हिम स्पर्श - 82

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“वफ़ाई।“ किसी ने वफ़ाई को पुकारा। विचारों से जागृत होकर वफ़ाई ने उस ध्वनि की दिशा में द्रष्टि की।

“तुम? बशीर तुम यहाँ?” वफ़ाई उठ खड़ी हो गई और बशीर की तरफ जाने लगी। अचानक ही उसके चरण रुक गए। वह वहीं रुक गई।

“बशीर, यहाँ क्यों आए हो?”

“वफ़ाई, तुमसे मिलने आया हूँ मैं।“

“क्यों? क्या कुछ भी बचा है अब?”

“वफ़ाई...।“

“बशीर, तुम यहाँ से चले जाओ।“

“मेरी बात तो सुन लो।“

“तुम चले जाओ यहाँ से।“

“वफ़ाई। मेरी बात तो...।”

“कुछ नहीं सुनना मुझे। तुम बस यहाँ से चले जाओ।“

बशीर चला गया। वफ़ाई आक्रंद करने लगी।

हे ईश्वर। यह कैसी परीक्षा है मेरी? मुझे किस दुविधा में डाल दिया तुमने? एक तरफ जीत जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है। दूसरी तरफ मेरे अंदर मृत हो चुकी भावनाओं को जीवित करने ना जाने कहाँ से बशीर आ गया। मुझे शक्ति प्रदान करना। मेरे अंदर कुछ भी टूटे ना। मेरे हाथ से कुछ भी छूटे ना इस बात का ध्यान रखना। मैं तेरी शरण में हूँ।

वफ़ाई ने आँखें बंध कर ली। अश्रुओं को बहने दिया। वह बहते रहे।

“वफ़ाई।“ पुन: किसी की ध्वनि वफ़ाई के कानों पर पड़ी। कुछ समय तक वफ़ाई उसे मन का भ्रम मानकर स्थिर सी रही। ना तो उसने आँखें खोली ना ही कोई प्रतिक्रिया दी।

“वफ़ाई। वफ़ाई।“ पुन: ध्वनि आई।

यह भ्रम नहीं हो सकता। कोई मुझसे बात करना चाहता है। मुझे देखना होगा।

वफ़ाई ने आँखें खोली। सामने एक स्त्री तथा एक पुरुष खड़े थे।

“वफ़ाई, मैं यह सारे चित्र खरीदना चाहती हूँ। क्या आप इन सभी की किंमत बता सकती हो?” उस स्त्री ने पूछा। वफ़ाई उस स्त्री की तरफ मुड़ी।

“सारे चित्र?” वफ़ाई ने पूछा।

“हाँ, सारे चित्र। आप सब का कुल मूल्य बताएं।“ उसने कहा।

वफ़ाई कुछ क्षण तक जवाब नहीं दे सकी।

“वफ़ाई, क्या कोई समस्या है? यदि आप इसकी कीमत बढ़ाना चाहो तो, आप जो चाहे वह कीमत बता दो।“ उस स्त्री के साथ आए पुरुष ने कहा।

“क्या मैं आपका नाम जान सकती हूँ?” वफ़ाई ने पूछा।

“क्या करोगी जान कर?”

“कोई तो नाम होगा आप का? यदि आप...।”

“मैं इस चित्रों की कीमत चेक से चुकाऊंगा तब नाम पढ़ लेना। अभी तो आप केवल कीमत बता दीजिये।“

वफ़ाई मौन हो गई।

“आप ने कीमत नहीं बताई, वफ़ाई।“ पुरुष ने आग्रह किया।

“यदि किसी और ने इन चित्रों को खरीद लिया हो तो भी हम ही इन चित्रों को खरीदना चाहेंगे, उस से भी अधिक मूल्य दे कर। आप केवल कीमत बता दीजिये। इन चित्रों को हमारे सिवा कोई और नहीं खरीदेगा।“ स्त्री ने अपना निर्णय बता दिया।

“कल शाम तक यह प्रदर्शनी चलेगी। परसों इसकी नीलामी होगी। आप तब तक प्रतीक्षा करें।‘ वफ़ाई ने कहा।

“किन्तु हम आज ही इसे खरीदना चाहते हैं।“

“आज यह संभव नहीं है। आपको प्रतीक्षा करनी होगी, परसों तक।“

“क्यूँ नहीं हो सकता आज? हम ऊंची से ऊंची कीमत देंगे।“

“मैं आपकी इस इच्छा का सम्मान करती हूँ। प्रत्येक वस्तु केवल ऊंची कीमत से ही नहीं खरीदी जा सकती।” वफ़ाई ने कहा।

“हमारे प्रस्ताव का अस्वीकार कर आप हमारा अपमान कर रही हैं, वफ़ाई।“

“और यदि मैं इन चित्रों को आज ही बेच दूँ तो देश विदेश से यहाँ पधारे अतिथियों का अपमान होगा। यह सब कला को देखने आए हैं। उन्हें मन भर कला का आनंद लेने दीजिये।” वफ़ाई ने जवाब दिया।

“वफ़ाई।” वह पुरुष क्रोधित हो उठा। उस स्त्री ने उसे रोका, ”शांत हो जाओ। हमें परसों तक प्रतीक्षा करनी चाहिए। हम प्रतीक्षा करेंगे।“

वह पुरुष और स्त्री दोनों वहाँ से चले गए। यह तमाशा देखने जमा हुई भीड़ बिखर गई। प्रदर्शनी देखने में व्यस्त हो गई।

 

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संध्या ढल गई। प्रदर्शनी का प्रथम दिवस सम्पन्न हो गया। वफ़ाई दौड़ी-भागी जीत को देखने के लिए।

“याना, जीत कहाँ है? कैसा है? मुझे उसके पास ले चलो।“ वफ़ाई व्याकुल थी।

“वफ़ाई, यहाँ आओ, बैठो। थोड़ा...।”

“विक्टर, यह कैसा न्याय है? सारा संसार, जिसका जीत से कोई सीधा संबंध नहीं है, जीत की शस्त्रक्रिया को जीवंत देख रहा है। क्षण क्षण की गतिविधि देख रहा है। मैं ही केवल ना तो जीत को देख सकती हूँ ना जीत के विषय में जान सकती हूँ। मेरे लिए जीत ही मेरा जीवन है और मुझे ही जीत से दूर रखा जा रहा है। क्यों?

याना, तुम तो एक स्त्री हो। तुम तो कुछ कहो।?

जोगन, आप भी मुझे वंचित रखना चाहती हो?” वफ़ाई ने पूरा आक्रोश व्यक्त कर दिया, वह खाली हो गई। उसकी तमाम शक्ति समाप्त हो गई। वह एक कोने में बैठ गई। नि:श्वास लेती रही। विलाप करती रही।

कुछ क्षणों तक कोई कुछ नहीं बोला, जोगन भी। समय के साथ वफ़ाई शांत हो गई।

“वफ़ाई, यह सूप पी लो।“ याना ने वफ़ाई के माथे पर हाथ फेरा, बालों को ठीक किया, गालों को स्पर्श किया। वफ़ाई ने याना की आँखों में देखा, उन आँखों में वह कोई संकेत ढूँढने लगी।

याना की आँखों के संकेत मुझे आश्वस्त कर रहे हैं। जीत अवश्य ही सकुशल होगा। मुझे धैर्य रखना होगा। मुझे प्रतीक्षा करनी होगी। मुझे स्वयम की भावनाओं पर नियंत्रण रखना होगा। मैं यह सब करूंगी। अवश्य करूंगी।

वफ़ाई ने स्वयम को वचन दिया। वह स्वस्थ होने लगी।

“वफ़ाई, यह पी लो।“ याना ने आग्रह किया। वफ़ाई ने याना के बढ़े हुए हाथों से सूप लेते समय याना को एक स्मित दिया। याना ने भी स्मित दिया।

वफ़ाई सूप पिती रही। याना, जोगन तथा विक्टर मौन बैठे रहे। मौन समय जैसे किसी की प्रतीक्षा में हो वैसे स्थिर सा हो गया।

 

 

 

 

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Hetal Thakor 2 महीना पहले

Avirat Patel 2 महीना पहले

Nikita 2 महीना पहले

Amita Saxena 2 महीना पहले

Tejal patel 2 महीना पहले