अर्पण--भाग (१०) Saroj Verma द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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अर्पण--भाग (१०)

राजहंसिनी जी जान से देवनन्दिनी की सालगिरह की तैयारियों में जुट गई,उसने कमलकान्त और कमल किशोर को टेलीफोन करके घर बुलाया,उन दोनों के आने पर उसने कहा कि आप दोनों को मेरी मदद करनी होगी, सालगिरह की पार्टी इतनी शानदार हो कि सारा शहर याद रखें___
जी, हमारी खातिर जो भी हुक्म है आप फरमाइए,हम से जो बन पड़ेगा आपकी मदद जरूर करेंगें, कमल किशोर बोला।।
जी !मैं आपसे ऐसी ही उम्मीद रखती हूं,राजहंसिनी बोली।।
जोर शोर से सभी सालगिरह की तैयारियों में जुट गए , चूंकि आज और कल का दिन शेष था तैयारी कर लिए इसलिए समय कम था और काम अधिक,तभी देवनन्दिनी ने राजहंसिनी से कहा____
राज! श्रीधर बाबू को भी सालगिरह पर आमंत्रित करना मत भूलना,चाहो तो तुम उनके घर ही जाकर क्यों नहीं कह आती।।
हां! दीदी! मैं भी यही सोच रही थी,राज ने जवाब दिया।।
तो देर किस बात की है,तुम अभी क्यों नहीं उनके घर चली जाती और हां! सुलक्षणा जी और उनके बेटे को आने के लिए भी जरूर कह देना,देवनन्दिनी बोली।।
हां, दीदी! उनसे भी आने के लिए ज़रूर कह दूंगी,आप कहती हैं तो मैं उनके घर के लिए निकल ही जाती हूं,इसी बहाने उनके घर भी हो आऊंगी और सुलक्षणा दीदी का शुक्रिया भी अदा करती आऊंगी, उन्होंने जो अस्पताल में मेरे लिए अच्छा अच्छा खाना भेजा उसके लिए,राज बोली।।
और सुन ऐसे मत जाना,जरा ढंग की साड़ी पहन लेना और बाल भी ठीक से बना लेना,देवनन्दिनी बोली।।
ठीक है दीदी!जैसा आप कहो, मैं साड़ी बदलकर आती हूं और इतना कहकर राज अपने कमरे में तैयार होने चली गई और कुछ देर के बाद मोटर में बैठकर निकल पड़ी श्रीधर के घर की ओर।।
कुछ ही देर में राज श्रीधर के घर का पता पूछते पूछते उसके घर पहुंच गई, क्योंकि श्रीधर पहले बातों बातों में अपने मुहल्ले और मकान नम्बर का ज़िक्र कर चुका था इसलिए राज को घर ढ़ूढ़ने में कोई दिक्कत नहीं हुई,मोटर श्रीधर के घर के सामने जा रूकी___
राज ने ड्राइवर से कहा ___
मैं घर के भीतर होकर आती हूं,तब तक तुम यहीं ठहरो।।
जी! दीदी जी, ड्राइवर बोला।।
राज ने द्वार पर जाकर कुंडी खड़काई....
तभी सुलक्षणा ने किवाड़ खोले और सामने राज को खड़ा देखकर बहुत खुश होते हुए बोली___
अरे! तुम! बाहर क्यों खड़ी हो? भीतर आओ।।
सुलक्षणा ,राज को भीतर ले जाकर बोली___
अच्छा बैठो और बोलो क्या खाओगी, मैं जल्दी से बना देती हूं।।
ना दीदी! अभी जल्दी में हूं, मैं तो आप सबको दीदी की सालगिरह के लिए आमंत्रित करने आई थी,राज बोली।।
तो क्या सालगिरह आज ही है? सुलक्षणा ने पूछा।।
ना दीदी!वो तो परसों है, लेकिन नन्दिनी दीदी बोली कि मैं आप सबको आज ही बोल आऊं,वैसे भी आज रविवार है इसलिए श्रीधर बाबू घर में ही होंगें, फिर कल तो वो मिल चले जाएंगे और निमंत्रण तो घर पर ही देते हुए अच्छा लगता है,राज बोली।।
ये भी सही कहा तुमने, लेकिन तुम्हें चाहें जितनी भी जल्दी हो मैं कुछ अच्छा सा तुम्हारे लिए बनाकर ले आती हूं,तब तक तुम श्रीधर से बातें करो,सुलक्षणा बोली।।
लेकिन दीदी!जनाब! है कहां? दिखाई नहीं दे रहे,राज ने सुलक्षणा से पूछा।।
अरे,अपने कमरें में होगा,पढ़ रहा होगा कोई उपन्यास,दो ही तो शौक हैं उसके एक प्रेमसाहित्य पढ़ना और दूसरा गाना गाना ,सुलक्षणा बोली।
सच, दीदी! क्या श्रीधर बाबू गाना गाते हैं,राज ने चौंकते हुए पूछा।।
हां,गाना गाता है,उसने तुम्हें नहीं बताया क्या? सुलक्षणा ने पूछा।।
ना दीदी!ये तो उन्होंने कभी नहीं बताया,राज बोली।।
ये शौक तो उसे बचपन से ही है,सुलक्षणा बोली।!
अब तो श्रीधर बाबू को बख्शा नहीं जाएगा, नन्दिनी दीदी की सालगिरह में उन्हें गाना गाना ही होगा,राज बोली।।
लेकिन ये काम बहुत ही मुश्किल है,वो किसी महफ़िल वगैरह में गाना गाना पसंद नहीं करता,सुलक्षणा बोली।।
तो ये काम आप मुझ पर छोड़ दीजिए, मैं ये उनसे हां करवा कर ही मानूंगी,राज बोली।।
तो जाओ उसके कमरें में जाकर उससे कहकर देखो भला,मानता है कि नहीं,सुलक्षणा बोली।।
दीदी! आप भी आइए,राज बोली।।
क्यों अकेले जाने में डर रही हो क्या?सुलक्षणा ने पूछा।।
ना दीदी!आप साथ रहतीं तो अच्छा रहता,राज बोली।।
ठीक है तुम चलो, उसके कमरें में,मैं तुम दोनों के लिए कुछ खाने के लिए लेकर आती हूं,सुलक्षणा बोली।।
ठीक है दीदी! जल्दी आइए, राज बोली।।
उस तरफ है उसका कमरा,सुलक्षणा बोली।।
और राज ने श्रीधर के कमरे के पास जाकर आवाज दी....
श्रीधर बाबू....श्रीधर बाबू....
जी!आप ! यहां कैसे?श्रीधर ने बाहर आकर पूछा।।
जी! आपको देवनन्दिनी दीदी सालगिरह के लिए आमंत्रित करने आई थी,राज बोली।।
ये तो बहुत ही खुशी की बात है और हम सब आपके घर जुरूर आएंगे,श्रीधर बोला।।
लेकिन इसके लिए आपको एक ख़ास तोहफा देना होगा,राज बोली।।
जी, लेकिन वो ख़ास तोहफा है क्या? श्रीधर ने पूछा।।
जी, हमें पता चला है कि आप बहुत ही अच्छा गाते हैं, इसलिए आपसे गुजारिश है कि सालगिरह वाले दिन आपको एक गीत गाना होगा,राज बोली।।
ये तो कोई बात ना हुई,आप तो हमें उलझा रहीं हैं,श्रीधर बोला।।
उलझा नहीं रहीं हूं जनाब! आपके हुनर का नमूना देखना चाहती हूं,राज बोली।।
पहले ये बताएं शहजादी साहिबा कि आपको ये किसने बताया कि मैं गीत गाता हूं,श्रीधर ने पूछा।।
जी,सुलक्षणा दीदी ने,राज बोली।।
अच्छा तो ये बात है,जीजी को भी ढ़िढ़ोरा पीटने की बहुत आदत है,श्रीधर बोला।।
अब मेरे भाई में हुनर है तो सबको बताऊंगी ही ना! और तुम दोनों अभी तक बाहर खड़े होकर ही बातें कर रहे हों,सुलक्षणा चाय और नाश्ता लेकर आती हुई बोली।।
मैं तो भूल ही गया,ध्यान ही नहीं रहा,श्रीधर बोला।।
कोई बात नहीं चलो बरामदें की खुली हवा बैठते हैं,सुलक्षणा बोली।।
तो चलिए देर किस बात की है,राज बोली।।
आप दोनों चलिए, मैं कुर्सियां लेकर आता हूं,श्रीधर बोला।।
और सब बरामदें में बैठकर चाय और नाश्ते का आनन्द उठाने लगे, बातों बातों में राज ने श्रीधर से सालगिरह में गाना गाने के लिए भी मना लिया, फिर कुछ देर बाद बोली___
अच्छा तो मैं चलती हूं,ड्राइवर बाहर इन्तज़ार कर रहा है,
ठीक है, फिर कभी आना तो काफ़ी समय लेकर आना ,सुलक्षणा बोली।!
जी दीदी! जरूर, नमस्ते!
और अगर सालगिरह में मेरी कुछ मदद की जुरूरत हो तो ,नि:संकोच बोल दीजियेगा,श्रीधर बोला।।
वैसे तो मैं सब सम्भाल लूंगी लेकिन अगर फिर भी कोई आवश्यकता हुई तो आपसे जुरूर कहूंगी,राज बोली।।
और इतना कहकर राज मोटर में बैठकर घर को निकल गई।।
राज को जाते हुए देखकर सुलक्षणा बोली___
कितनी अच्छी लड़की है,है ना रे!
और सुन्दर भी,श्रीधर बोला।।
क्या बोला रे! सुन्दर भी....सुलक्षणा बोली।।
वो जीजी!ऐसे ही मुंह से निकल गया,श्रीधर बोला।।
जो तेरे दिल में है,वही जुबान पर आ गया,सुलक्षणा झेड़ते हुए बोली।।
ना जीजी! ऐसा कुछ ना है,जैसा तुम सोच रही हो,श्रीधर बोला।।
मैं सब जानती हूं बच्चू! इश्क़ और मुश्क छुपाए नहीं छुपते,मुझसे छुपाने की कोशिश मत कर,सुलक्षणा बोली।।
ना जीजी! मैं कुछ नहीं छुपा रहा,श्रीधर बोला।।
हां.... हां...अब रहने भी दे,जा अपना काम कर,सुलक्षणा बोली।।

ऐसे ही तैयारियां करते करते सालगिरह वाला दिन भी आ पहुंचा।।
शाम से बंगले में लोगों की आवाजाही हो चुकी थी,शहर के नामी-गिरामी हस्तियों और कारोबारियों को पार्टी में आमंत्रित किया गया था,बंगले की सामने वाली रोड और बंगले की पार्किंग बड़ी बड़ी मोटरों से भरी हुई थी,बंगले को छोटे छोटे रंग बिरंगे बल्बों की लड़ियों से सजाया गया था,पेड़ पौधों पर भी लड़ियों की सजावट की गई थी।।
पार्टी की सारी ब्यवस्था बग़ीचे में ही की गई थी,जगह जगह पर टेबल और कुर्सियां लगाएं गए थे,समय समय पर वेटर सबको ठंडा और स्नैक्स सर्व कर रहे थें और डिनर का अरेंजमेंट घर के भीतर था जो कि वो आठ बजे के बाद शुरू होने वाला था, क्योंकि राज ने कुछ नृत्य और गीत का भी अरेंजमेंट किया था जिसमें की वो भी एक गीत प्रस्तुत करने वाली थी और नृत्य के लिए उसने एक नाटक कम्पनी के कलाकारों को आमंत्रित किया था।।
आठ बजने को थे कमलकान्त बाबू ने एनाउंस किया कि आप सब भीतर चलें,भीतर डिनर, नृत्य और गीत का भी आनंद उठाएं।।
सारे मेहमान धीरे-धीरे भीतर एकत्र हो गए,तब राज ने प्यानो पर एक बहुत ही प्यारा गीत प्रस्तुत किया,इसके उपरांत कलाकारों ने नृत्य प्रस्तुत किया और सबसे आखिरी में श्रीधर ने भी अपना गीत गाया,श्रीधर का प्रेमभरा गीत सुनकर देवनन्दिनी और राजहंसिनी दोनों ही आत्मविभोर हो उठीं और दोनों ने ये भी समझा कि ये गीत मेरे लिए ही गाया गया है,इसका मतलब है कि श्रीधर बाबू के दिल में भी वही बात है जो मेरे दिल में है,शायद वो मुझे पसंद करतें हैं।।
लेकिन श्रीधर को तो ये पता था कि उसने ये गाना केवल राज के लिए ही गाया था और राज भी श्रीधर के दिल के इशारे को बखूबी समझ गई थी लेकिन जब तक जुबां से इज़हार ना हो तो इश्क़ अधूरा ही समझा जाता है और यही श्रीधर और राज के बीच हो रहा था।।
कार्यक्रम के फौरन बाद देवनन्दिनी ने केक काटा और डिनर शुरू हो गया,आज देवनन्दिनी बहुत ही अलग तरीक़े से तैयार हुई थी,उसने बालों का ऊंचा जूड़ा बनाया था,गले में मोतियों का गुलुबंद और कानों में मोतियों के बूंदे पहन रखें थें,हल्की कपड़े की धानी रंग की पारदर्शी साड़ी,स्लीपलैस ब्लाउज़ के साथ पहनी रखी थी,आज देवनन्दिनी अपनी उम्र से कम प्रतीत हो रही थीं।।
तभी श्रीधर ने नन्दिनी के पास जाकर उसे एक बड़ा सा फूलों का गुलदस्ता देते हुए सालगिरह की बधाई दी और बोला आप ऐसे ही खुश रहा कीजिए और ये मुस्कान अब चेहरे से उतरनी नहीं चाहिए,आज आप बेहद ख़ूबसूरत लग रहीं हैं और आपको खुश देखकर आज राज जी भी बड़ी प्रसन्न हैं,शायद राज जी भी यही चाहती हैं कि आप सदैव ऐसी ही रहें,जब आप स्वयं प्रसन्न रहेंगीं तभी तो आप औरों को भी प्रसन्न रख पाएंगी,शायद ज़िन्दगी जीने का ये फ़लसफ़ा आपको बखूबी समझ आ गया है, मुझे खुशी हुई कि आपने मेरी बात को समझने की कोशिश की और उस पर अमल भी किया।।
श्रीधर की ऐसी बातें सुनकर नन्दिनी मन ही मन फूली ना समाई फिर उसने सुलक्षणा और श्रीधर से डिनर करने को कहा___
श्रीधर बोला___
हम खाना तो खा चुके हैं,अब घर जाने की इच्छा है।!
नन्दिनी बोली___
मैं ड्राइवर से कहे देती हूं,वो आपको घर तक छोड़ देगा।।
ना देवी जी! आप नाहक परेशान ना हों,हम चलें जाएंगे,श्रीधर बोला।।
इसमें परेशानी की कोई बात नहीं है,आपके साथ सुलक्षणा जी और बच्चा भी तो है,ऊपर से रात भी बहुत हो चुकी है, नन्दिनी बोली___
जैसा आप उचित समझें,श्रीधर बोला।।
तो आप हमसे मिले बिना ही चले जा रहें हैं,उधर से राज आकर बोली।।
मैं तुम्हें ढ़ूढ़ ही रही थी,सुलक्षणा बोली__
सच में दीदी!,राज बोली।।
हां... हां...सच में,सुलक्षणा बोली।।

क्रमशः___
सरोज वर्मा_____