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कजरी - 3

अध्याय - 3
'कहो कजरी के बापू कैसा घर - परिवार है उनका '?कजरी की माँ बिमला ने पूछा।
' अरे बहुत पैसे वाले लोग है अपनी कजरी तो राज़ करेगी देखना तुम्'। शंकर ने कहा।
' उनसे ये तो कहा है ना की कजरी को हमसे मिलाने ले आए '। बिमला ने कहा।
' अरे हाँ कहा है मैंने उनसे वो ले आएँगे जब कजरी चाहेगी तब '।
' अच्छा ये बताओ दामाद जी कैसे है ?'बिमला ने पूछा।
' दामाद जी उम्र में कजरी से थोड़े बड़े है,तभी तो एक लाख ज्यादा दिया है '।
' कितने बड़े है ?' बिमला ने पूछा।
' बीस साल '। शंकर ने धीरे से कहा।
' क्या '?ये सुनकर बिमला के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
' हा '।
' ये क्या कर दिया आपने कजरी के बापू ?'। बिमला अपना सिर पकड़ कर बैठ गई।
' देख बिमला मैं जानता हूँ मैंने ये सही नहीं किया पर और कोई रास्ता भी नहीं था तू ऐसे समझ कजरी का जीवन अच्छे से गुजरेगा, तू चाहे तो मैं तुझे उससे मिला कर ले आउगा'। शंकर ने कहा।
बिमला समझ नहीं पा रही थी कि वो क्या करे।
कजरी और राघव की शादी हो गई। शादी के बाद कजरी को लेकर उसकी सास जानकी अपने बड़े बेटे लखन के घर गई।
' इन्द्रा बहु दरवाजा खोलना '। जानकी ने कहा।
' आई माँजी '। इंद्रा ने कहा ओर दरवाजा खोलने आई।
कजरी घुंघट के अंदर से झाँक रही थी।
' देख ले तेरी देवरानी को लाई हूँ '। जानकी ने हँसते हुए कहा।
' माँ मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि मैं इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करूँगा, तुम इसे ले जाओ मैं इसे मेरे घर में पैर तक नहीं रखने दूँगा '। लखन ने तेज आवाज़ में कहा।
ये सुनकर कजरी की आँख़ों से आंसू बहने लगे,उसे आज से पहले इतना तिरस्कार कभी सहना नहीं पड़ा था।जानकी चुपचाप कजरी को लेकर घर आ गई।
शादी के बाद जानकी को लगा था कि राघव बदल जायेगा लेकिन राघव को शादी से कोई मतलब नहीं था। वो पहले की तरह ही नशे में धुत पड़ा रहता,उसने कजरी को एक नज़र देखा तक नहीं था।कजरी उसके लिए केवल एक भोग की वस्तु थी जिससे जब चाहा राघव ने अपनी वासना शांत की।
धीरे - धीरे कजरी को समझ आने लगा कि उसके साथ धौखा हुआ है।लेकिन इस अनजान जगह कजरी किससे अपना दुःख बाँटती।वो बस चुपचाप सब सहती रहती।उसे पति का प्यार भले ही ना मिल रहा था पर जानकी और रघुनाथ ने कजरी को अपनी बेटी की तरह प्यार किया । वो दोनो कजरी को खुश रखने की हर कोशिश करते। कुछ समय के बाद कजरी ने राघव से उम्मीद ही छोड़ दी और अपनी नीरस ज़िन्दगी जीने लगी
एक दिन कजरी अपने आँगन में अपनी सास के साथ बैठे बातें कर रही थी,ओर रघुनाथ खेत पर गया हुआ था। ये बात तो पूरे गाँव को पता थी कि रघुनाथ ने अपने बेटे के लिए एक लड़की को खरीद कर लाया,सब ये भी जानते थे की कजरी उँची जात की नहीं थी। रघुनाथ गाँव के सरपन्च थे और जानकी भी मिलनसार स्त्री थी तो अक्सर लोगों का उनके घर आना - जाना लगा रहता था । एक रोज कुछ महिलयाये जानकी को अपने घर के एक उत्सव में शामिल होने के लिए आमन्त्रित करने आई। वो महिलाएं उँची जाति की थी।
' देखो जानकी काकी तुमको परिवार सहित आना है कहे देती हूँ '। रामदुलारी ने कहा,जिसके घर उत्सव था।
' अरे हाँ - हाँ जरूर आऊँगी '। जानकी ने उन्हें बैठाते हुये कहा।
' इंद्रा कहाँ है कहीं दिखाई नहीं दे रही '। रामदुलारी की बहु बेला ने पूछा।
' वो इंद्रा और लखन कुछ दिनों के लिए खेत वाले मकान पर गये हैं '। जानकी ने कहा।
' अच्छा '। बेला ने मुस्कुराते हुये कहा।
' अरे कजरी ज़रा मेहमानों के लिए पानी तो लाना '।जानकी ने कजरी को आवाज़ देते हुए कहा।
' अरे काकी रहने दो इसकी कोई जरुरत नही है '।रमदुलारी ने कहा।
' अरे जरुरत कैसे नहीं है आजतक मेरे घर से कोई बिना जलपान किये गया है जो अब जाएगा '। जानकी ने कहा।
इतने में कजरी उनके लिए चाय - पानी ले आई ओर उन्हें बडे हि प्रेम से परोसने लगी। ये पहली बार था जब कजरी के घर कोई नया मेहमान आया था।
' ले रामदुलारी चाय पी मेरे राघव की बहु ने बनाई है।'जानकी ने खुश होते हुए कहा।
' अरे काकी क्यों परेशान हो रही हो, हमें देर हो रही है '। रामदुलारी ने चाय के कप को खिसकाते हुए कहा।
' क्या देर हो रही है,मैं बिना चाय पीने नहीं जाने दूगी'। जानकी ने कहा।
' लीजिए ना आप '। कजरी ने आदर से कहा।
रामदुलारी ने कजरी को ओर देखा और जानकी की और मुँह करके बोली ' देखो काकी हम आपकी बहु के हाथ की चाय तो क्या पानी भी नहीं पियेंगे, पता नहीं कोन जात की है ? ये तो तुमसे व्यवहार है इसलिए तुम्हें बुलाने चली आई,वरना मैं तो ऐसी औरत का मुँह देखना भी पाप समझती हूँ '।
इतना सुनते ही कजरी रोती हुई अपने कमरे मैं चली गई,और जानकी चुपचाप उनकी बातें सुनती रही ।
कजरी को अपने ससुराल में रोटी ,कपडे और रहने की जगह के अलावा कुछ नहीं मिला।उसे सब लोग तिरस्कार के भाव से देखते, कोई भी उसे सम्मान के लायक नहीं समझता था। कजरी को अपना अपमान सहना पड़ता इसके अलावा वो बेचारी कर भी क्या सकती थी।
कुछ दिनों तक तो राघव घर आता था लेकिन फिर उसने घर आना बंद कर दिया था। रघुनाथ ने उसकी ख़बर ली तो पता चला कि वो एक दूसरी औरत के साथ रहने लग गया है। रघुनाथ और जानकी अपने किये पर पछ्ता रहे थे की उन्होंने अपने स्वार्थ के चलते एक लड़की की जिंदगी बर्बाद कर दी।
' कजरी मुझे माफ़ कर देना मैं तुम्हारा गुनाहगार हूँ, मैंने तुम्हारी ज़िन्दगी खराब कर दी।' रघुनाथ ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
' नहीं इसमें आपका दोष नहीं है शायद मेरे नसीब में यही लिखा था '। कजरी ने कहा।
' तुम चाहो तो अपने घर लौट जाओ '। रघुनाथ ने कहा।
' कोनसे घर बाबूजी, इतने दिनों में मेरे माँ - बापू ने मेरी खबर तक नहीं ली तो किस हक़ से मैं वहां जाऊ '। कजरी ने कहा।
रघुनाथ और जानकी ने कुछ नहीं कहा।कजरी वही उनके साथ ही रहने लग गई ,और देखते ही देखते कई साल गुज़र गये। जानकी और रुघुनाथ स्वर्ग सिधार गये और राघव का कभी पता हैं नहीं चला कि वो कहाँ गया। अब कजरी यहाँ कैसे और किसके सहारे रूकती,तो कजरी ने मकान बंद कर उसकी चाभी लखन को देकर वो शहर चली गई।

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