हवाओं से आगे - 14

हवाओं से आगे

(कहानी-संग्रह)

रजनी मोरवाल

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पीली तितलियाँ

(भाग 2)

उम्र तो ऐसी कोई खास नहीं हुई उसकी फिर भी सुमि के पैरों में दर्द रहने लगा है, उम्र को कोई ऐसी भी नहीं गुज़री उस पर बस समय और जीवन की बढ़ती जिम्मेदारियों ने उसे थका दिया था, विपिन तो कई दिनों से उसे प्रोत्साहित कर रहे हैं कि उसे अपने नृत्य को फिर से गंभीरता से लेना चाहिए पर दुनिया इतनी तेज़ी से बदली है । सुमि अपने-आपको पिछड़ता हुआ मान बैठी है ।

“ऐसा कुछ खास नहीं बदला वह भी कला के क्षेत्र में, बेसिक तो तुम्हें रटा पड़ा है, आखिर विशारद हो, कुछ क्लाससेस तो तुमने तिरुवनंतपुरम में भी जॉइन की थी । बस ज़रा सी हिम्मत करने की जरूरत हैं, नृत्य तुम्हें खुशी देता है मैं जानता हूँ इसीलिए मैंने तुम्हें हमेशा ही प्रोत्साहित किया है, मानता हूँ घर-गृहस्थी तुम्हारे लिए प्राथमिकता रही है पर अब तो हम मुक्त हैं”

“मन जब मुक्त हो तब पंख उड़ान भरना ही चाहें ये जरूरी तो नहीं है, इच्छायें-आकांक्षाएँ भी कुछ होती हैं”

“प्रेरणा की उड़ान जब पंख पसारेगी तो तुम भी खुद को रोक नहीं पाओगी, चलो मैं आज ही तुलसा माँ से

कहकर तबला और घुंघरू निकलवाता हूँ”

“हाँ...तुम ही निकलवाओगे” सुमि को अनचाहे भी कभी-कभी विपिन पर खीज होने लगी है,

“कुछ कहा तुमने ?”

“नहीं....यूं ही”

“तुम आजकल मर्मरिंग करती हो, खीझने लगी हो सुमि तुम, शायद उम्र के इस मोड पर यह सब होता होगा”

“ख़यालों के गुबार हैं निकल जाते हैं” दरअसल तो सुमि कहना चाहती थी तुम जो ये वोलेंटरी रिटायरमेंट के बाद मेरे सपने जीने लगे हो इन्हें बंद करो, अपने सपने तुम खुद देखो, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो, तुम्हारे साथ के अलावा भी मेरी अपनी एक सोच हो सकती है...कोई प्रायवेसी हो सकती है किन्तु वह अपने उद्गार इज़हार नहीं कर पाती । स्त्रियॉं को चुप रहना प्रकृति गर्भ में ही सिखा देती है यदि कुछ कमी रह जाती है तो दुनियावी रिश्तों की कहानियाँ गुनते-बुनते वे सीख ही जाती हैं,

“हम खुलकर बात कर सकते हैं सुमि, मैं स्त्रियॉं की बराबरी का हकदार रहा हूँ ।”

“जानती हूँ पर ये बात तुम्हारे और मेरे बीच की नहीं, ये बात मेरे और सिर्फ मेरे बारे में है जिसे मुझे स्वयं से बूझना है ।” सुमि कैसे बताए कि मेरे स्व को मेरे अपने लिए छोड़ दो, फैसला मुझे लेने दो और अपना जीवन अपने हिसाब से जिओ, वह चुप ही रह जाती है ।

अगला दिन कड़ी धूप से चमचमाता हुआ उगा था, गली से बाहर झाँका तो गहन सन्नाटा साँय-साँय कर रहा था ।

“ब्रंच का ख़्याल अच्छा रहेगा ?”

“हम्म... सुमि थोड़ा सकपकाई, विपिन उसके ठीक पीछे सटकर खड़ा था ।

“इस कड़ी धूप में जहाँ हवा का नामोनिशान भी नहीं, एक पत्ता भी कहीं जो हिलता दिख जाए तो देखो ...प्रकृति रूठी हुई है हमसे ?”

“नहीं...दरअसल हमने अपनी बेपनाह चाह से उसकी साँसे घोंट दी” वो एक क्या तो शेर है ‘ओबेदुल्ला अलीम’ के “अज़ीज़ इतना ही रखो कि जी संभल जाये, अब इस कदर भी न चाहो कि दम निकल जाए ।”

“बेपनाह चाह भी कभी किसी की साँसे...?”

“वो एक क्या तो शेर है ‘ओबेदुल्ला अलीम’ का “अज़ीज़ इतना ही रखो कि जी संभल जाये, अब इस कदर भी न चाहो कि दम निकल जाए”

“ओह...” विपिन अपने वाक्य को अधूरा छोड़कर अचानक सुमि से दूर छिटक गया था । सुमि भी रसोई की तरफ चल दी थी, तभी रेडियो पर एक गंभीर आवाज़ गूंजी थी । सुमि ठिठक गयी थी ।

“आज के कार्यक्रम में हमने चुने हैं फ़िल्मों से कुछ बेहतरीन नगमें जिनमें आपको एक से बढ़कर एक क्लासिकल नृत्य के बेमिसाल नगीने सुनाएँगे ।” उसने तुलसा माँ को देखा और एक सहमति जो बरसों से उन दोनों के मध्य ठहरी थी कि जिसको शब्दों में ढालने की जरूरत न पड़ी । तुलसा माँ ने घुँघरू सुमि के पैरों में यूं बांधे जैसे पूजा की तैयारी कर रही हो । वाकई सुमि के लिए नृत्य कला किसी पूजा की तरह ही था ।

“होली के रंग चारों और बिखरे हैं और ऐसे में एक नार नवेली चली कुछ यूँ इठलाकर कि चारों दिशाएँ उसके साथ संग झूम के नाच उठी, पहला गाना सुनिए फिल्म नवरंग से”

“धागिन धिनक धिन

धागिन धिनक धिन

धागिन धिनक धिन

अटक-अटक झटपट पनघट पर

चटक मटक इक नार नवेली

गोरी-गोरी ग्वालन की छोरी चली

चोरी-चोरी मुख मोरी-मोरी मुसकाये अलबेली

कंकरी गले में मारी कंकरी कन्हैया ने

पकरी बांह और की अटखेली

भरी पिचकारी मारी सरररररररररर

भोली पनिहारी बोली सरररररररररर”

सुमि एक के बाद एक कई गानों के पर नाची, जब थककर ढह गई तो दो जोड़ी हथेलियों की तालियों के साथ कुछ आँसू भी थे जो उसकी स्वयं की आँखों से बह रहे थे । विपिन न जाने कब आकार वहाँ बैठ गए थे और उस वक़्त उसे बस मंत्रमुग्ध हुए देखते रहे थे । जब सुमि सामान्य हुई तो दो लिफ़ाफ़े उसके हाथों में थमाते हुए विपिन ने कहा था -

“और यहाँ तुम अकेली जाओगी, चाहो तो तुलसा माँ को ले जाना पर मैं कुछ व्यस्त हूँ ।”

सुमि ने देखा लिफाफों में दूरदर्शन पर उसके कार्यक्रम की प्रस्तुति के लिए निमंत्रण पत्र था तो दूसरा एक टॉक शो का था, जिसमें उसे रेडियो पर जिसमें “कत्थक नृत्य का इतिहास” विषय पर एक्सपर्ट के तौर पर अपने विचार रखने थे । सुमि की आँखों से झरते आँसुओं में खुशी के साथ एक आत्मविश्वास भी था कि अभी भी बहुत देर नहीं हुई है, अभी भी उसके सपने ज़िंदा हैं ।

दूरदर्शन कार्यक्रम के लिए महीने भर का समय बाक़ी था, किन्तु टॉक शो नजदीक था । सुमि ने विशारद तक की सभी किताबें पढ़ी और नोट्स तैयार किए । बहुत तैयारी के बाद भी एक भय था जो हर वक़्त उसके साथ-साथ सफर करता रहा था । यहाँ तक जब वह माइक के साथ ऑन एयर थी तब तक किन्तु एक बार जो बोलना प्रारम्भ किया उसने तो मस्तिष्क की सोयी सभी नसें स्मृतियों को झंकृत कर गयी थीं ।

“आप बहुत प्रवाह में थीं, आपकी बातें तार्किक और प्रभावपूर्ण थीं ।”

“जी शुक्रिया... वो मैंने पहली मर्तबा इस तरह के किसी टॉक शो में भाग लिया तो कुछ घबराहट थी मन में ।”

“हर काम कभी न कभी पहली दफ़ा होना ही होता हे, अन्यथा न ले तो एक बात कहूँ?

”जी कहिए ।”

“आपको कहीं देखा हे... क्या आप M/79 बँगले में रहती थीं ?”

“जी... आप अब भी है को हे कहते हैं ?” सुमि ने सकुचाते हुए पूछ ही लिया था ।

“जी... तो आप वही ? तभी मैं कहूँ कि ये आँखें... बहुत बोलती-सी !” वह कुछ झिझका था ।

“तो आप वहाँ से यहाँ आ पहुंचे ?”

“और आप वहाँ से यहाँ ?”

“जी वक़्त रंगीन से सफ़ेद हो बैठा ।” सुमि ने दोनों के बालों को इंगित करते हुए कहा था ।

“रंग महज़ धोखा हे निगाहों का, वगरना ज़िंदगी स्याह या सफ़ेद ही होती हे बस सफ़र के साथ-साथ हम इस सच्चाई पर एतबार करना सीख जाते हे ।” वह कुछ-कुछ दार्शनिक होने लगा था ।

“बातें बनाना आपका काम ठहरा, कार्यक्रमों में यही तो करते हैं ।”

“काम हे मेरा वह ।”

“अच्छा तो चलूँ ?”

“एक कप चाय हमारे यहाँ की रवायत हे जो कुछ समय रुक पाओ ?”

“बड़ी फैन फोलोइंग हैं भई तुम्हारी ! माफ कीजिये मैं बेख्याली में आपको तुम कह गयी ।”

“बेख्याली तो रही हे, वह भी इतनी कि तू से आप तक आ पहुँची ?” वह लौटा रहा था सुमि को वहीं जहां वह लौटना नहीं चाहती थी । सुमि चुपचाप चाय की चुस्कियाँ लेने लगी थी ।

“मेरी वजह से तुम फ़ेल हो गए थे । दरअसल मैं आत्मग्लानि से मुक्त हो जाऊँ जो माफ़ कर पाओ ?”

“माफ़ी... हाहाहा...! मैं तो तुम्हारा शुक्रगुजार हूँ । जो न फ़ेल होता तो आज यहा होता और ये जो फैन फोलोइंग जो अभी तुम कह रही थी ।”

“हम्म...”

“तुम ज़रा भी नहीं बदली, वही जलन... जो सिर्फ़ हम्म कहकर ज़ब्त करने का हुनर था अब तक नहीं बदला ?” वह लगातार हँस रहा था, मगर सुमि झेंप गयी थी । वह कहना चाहती थी कि बदल तो सब कुछ गया है, हम यकीन ही न करना चाहें तो बात अलग है मगर जाहिराना तौर पर बोली ।

“विपिन इंतज़ार कर रहे होंगे अब चलना चाहिए मुझे ।”

“तो चलो फोन नंबर बदलने की औपचारिकता भी पूरी कर लें, वैसे यहाँ सब पार्टीसीपेंट्स के नंबर दर्ज़ होते हैं पर मैं ये गुस्ताख़ी तुमसे ही नंबर लेकर करूंगा, क्योंकि वह जानकारियाँ हमारी ऑफिसियल होती हैं ।”

“यकीनन...” तो अब मैं चलूँ ?”

“उस खरोंचे गए प्रश्न के लिए मुझे माफ़ कीजिएगा, हालांकि वह प्रश्न मैंने ज़िंदगी में किसी से नहीं पूछा, अपनी पत्नी से भी नहीं । बाय... ऑल द बेस्ट फॉर यौर सेकंड इनिंग्स ! वह गेट तक चला आया था ।”

“न... न... बाय नहीं कहते, ये निहायत मनहूस शब्द है ।” सुमि के मुंह से शब्द फिसल गए थे अनायास ही । वह कार में बैठकर निकाल चुकी थी । घर पहुँची तो व्हाट्स एप में एक पीली तितली मंडरा रही थी ।

“इसका मतलब ?”

“अजनबी दुनिया में किसी पहचाने से मिलने पर एक हग तो बनता है ।”

“मगर पीली तितली ?”

“पीला रंग ऊर्जा, उमंग, आत्मविश्वास, ख़ुशी और सकारात्मकता का प्रतीक होता है और इस तितली को गौर से देखो ! इसके पंख... जैसे बाहें फैलाए गले मिलने का गुमाँ देती हे, तुमसे गले नहीं मिल सकता तो यही भेज दी ।”

“मंजूर... मगर पहले एक वादा करो कि तुम ‘हे’ को ‘है’ कहोगे और वह जो कार्यक्रम में लगातार बोलने से तुम्हारे होंठ सूख जाते हैं न तो एक अजीब-सा ‘चप्प’ सुर निकालता है उसे सुधार लोगे ।”

“वादा...! तुम भी अपनी रियाज़ जारी रखना, इस नए आगाज़ को मंज़िल जरूर मिले । परिवार सहित मिलते हैं ।”

सुमि ने यहाँ-वहाँ झाँककर देखा टीपी विपिन बेसब्री से बगीचे में चहलकादमी कर रहे थे । सुमि जानती है विपिन अक्सर स्ट्रैस को मैनेज करने के लिए चहलकदमी करते हैं । उसे देखते ही उत्साह से बोले -

“कैसा रहा ? तुम घबराई नहीं होंगी, मैं जानता हूँ, तुम्हारी तैयारी बढ़िया थी । मैंने फोन करके तुम्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहा हालांकि मन को समझाना मुसकिल था ।”

बिना किसी सवाल का जवाब दिये सुमि जाकर विपिन से लिपट गई थी । विपिन ने सुमि को अपने से दूर हटाते हुए तनिक बनावटी लहजे में कहा था-

“क्या हुआ भई ? चलो-चलो अब अगली तैयारी मे जुट जाओ !” रुआंसी हो आई सुमि ने कहा-

“वह देखो पीली तितलियाँ !”

“कहाँ...?” विपिन उसे हैरत में देखते रहे फिर दोनों खुलकर हँस पड़े । हजारों-हज़ार पीली तितलियाँ कमरे में उड़कर सुमि के इर्द-गिर्द मँडराने लगी थीं ।

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Girjesh Pal 3 सप्ताह पहले

Atul Shankar 2 महीना पहले

S Nagpal 2 महीना पहले

Sudha Mishra 2 महीना पहले

Mewada Hasmukh 2 महीना पहले