हिम स्पर्श - 86 Vrajesh Shashikant Dave द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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हिम स्पर्श - 86

86

“वफ़ाई, तुम यहाँ हो?” इन शब्दों ने मृत से चारों शरीरों में जीवन का संचार कर दिया।

चारों ने ध्वनि की दिशा में देखा। दिलशाद, नेल्सन तथा जीत उस अपरिचित से व्यक्ति को देखते रहे, परिचय का कोई अंश खोजते रहे।

वफ़ाई उन्हें देखकर विचलित हो गई। उसके मन में अनेक भाव उठने लगे, अनेक प्रश्न उठने लगे। वफ़ाई बहुत कुछ कहना चाहती थी, अंदर से खाली हो जाना चाहती थी किन्तु वह मौन रही।

“वफ़ाई, चलो मेरे साथ। कुछ ही क्षणों में हमें लौटना है।“ उस युवक ने कहा।

वफ़ाई के धैर्य का बांध टूट गया,”नहीं बशीर। हमें नहीं तुम्हें लौटना है। मैं तुम्हारे साथ नहीं आ रही हूँ।“

“वफ़ाई, हठ नहीं करते।“

“मैं हठ नहीं कर रही हूँ, मैं मेरा निंर्णय बता रही हूँ।“

“प्रत्येक व्यक्ति अपने घर लौट रहा है, तुम्हें भी।“

“घर? कैसा घर?”

“वफ़ाई, हमारा घर। इन पहाडीयों की उस सुदूर चोटी पर बसे गाँव में हमारा घर...।“

“उन चोटियों पर अब मेरा कोई घर नहीं है।“

“वफ़ाई, तुम मेरी पत्नी हो।“

“थी। बशीर कभी मैं तुम्हारी पत्नी थी। किन्तु तुम उस संबंध को विच्छेद कर चुके हो।“

इन शब्दों को सुनकर जीत, नेल्सन तथा दिलशाद अचंभित हो गए।

“वफ़ाई, क्या बात है? कहो।” जीत ने कहा।

“मैं बताता हूँ, जीत।“ बशीर जीत के समीप गया।

जीत उसे प्रश्न भरी द्रष्टि से देखने लगा।

“वफ़ाई मेरी पत्नी है। कुछ दिनों पहले हम दोनों का निकाह हुआ था। हमारा जीवन प्रारम्भ हो उससे पहले ही वफ़ाई कच्छ के अभियान पर निकल गई। अब जब वह लौट आई है तो मैं उसे अपने साथ ले जाना चाहता हूँ। बस इतनी सी बात है। जीत, वफ़ाई तुम्हारी मित्र है, तुम उस समझाओगे तो वह अवश्य मान जाएगी।“ बशीर ने जीत से विनती की।

जीत बशीर के शब्दों को समझने का प्रयास करता रहा।

वफ़ाई ने इतने दिनों तक इस बात का कभी उल्लेख तक नहीं किया। वफ़ाई विवाहित थी तो उसने मुझ से यह बात गुप्त क्यों राखी? वफ़ाई के उस मौन का क्या संकेत था?

जीत ने वफ़ाई के सामने देखा।

“जीत, मैं सब कुछ बताती हूँ।“ वफ़ाई रुकी, साहस जुटाया और बोली, ”बशीर ने जो कहा वह सत्य है। मेरा उसके के साथ निकाह हुआ था। किन्तु मुझे कच्छ अभियान पर जाना पड़ा। इस अभियान पर मुझे भेजने में बशीर का भी हाथ था।“ वफ़ाई ने बशीर पर एक तीव्र द्रष्टि डाली। बशीर विचलित हो गया।

“बशीर, तुम चाहते तो मेरा साथ दे सकते थे। उन लोगों से विरोध कर सकते थे। किन्तु तुम मौन रहे और मुझे अभियान पर निकलना पड़ा।“

“हाँ, मैं उन लोगों से डर गया था। हमारे सुख के लिए ही मैं मौन रहा था।“

“यदि तुम मेरा साथ देते तो मैं सब से लड़ लेती।“

“मैं मेरे उस मौन पर लज्जित हूँ।“

“तब भी मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया था।“

“वफ़ाई, तो चलो घर लौट चलते हैं।“

“उस बात पर तो मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया था किन्तु उस के पश्चात भी तुम भूल करते रहे।“

“?”

“मेरे जाने के पश्चात तुमने कभी मेरा संपर्क नहीं किया। मैं कहाँ हूँ, किस हाल में हूँ यह भी नहीं पूछा। जैसे तुम मुझे भूल गए हो। जैसे तुम्हें मेरी कोई चिंता ही ना हो।“

“मैं मानता हूँ। मेरी उस भूल के लिए भी मुझे क्षमा कर दो वफ़ाई।“

“उस भूल को भी मैं भूल चुकी थी। क्षमा कर चुकी थी।“

“तो चलो घर लौट जाते हैं।“

“वफ़ाई, यदि तुम बशीर को क्षमा कर चुकी हो तो लौट जाओ न अपने घर?” जीत ने कहा।

“क्यों इतने उतावले बनते हो? अभी बात पूरी तो होने दो।“ वफ़ाई ने कहा।

“अब क्या बात बाकी है वफ़ाई?” जीत तथा बशीर दोनों एक साथ बोल पड़े।

“जीत, तुम्हें याद है, मैं रात के अंधेरे में तुम्हारे लेपटोप से मेरी सारी तस्वीरें चुराकर भाग निकली थी। तुमने स्वयं ही मुझे विदा किया था।”

“हाँ वफ़ाई। तो?”

“मैं तुम्हें छोड़कर जा चुकी थी, फिर लौटकर कभी नहीं आने के लिए।”

“किंतु तुम लौट आयी थी। क्यों?”

“यह प्रश्न तुमने मुझे अनेक बार पूछा था।”

“और तुम उसका उत्तर टाल जाती थी।”

“आज समय आ चुका है उस प्रश्न का उत्तर देने का, जीत।”

“वफ़ाई, मैं उस बात को भूल चुका हूँ।”

“जीत, मैं उसे नहीं भूली हूँ। और भूल भी कैसे जाती?”

“वफ़ाई, पुरानी बातों को छोड़ दो। चलो घर लौट चलो।” बशीर ने कहा।

“बशीर, कुछ बातें सदैव रहती है, कभी पुरानी नहीं होती। जीत, उस रात मैं तुमसे दूर जा चुकी थी। मैं मेरा अभियान छोड़कर घर लौट रही थी। मेरी मॉ, बशीर तथा मेरे गाँव, मेरा पहाड़। सब से मिलने के लिए मैं अधीर थी। मैं मन के अंदर अनेक कल्पनाएँ धारण करती हुई तुम से दूर जा रही थी उसी समय मेरे मोबाइल पर मुझे बशीर का संदेश मिला। मैं अधीर होकर उन संदेशों को पढ़ने लगी। उसे पढ़ते ही मेरी तमाम कल्पनाएँ ध्वस्त हो गई। मैं भीतर से टूट गई।” वफ़ाई ने दीर्घ साँस ली।

“क्या था उन संदेशों में?” जीत ने पूछा।

“तलाक़। तलाक़। तलाक़।” वफ़ाई ने कहा।

“क्या?”

“हाँ जीत। वह संदेश थे तलाक़ के। तीन संदेश भेजे थे बशीर ने। तीनों में तीन तीन बार तलाक़ लिख भेजा था।”

“वफ़ाई, वह तो….।” बशीर आगे नहीं बोल पाया।

“बशीर, तुम मुझे तलाक़ दे चुके हो। मेरा और तुम्हारा सम्बंध समाप्त हो चुका है।” वफ़ाई ने बशीर की आँखों में तीव्र दृष्टि से देखा। बशीर उसे सह नहीं सका।

“बशीर, क्या यह सत्य है?” जीत ने पूछा। बशीर ने मूक सम्मति दी।

वफ़ाई, जीत तथा बशीर मौन हो गए।

“जीत, तुम तो चल रहे हो ना हमारे साथ मुंबई?” डॉक्टर नेल्सन ने स्थिर से समय को प्रवाहित करने का प्रयास किया।

“जीत, तुम तो लौट जाओ मुंबई। कोई तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है वहाँ।” वफ़ाई ने कहा।

“वफ़ाई, मेरा वहाँ कोई नहीं है। मैं नहीं जाने वाला।”

“तो तुम क्या करोगे?”

“मैं वहीं मेरे अज्ञात स्थान को लौट जाऊँगा। तुम मेरे साथ चलोगी वफ़ाई?”

“नहीं।”

“क्यों? वफ़ाई तुम ऐसा क्यों कह रही हो?”

“जीत, तुम मुझे हिम सुंदरी कहते हो ना? मैं हिम सुंदरी नहीं, मैं स्वयं हिम ही हूँ। तुम जानते ही हो कि सूरज के निकलते ही हिम पिघलने लगता है। वह अपना आकार और अस्तित्व दोनों खो देता है। हिम की नियति यही है। मुझे पिघलना होगा।”

“हिम को ज्ञात नहीं की वह जिसे स्पर्श कर ले उसे कितनी शीतलता मिलती है, कितनी शांति मिलती है?”

“किन्तु हिम को तो तपना ही पड़ता है। उसे स्वयं को खोना पड़ता है। मैं भी पिघल रही हूँ। बह रही हूँ। मेरा अस्तित्व पिघल रहा है।“

“हिम पिघलकर कहाँ जाता है? नदी बनकर बहता है। पहाड़ को छोड़कर वह धरती तक बह जाता है। तुम्हें भी इस पहाड़ को छोडना होगा। नदी बनकर बहना होगा। मेरे साथ धरती तक चलना होगा।“

वफ़ाई हिम से आच्छादित पहाड़ों में कहीं खो गई, पिघल कर बह गई। जीत पहाड़ पर से गहरी घाटी में गिरते झरनों को देर तक देखता रहा, वफ़ाई के अस्तित्व को खोजता रहा।

“वफ़ाई, मेरी मृत्यु में तुम मेरे साथ रह सकती हो तो मेरे जीवन में मेरे साथ क्यूँ नहीं रह सकती?” जीत ने वफ़ाई से पुछ।

जीत के इस प्रश्न का उत्तर वफ़ाई के पास नहीं था।

वफ़ाई ने आँखें बांध कर ली। वफ़ाई के ह्रदय का बर्फ पिघल रहा था जो आँखों के मार्ग से बहने लगा।

“वफ़ाई, आँखें खोलो...।” वफ़ाई ने आँखें खोली। वफ़ाई दिलशाद को ढूँढने लगी। दिलशाद घाटी के मोड तक जा चुकी थी। वह नेल्सन के साथ घाटी के मोड पर मूड गई। एक कहानी पिघलते हिम के साथ पहाड़ की चोटियों से झरना बनकर घाटियों में प्रवाहित हो गई।

*****

“यह सब तो ठीक है, किन्तु तुम कौन हो?” तुमने मुझसे पूछा।

“आप कौन हो? आप कहाँ हो? मुझे आप दिखाई क्यूँ नहीं देते? मैं आपसे पुच रहह हूँ।“

“मैं एक व्यक्ति हूँ जो भीड़ से अलग हो चुका हूँ। तुमने ही तो मुझे भीड़ से अलग किया था। तुम मुझे जानते हो। अब यह बताओ की तुम हो कौन?”

“तुम्हारी यह स्वतन्त्रता के लिए तुम्हें धन्यवाद। अब कभी भी किसी भीड़ का हिस्सा मत बनाना।“

“किन्तु तुमने अभी भी मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। कहो न कौन हो तुम?”

“तुम मुझे भूल जाओ। मैं कौन हूँ इस बात का कोई महत्व नहीं है। मेरा काम था आप को वफ़ाई और जीत की कहानी सुनाना, जो मैंने कर दिया। मुझे आप को भीड़ से निकालकर एक व्यक्ति बनाना था, जो सम्पन्न हुआ। मेरा दायित्व भी सम्पन्न हुआ। चलिये मैं चलता हूँ। आप भी चलिये।“

“जाते जाते एक वचन देते जाओगे क्या?”

“मांगो, संभव हुआ तो पूरा भी करूंगा।“ मैंने आँखें बंद कर ली और कान सचेत।

“फिर कभी कोई कहानी हाथ लग जाये तो सबसे पहले मुझे पुकार लेना, मैं सब कुछ छोडकर आ जाऊंगा तुम्हारे पास।“

“मैं नहीं जानता कि फिर कोई कहानी कब मेरे हाथ लगेगी। किन्तु यह वचन देता हूँ कि सबसे पहले यह कहानी मैं तुम्हें ही सुनाऊँगा।“ मैंने आँखें खोली। हवा की एक तरंग मुझे छु कर निकल गई। मैंने पहाड़ पर दूर तक देखा। वफ़ाई, याना, विक्टर, जोगन, दिलशाद, जीत, डॉक्टर नेल्सन, डॉक्टर गिब्सन, उसकी पूरी टीम और तुम। कहाँ चले गए सब? पहाड़ पूरी तरह से अकेला था, मेरी तरह।

संपन्न