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शिव की ओट से जुड़ी शिवप्रिया

शिव की ओट से जुड़ी शिवप्रिया

प्रोमो:-

पूरे ब्रम्हांड ने देखी शिव और शक्ति की कथा
शक्ति ने सती और उमा का रूप धरा
कहलाई शिव की प्रेमिका।।
लेकिन??????

इससे पूर्व भी था शक्ति का स्वरूप
आद्या रूप में रहती थी शिव में अन्तर्भूत।।
जगत ने देखी शिवप्रिया प्रेमिका शक्ति की गाथा
पर छुपी थी उसमे शिव के प्रेम की अमर गाथा।।
सब जानते है शिव है वैरागी
पर भीतर से मिलन के थे अभिलाषी।।

दिखाएगा इस पावन कथा का पावन अध्याय
कैसे शिव महाशिव से महादेव बन पाए।।।।।



मेरे भीतर कौन????

इस कहानी की शुरुआत होती है अमरनाथ की पावन गुफाओं से। हां वही गुफा जो शिव शक्ति के मिलन की साक्षी है। जहां उमा ने महादेव को पाया। घोर तप से असीम शक्तियां प्राप्त की। किन्तु उन असीम शक्तियों से अपना संबंध जानने की यात्रा अभी शेष थी। जिसे जानने के लिए नियति ने महाशिव के उस रहस्य से पर्दा उठाने की लीला रची थी जिसे शिव युगों युगों से स्वयं में समेटे हुए थे। गिरिजा जो शिव की प्रेमिका थी अर्धांगिनी बनने को थी शिव से अपने पूर्व संबंध से पूर्णतः अनिभिज्ञ थी। अपने प्रकृति होने के सत्य से कोसो दूर थी........

पर आज उन असीम शक्तियों की स्वामिनी बनी गौरी शिव से जानना चाहती थी कि उसके भीतर कौन सा दिव्या स्वरूप समाहित है जिसके कारण वो शिव को पा सकी।
किन्तु शिव का इस सत्य से उन्हें परिचित कराना एक जटिल कर्म था । किन्तु शिवप्रिया की जिज्ञासा देखकर स्वयं शिव भी उन्हें सत्य से दूर ना रख सके।

शिव ने प्रेम से भर कहा:- आज मै तुम्हे एक कथा सुना रहा हूं गौरी।

शिवप्रिया:- कैसी कथा महादेव?? क्या किसी कथा से मेरी शंका का समाधान हो सकेगा महादेव।।

शिव शांत मन से:- हां उमा क्योंकि ये कथा तुम्हारे ही जीवन से जुड़ी है।

शिवप्रिया:- कहीं आप सती रूप की कथा की बात तो नहीं कर रहे महादेव!! वो विरह मेरी भूल से हुआ था। मेरे अज्ञान वश......

शिव:- नहीं गिरिजा। वो विलगता तुम्हारे कारण नहीं बल्कि एक महान कारण से हुई थी। तुम्हारी संपूर्णता इस जन्म में ही सिद्ध होना निश्चित था। पर तुम्हारे कर्तव्य ने तुम्हे उस जन्म की और अग्रसर किया।

शिवप्रिया:- कैसा कर्तव्य।?? सती रूप से पूर्व भी क्या मेरा कोई स्वरूप था शिव। आप बताए?? और हर मिलन में विरह क्यों हमे विलग करता है। क्यों बार बार मुझे जन्म लेना पड़ता है। आप ही बताए क्यों ऐसा होता है???

शिव:- एक बार तुमने ही मुझसे कहा था गिरिजा कि शिवप्रिया का अस्तित्व शिव से ही है तो विरह कैसा?? और आज तुम ही उन परीक्षाओं का कारण मुझसे पूछ रही हो जिसका चयन तुमने स्वयं किया था। स्वयं तुमने अमरत्व को छोड़ नश्वरता को चुना और आज स्वयं नश्वरता से अमरत्व को जाने को व्याकुल हो रही हो। ये कैसी परीक्षा लेे रही हो तुम मुझसे।।।

शिवप्रिया:- आप किस विषय में बात कर रहे है महादेव। मेरा आत्म इस सत्य को नहीं जानता।

शिव:- तो जानो इस सत्य को। अपने अस्तित्व को। तन की तपस्या में तो तुम उत्तीर्ण हुई पार्वती। अब मन के तप को साधो।। और जब उत्तर मिले तो अपने शिव का स्मरण कर लेना......

शिवप्रिया के शिव इतना कह अंतर्धान हो गए। पर शिवप्रिया की दुविधा का समाधान कौन लाए???????


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