश्री ने मुंह खोला, “दादी, इसको चमड़ी को रोग हो गया है क्या..ऐसा होगा तो मैं इसके हाथ का बना खाना नहीं खाऊंगी...बता देती हूं।” यशोदा कुछ न कहकर रसोई घर में चली गई। उसका पोर-पोर दुख रहा था। शरीर तप रहा था और घाव जल रहे थे। यशोदा चुपचाप काम करती रही। उसको लंगडाते हुए देखकर शांति बहन चिल्लाई, “तबीयत ठीक न होने का नाटक करने से आराम करने नहीं दूंगी...मेरी कमर तीन दिनों से दुख रही है, पर मैंने एक बार भी कहा क्या? औरत जात को ऐसे नाजुक बन कर रहने से काम नहीं चलता...समझ में आया? कल गेहूं के तीन बोरे आए हैं। साफ करके कोठी में भरकर रखना, नहीं तो कीड़े लग जाएंगे। ”

यशोदा को अब दिन-रात, अच्छा-बुरा, सुख-दुःख इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। रोबोट की तरह वाह काम करती रहती थी। लेकिन मासूम नन्हीं को सीने से लगाते ही वह अपना सारा दुःख भूल जाती थी। वह भावुक हो जाती थी। उस नादान बच्ची को समझाती रहती थी, “तेरे लिए ही जी रही हूं...मायके में बोझ बनकर रहने से अच्छा है यहीं जीना और यहीं मरना...” उस मासूम को तो कुछ समझ में आता नहीं था, लेकिन वह अपनी आंखें गोल-गोल घुमाकर देखती रहती थी। अचानक हंसने लगती। यशोदा उसकी तरफ देखती रहती, उसकी आंखें भर आतीं, “इतने दुःख हैं, फिर भी मुई कैसे हंस रही है...देखो तो..घर के किसी ने तुझे हंसते हुए देख लिया न तो खैर नहीं बिटिया...” इतना कहकर यशोदा ने बच्ची को हल्के से चिमटी काटी और वह रोने लगी, “पगली, अपने नसीब में रोना ही लिखा है...हंसना नहीं...जीने दिया जा रहा है ये क्या कम है?” ऐसा कह कर फिर यशोदा पश्चाताप से नन्हीं को छाती से चिपका कर उस पर चुंबनों की बरसात करने लगी। उसकी आंखें बह रही थीं। दूर से यह सब देख रही जयश्री को लगता, “ऐसा प्रेम मुझको क्यों नहीं मिलता? सौतेली मां तो ठीक, लेकिन पिताजी और दादी को भी मैं पसंद नहीं हूं क्या?”

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प्रसव होकर तीन महीने गुजर चुके थे। न यशोदा की स्थिति में कोई परिवर्तन आया, न रणछोड़ दास और शांति बहन के स्वभाव में। लखीमां बहुत परेशान रहती थीं लेकिन यशोदा को कोई तकलीफ न हो यह सोचकर अपने कलेजे पर पत्थर रखकर चुप रहती थीं। प्रभुदास बापू को सब समझ में आता था, पर वह बोलते नहीं थे। लखीमां और केतकी की तरफ केवल देखते रहते थे। एक शाम को उन्होंने जयसुख को अपने पास बुलाया। उसको तीन सौ रुपए देकर फरमाया, “कल श्रीखंड और ढोकला लेकर आना।” लखीमां को आश्चर्य हुआ, आज इनको क्या सूझी? परंतु अपने पति को अच्छी तरह से पहचानने वाली लखीमां ने चुप ही रहने में भलाई समझ कर कुछ नहीं कहा। लेकिन जयसुख से रहा नहीं गया। “कल कुछ खास है क्या?

क्यों, ये सब मंगवा रहा हूं यही खास नहीं है क्या ?” कितने दिन हो गए ये सब खाए हुए..केतकी भी खुश होगी की नहीं?” जयसुख ने विरोध तो नहीं किया, लेकिन उसे यह बात जंची नहीं...

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सुबह ही प्रभुदास बापू ने केतकी के कान में हौले से कहा, “आज शाला मत जाना, ठीक है?”

“क्यों? मैं तो जाने वाली हूं, मेरी खास सहेली भावना आज आने वाली है...”

“सुनो तो, कल श्रीखंड, पूरी, ढोकला खाना है और...”

“और क्या..? बोलिए न नाना?”

“ अरे सब मिलकर मजा करेंगे”

“ना..मैं तो जाने वाली हूं...मेरा मन घर में नहीं लगता...”

“जैसी तुम्हारी मर्जी...लेकिन बाद में मत कहना ही नाना ने बताया नहीं...”

केतकी नाना की तरफ देखती रही। आज नाना की आवाज कुछ अलग ही लग रही थी। उनकी आंखों में थोड़ी नमी और चमक दिख रही थी, पर उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

“ठीक है, नहीं जाऊंगी...बस? पर अपने भोलेनाथ से कहिए मैं उनसे नाराज हूं...वह अब मेरा कहना नहीं मानते हैं...”

“ऐसा है? चलो तो अभी के अभी...भोलेनाथ के मंदिर में..तुम्हारे सामने ही उनसे कहता हूं कि आज के बाद से केतकी जो कहे वह सुनिएगा नहीं तो मैं भी उनसे नाराज हो जाऊंगा...”

“नाना, आप और भोलेनाथ से नाराज हो जाएं? संभव ही नहीं...”

“चलो, कहकर तो देखें....यदि उन्होंने तुम्हारी बात मान ली तो मैं उनसे क्यों नाराज होऊंगा... ?”

कौतूहल और आश्चर्य से भरी केतकी नाना का हाथ पकड़कर उनके साथ निकल पड़ी।

लखीमां को लगा, “आज महादेव के भक्त समझ में न आने वाली बातें कर रहे हैं। शाला के समय में उसको मंदिर ले गए हैं...जयसुख भाई को बाजार भेजा है...भगवान महादेव, तुम्हारे भक्त को समझ पाना मेरे बस की बात नहीं है....”

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दोपहर के बारह बज गए फिर भी प्रभुदास और केतकी घर नहीं लौटे और जयसुख भी नहीं आया था। लखीमां को सूझ नहीं रहा था कि क्या किया जाए। इतने में दरवाजे पर खटखट हुई। दरवाजा खोलकर वह सामने देखते ही रह गईं। सामने यशोदा खड़ी थी। नन्हीं को लेकर। उसके हाथ में एक छोटी सी थैली थी। लखीमां का दिल जोर से धड़का। उनको चक्कर आने लगे। वह नीचे गिरतीं इसके पहले ही यशोदा ने उन्हें संभाल लिया। यशोदा मां की तरफ देखकर हंसने लगी। “चिंता मत करो, मुझे घर से बाहर नहीं निकाला गया है। चार दिनों के लिए भेजा गया है। समझीं...?”

लखीमां को ऐसा लगा मानो सिर पर से बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो। यशोदा नीचे बैठ गई। लखीमां ने उसके हाथों से नन्हीं को अपने हाथों में ले लिया। “नानी से मिलने का मन नहीं हो रहा था क्या मेरी बच्ची? यशोदा, ये तो एकदम तुम पर गई है?”

“नहीं मां, मुझ पर गई है ऐसा मत कहो। इसका नसीब भी मेरे जैसा ही हुआ तो...?” “चुप रहो...सब कुछ ठीक होगा।” तभी खुले हुए दरवाजे से प्रभुदास और केतकी ने अंदर प्रवेश किया। उनके पीछे-पीछे ही जयसुख भी आ गया। केतकी मां को देखते ही उसके गले से लग गई। न जाने कितनी देर उससे बात ही  नहीं की और हिचकियां लेने लगी। जयसुख ने नन्हीं को उठा लिया। प्रभुदास बापू चुपचाप झूले पर बैठ गए। सबकी तरफ देख रहे थे। मंदिर की दिशा की ओर हाथ जोड़कर बोले, “जय भोलनाथ”। लखीमां ने उनके हाथों में पानी का लोटा लाकर दिया। “ ऐसा लगता है आप जो कहते हैं वहीं भोलेनाथ करते हैं, या कुछ करने से पहले उसकी सूचना भोलेनाथ अपने भक्त को दे देते हैं?” प्रभुदास उठे। हांथ-मुंह धोते-धोते बोले, “सब लोग बातचीत बाद में करो। जोरदार भूख लगी है। पेट में चूहे कूद रहे हैं। खाना परोसना शुरू करो।” जयसुख और लखीमां को थोडा-थोड़ा समझ में आने लगा कि बापू ने आज यह सब क्यों मंगवाया था। महादेव के इस भक्त के पास कितना अगाध ज्ञान है, लेकिन अपने ज्ञान का कभी दुरुपयोग नहीं करते। लालच नहीं करते। सबकुछ मालूम होते हुए भी किसी को कुछ न बता पाना, मन ही मन में कुढ़ते रहना-ये कितना मुश्किल होता होगा उनके लिए?

 

अनुवादक: यामिनी रामपल्लीवार

© प्रफुल शाह