अँधेरे में जुगनू - 2 Kusum Bhatt द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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अँधेरे में जुगनू - 2

अंधेरे में जुगनू

भाग - 2

जुबान गूँगी हो गयी उसकी। उसके उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना बहन रसोई से यंत्रचलित-सी एक गिलास पानी थमाकर गुसलखाने में घुसी। उससे कुछ बोलते नहीं बना। दस मिनट बाद बहन सजी थी। यहाँ भी अभी...बिल्कुल अभी कुछ घटित हुआ था। बहन उसे घटे हुए का बोझ सहन नहीं कर पा रही थी, इसलिए वह गुसलखाने में बंद थी। नल से गिरती धार में बहा रही थी उसे...।

‘‘है भगवान् सब ठीक हो...‘‘ वह अपना दुख बहुत पीछे छोड़कर बहन के वास्ते प्रार्थना कर रही थी।

‘‘तुम...ठीक तो हो न, बिन्नी?‘‘ वह अब अपने अँधेरे से निकलकर बहन के अँधेरे में प्रवेश कर रही थी। वह पलंग के पाये पर बैठी तो बहन कुछ खोज रही थी या खोजने का बहाना कर रही थी उसके सामने। इसके लिए वह जुगनू तलाश रही थी। शायद उसे पता था कि मनू दीदी को निखालिस अँधेरे से इतना डर लगता है कि जीने की इच्छा भी मर जाती है। इसलिए वह अपनी मनू दी के लिए जुगनू पकड़ रही थी।

‘‘मुझे नौकरी मिल गई, मनू दी।‘‘ उसने हुलसकर कहना चाहा। लकिन आवाज़ अटक-अटक रही थी गले में।

‘‘सच! विनी हाथ में कागज़ों का पुलिंदा थामें उससे मुखातिब थी। वह उसका चेहरा पढ़ने लगी थी, लेकिन कुछ पकड़ पा रही थी। विनी पहली बार उसे उसके बड़े होने का आभास कर रही थी। उससे पहले वह उसे नाम लेकर ही बुलाती थी। उसके भरे कंठ से मौन आशीष फूटा- ‘‘कितनी मिलेगी तनख्वाह?‘‘

‘‘पंद्रह सौ...‘‘ विनी गर्व से कहने लगी। उसे दुखभरी हँसी आई- कुल पंद्रह सौ! बोल तो ऐसे रही है जैसे पंद्रह हजा़र मिल रहे हों? प्राइवेट स्कूलों में इतना ही वेतन होता है, वह भी जानती थी। फिर विनी तो एनटीटी ही किए थी, बीटीसी या बीएड तो नहीं।

‘‘अपनी मेहनत की कमाई पंद्रह सौ भी बहुत हैं, मनू दी। स्वावलंबन की राह... घुटन से निकलकर खुली हवा में आने का मार्ग... उसके बाद तो कई रास्ते निकलते हैं न, मनू दी! बीएड के कंपीटीशन में निकल गई तो... विनी अपने सपनों के तार खींच रही थी।

‘‘लेकिन बीएड वाले तो यांे ही बैठे हैं... तुम्हें?‘‘

‘‘उम्मीद पर ही कायम है दुनिया! नहीं हुआ तो अपना सिलाई का कोर्स कब काम आएगा।‘‘ उसकी आँखों में चमक लौट आई थी। ‘‘पराई चुपड़ी रोटी से अपनी रूखी-सूखी भली...।‘‘

एकाएक विनी को जाने क्या हुआ, उसने हाथ पीछे करके कुर्ता ऊपर किया- पीठ पर नीले... स्याह नीले निशान। उफ!

‘‘देखा मनू दी। एक आदमी के कृपापात्र बनने का नतीजा। आज उसे पता चला कि मैं... बर्दाश्त ही न कर पाया उसका अहम। चाहता है, पलती रहे विनी उसे टुकड़ों पर, गिड़गिड़ाती रहे विनी एक-एक पैसे को मोहताज़! नहीं मनू दी, विनी को और बर्दाश्त नहीं। मैंने अपना हार और कड़े बेचकर पूँजी जुटाई है!‘‘ विनी की मछली जैसे आँखों में हिंसक-सी चमक कौंधने लगी थी।

क्या सारे मर्द एक जैसे होते है? मनू सोचने लगी थी। कम से कम विशाल के बारे में उसकी धारणा कुछ ओर थी। ‘आदमी दो चेहरे क्यों पहनता है?‘ उसे उलझन होने लगी... विनी की पीठ देखते ही उसका अपना दुख गायब होने लगा।

‘‘कितना बड़ा है विनी का दुःख उसके अपने दुख से! विनी रोज़ कुँआ खोदकर पानी पी रही थी। जब उसकी शादी हुआ थी, इंटरमीडिएट थी वह। अपने बलबूते उसने डबल एम.ए. किया। सिलाई-कढ़ाई का कोर्स, एनटीटी और अब बीएड! लोगों के कपड़े सिलकर जो दो पैसे उसे मिलते उसी से जुटा रही थी वह अपना खर्चा। महंगाई सुरसा के मुख-सी बढ़ रही थी। विनी ब्लाउज़, पेटीकोट, फ्राॅक आदि सिलते हुए शानदार भविष्य के सपने देख रही थी और उसके पति विशाल उसके शानदार सपनों पर नीले स्याह निशान बना रहा था। विनी थी कि विशाल की हिंसक और कुंठित कामनाओं को अँधेरे में गायब करने की जिद ठाने थी।

विनी अब उसके लिए चाय बना रही थी। उसने पाया, विनी अपने घावों को उधेड़ते हुए दयनीय नहीं थी। उसका विश्वास उसके भीतर से बहकर उसके सांवले चेहरे पर जमने लगा था। उसे विशाल की ंिहंसक वारदातों की चर्चा करने के लिए अपनी ऊर्जा को अब और नष्ट नहीं करना करना था। चाय पीकर विनी सिलाई की मशीन पर बैठ गयी तो उसे पेटीकोट सिलते देख मनू बोली, ‘‘तू बहुत व्यस्त लग रही है... मैं चलूँ?‘‘

वह भारी मन से उठने को हुई। बोझ अभी भी था कंधों पर। सिर्फ कुछ देर के लिए विनी के अँधेरे में गायब हुआ था। इस बोझ से उसे छुटकारा पाना था, पेड़ की हरी-हरी पत्तियों के नीचे की छाया में उतारना था उसे। फिर लेनी थी जीवन की एक उम्मीद- क्षीण-सी उम्मीद-भरी उसांस...

मगर विनी थी कि पेटीकोट सिलने में उसकी उपस्थिति भूल रहीे थी। वह विनी की बड़ी दीदी थी और विनी को अहसास नहीं था कि उसकी मनू दी की दुनिया में क्या घट रहा है। क्या विनी अनुमान लगाने में असमर्थ थी कि सबुह अचानक उसकी मनू दी क्यों आ गई है उसके पास? इससे पहले तो इतनी सुबह वह कभी नहीं आयी थी!

‘क्या कारण है?‘ इस वाक्य को अपनी बुद्धि के तल से क्यों नहीं खींच पा रही थी विनी? इस कारण कि सुरंग में घुसने के लिए विनी केा अतिरिक्त ऊर्जा चाहिए थी? वह अपने भीतर ही उ़लझने लगी थी- खड़ी-खड़ी, बोझ को छाती-बाहों में थामे।

विनी ने पेटीकोट सिल दिया था; यानी बीस रूपये का नोट उसकी सूखी सांवली हथेली में था! अब विनी तनाव-रहित पूछ रही थी- ‘‘क्या बात है मनू दी? सब ठीक तो है न?‘‘

‘‘सबकुछ पता है मुझे, मनू दी, लेकिन... ? उसकी आँखे कह रही थीं। देख विनी ने उसे बाँह पकड़कर बिठा दिया - ‘‘नमक बचाए रखना ज़रूरी है, मनू दी!‘‘

उसके कंधों से बोझ उतरकर फर्श पर गिर रहा था- ‘‘पार्थ की किताबें लेने आई थी।‘‘

उस क्षण को मनू ने भी एक ज़िद की तरह अँधेरे में धकेलने का उपक्रम कर दिया था... वह अब विनी की उँगली पर बैठा जुगनू थाम रही थी....!

***