हिम स्पर्श- 69

69

अचानक जीत ने अपने हाथों को खींच लिया। वफ़ाई की प्रेम की लहरें ज्वाला में बदल गई। आग का एक दरिया उभर आया जो धधक रहा था। वफ़ाई us आग में जलने लगी।

वह चिख उठी, “जीत, मत जाओ, मुझे स्पर्श करो, मेरा हाथ पकड़ो, मेरे समीप आओ, मुझे आलिंगन दो, जीत।”

वफ़ाई की चीख मरुभूमि की नि:शब्द रात्री में विलीन हो गई। वह फिर चीखी। चीख फिर से विलीन हो गई। वह तड़प उठी। उस अग्नि को वफ़ाई सह न सकी। वफ़ाई ने आँखें खोल दी। वह जीत को ढूँढने लगी। जीत कहीं नही दिखा।

  वफ़ाई ने गगन की तरफ देखा। चन्द्र अभी भी उस गगन की शोभा बन बैठा था। वफ़ाई को शीतल और श्वेत चन्द्र लाल दिखने लगा। वह चन्द्र को देखती रही। देखते ही देखते चंद जलने लगा। वफ़ाई की अगन ज्वालाओं में जलकर भस्म हो गया। गगन में चारों तरफ धूँआ छा गया।

“जीत, कहाँ हो तुम?” व्याकुल वफ़ाई फिर चीखी। चित्र के पीछे से जीत ने ध्वनि दी,”मैं यहाँ हूँ।“

“बाहर आ जाओ। ऐसे कब तक छिपे रहोगे?”

“मैं ... ।“

“तुम बाहर आ जाओ फिर कहो जो कहना हो।“

“कहीं तुम गुस्सा तो नहीं?” संकोच के साथ जीत वफ़ाई के सामने आया।

“गुस्सा? मैं तो नाराज भी हूँ। पर तुम्हें क्या?”

“नाराज मत हो, वफ़ाई। मुझे तुम्हारी चिंता ...।”

“यदि होती तो इस तरह चले नहीं जाते। बीच सागर मुझे छोडकर भाग नहीं जाते। तुम जानते भी हो कि मैं किस आग से ...?”

“मैं सब जानता हूँ।“

“तो फिर?सब कुछ जानते हो फिर भी तुम मुझे तड़पा रहे हो। किस बात का प्रतिशोध ले रहे हो तुम?”

“वफ़ाई, मैं तुम्हें कोई आश नहीं बंधाना चाहता हूँ। तुम्हें तड़पाने का कोई आशय नहीं है मेरा। किंतु...”

“Kintu क्या? क्या चाहते हो तुम?”

“मैं कुछ बचे क्षण हूँ और तुम एक पूरा युग हो। मैं युग तक चल नहीं सकता। कुछ क्षण भर के कर्मों का दंड पूरा युग भुगते ऐसा मैं नहीं चाहता। मैं तुम्हें कुछ क्षण ही दे सकता हूँ, युग नहीं।“ जीत ने कहा।

“युग क्या होता है? क्षण के बिंदुओं का एक दरिया? युग के सागर से क्षण की एक बूंद भी हटा कर तो देखो, सारा दरिया खाली हो जाएगा। युग का होना अथवा कल का होना केवल एक भ्रम ही तो है। छल के सिवा कुछ नहीं है यह सब। कल ना तो था ना ही होगा। युग भी तो नहीं था और ना होगा। सत्य है तो केवल यही क्षण जो तुम अभी जी रहे हो। जो क्षण वर्तमान में है उस के सिवा समय का कोई अस्तित्व ही नहीं है। जो क्षण हाथ से छुट गया वह समय मर गया, दफन हो गया, जलकर राख हो गया। अगले पल आने वाला क्षण भी अभी तो केवल एक पुतला सा ही तो है। उस क्षण में ना तो जीवन होता है ना जीवन का रस। एक लाश और एक पुतले के बीच हमें जीना होता है, वही जीवन है, वही शाश्वत है।“ वफ़ाई के शब्दों में हाथ से छुट गए पल की पीड़ा थी, वेदना थी। वफ़ाई अभी भी एक अग्नि में जल रही थी।

वफ़ाई की उस अग्नि को अपने हाथों से शांत कर देना चाहता था जीत, किंतु वह विवश था। अपने विचार एवं धारणाओं में बंदी था वह। जीत ने उस कारावास ko तोड़ने का प्रयास नहीं किया। वह एक पुतले सा स्थिर ही रहा।

“जीत, तुम कुछ कह रहे थे इस चित्र के विषय में।“ वफ़ाई ने अपने अंदर की अग्नि को शांत करने के प्रयास में बात का बदलना चाहा। वह विफल रही।

“वफ़ाई, मैं एक लाश भी हूँ और पुतला भी हूँ। मेरे अंदर जो कुछ भी था, मर चुका है। बीते हुए कल की लाश अपने कंधों पर लिए फिर रहा हूँ। यह बोझ मुझे आगे चलने नहीं दे रहा। आने वाला क्षण, आनेवाला कल अनिश्चित है। कितने क्षण आएंगे वह भी तो नहीं ज्ञात मुझे... ।“

“तो क्या मैं कोई अमरत्व लेकर आई हूँ? तुम क्या समझते हो कि मेरे पास कभी ना खाली होने वाले क्षणों का भंडार भरा है? कोई नहीं जानता कि आनेवाला क्षणकिसके लिए क्या लेकर आएगा। तुम मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे हो और मैं मृत्यु को सोचती भी नहीं। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि तुम्हारी मृत्यु से पहले मेरी मृत्यु नहीं हो सकती। हो सकता है तुम्हें डराकर मृत्यु मुझे ले जाय। मृत्यु का लक्ष्य तूम ना होकर मैं होऊँ। तुम कभी इसकी चाल नहीं जान सकते। यह मृत्यु बड़ा चालबाज़ होता है....।“

जीत वफ़ाई के शब्द सह नहीं पाया। जीत नाम की एक लाश विचलित हो गई, जीत नाम का एक पुतला जीवित हो उठा। जीत वफ़ाई के पास दौड़ गया। जीतने वफ़ाई के अधरों पर हाथ रखा दिया,” बस। आगे और कुछ मत कहना।“ वफ़ाई मौन हो गई।

जीत ने वफ़ाई के कंधों पर दोनों हाथ रख दिये, वफ़ाई की आंखों में आँखें डाल दी। ऊन आँखों में अनगिनत भाव थे, जीत ने उसे पढ़ने की चेष्टा नहीं की।

एक गहरी सांस लेकर जीत ने वफ़ाई को अपनी तरफ खींचा और अपने आलिंगन में ले लिया। वफ़्फ़ई को अच्छा लगा। वह स्वयं जीत के आलिंगन में बस गई। वफ़ाई ने अपनी पलकें झुका दी। जीत ने वफ़ाई को और समीप खींचा।

समय का एक क्षण भी नहीं बिता था कि वफ़ाई ने जीत को पीछे धकेला और जीत से अलग हो गई। वफ़ाई दो कदम पीछे गई। जीत भी तो दो कदम पीछे चला गया था। दोनों के बीच का अंतर जो क्षण  भर पहले शून्य था, अब चार पाँच कदम का हो गया था।

जीत चौंक गया।

क्या चाहती है वफ़ाई? एक क्षण तो वह समीप आने के लिए खुला आमंत्रण देती है तो दूसरे ही क्षण निकट आते ही दूर धकेल देती है। आखिर बात क्या है? 

“क्या बात है वफ़ाई? तुम क्या?”

“दूर ही रहो तुम मुझ से।“ वफ़ाई ने गुस्सा दिखाया, बल्कि नाराझजी भी जताई। उस ने अपने दोनों हाथों को झटक दिया, जैसे किसी वस्तु को अपने आप से अलग कर रही हो। जीत इस गुस्सेका, इस नाराजगी का कारण समझ नहीं पाया।

“वफ़ाई यह क्या? एक तरफ तुम मुझे जिंदा लाश और पुतला बताती हो और इन दोनों के बीच जो क्षण है उसे ही सत्य मान कर जीने को कहती हो। और जब मैं उस kshan को पकड़कर चलने लगा तो तुम मुझ से दूर जा रही हो। मुझे दूर कर रही हो, मुझे दूर ही रहने को कह रही हो। तुम्हारी आँखों में आया हुआ यह गुस्सा और यह नाराजगी का अर्थ क्या है? आखिर कुछ तो है जो मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। कहो न क्या बात है?”

“सुनना चाहते हो इस बात का अर्थ? साहस है इतना तुम में?” वफ़ाई ने जीत को उकसाया।

“तेरे साथ ने मुझे साहसी बना दिया है। तुम कहो, बिना भय के कहो।“

“दो बातें है जो तू समझ नहीं पाया। एक, तूने हंमेशा से मुझ से दूरी ही रखी है। जब भी मैंने तेरे समीप आने का प्रयास किया है, तू मुझ से पहले से भी अधिक दूर हो जाता है। अर्थ इस का यह है कि तू मुझे तेरे समीप नहीं चाहता।“

“किंतु मैं ही तो आया था तेरे समीप अभी अभी।“

“नहीं। तू स्वयं मेरे पास नहीं आया था। तू अपनी इच्छा से मेरे समीप आता तो यह बात नहीं होती।“

“तो फिर यह क्या था?”

“मेरे कहे गए कुछ शब्द तुझे मुझ तक खींच लाये थे। मैंने जब मेरी मृत्यु की बात कही तब तुम मेरी तरफ बढ़े। क्या मेरे पास तुम तब ही आओगे जब मेरी मृत्यु आएगी और मैं एक लाश बन जाऊँगी? यदि ऐसा ही है तो फिर क्या? तुम लाश बने रहो अथवा मैं लाश बन जाऊँ। क्या दो जीवित व्यक्ति एक दूसरे के समीप, एक दूसरे के सानिध्य में नहीं रह सकते? जब तक तुम मुझे अपने अंदर से नहीं चाहोगे तब तक तुम मुझे पा नहीं सकोगे। तुम्हें मुझे अपने अंदर से चाहना होगा।” वफ़ाई ने एक गहरी सांस ली और मौन हो गई।

जीत मौन ही था, मौन ही रहना उचित समझा। क्षणों को बितने दिया दोनों ने।

लाश और पुतले के बीच का क्षण काल गति से बीतता रहा। पुतले वाला क्षण वर्तमान में और वर्तमान का kshan लाश में बदलने लगा। ना जाने कितने क्षण ऐसे ही लाश बन गए, दोनों को ज्ञात नहीं रहा। इन क्षणों के साथ साथ चन्द्र भी गगन में चलता रहा। हवा भी चलती रही। कुछ बादल भी चलते रहे। स्थिर थे तो केवल दो व्यक्ति- वफ़ाई और जीत। दोनों खड़े थे अपने अपने स्थान पर, चार पाँच कदम के अंतर पर। दोनों की द्रष्टि झुकी हुई थी, जैसे धरती के अंदर छिपी किसी वस्तु को खोज रही हो।

“कब तक मौन रहने की इच्छा है?” जीत ने मौन के भार को हटाने का प्रयास किया।

“मेरी इच्छा से क्या होता है?” वफ़ाई ने अभी भी सुर नहीं बदला था।

“तुम कह रही थी कि मैं दो बातें नहीं समझ पाया। यह दूसरी वाली बात कौन सी है?”

“दूसरी बात कदाचित तुम अभी भी समझ ना पाओ।“

“तुम बताओ तो सही। मैं पूरा प्रयास करूंगा, हो सकता ही कि समझ आ जाय।“ जीत ने वफ़ाई को स्मित देने का प्रयास किया। वफ़ाई ने उस स्मित की उपेक्षा की।

“तो सुनो। तुम जानते हो, प्रत्येक क्षण अपने साथ एक भाव लेकर आता है। जिस क्षण में मैं तेरी झंखना कर रही थी वह क्षण मेरे अंदर एक उन्माद था। प्रत्येक क्षण  का एक उन्माद होता है। उस क्षण को हमें पकड़ना चाहिए। अब वह क्षण बीत गया। वह लाश बन गया। लाश का कोई उन्माद नहीं होता। अब यह क्षण शांत है। उन्माद वाला वह कि क्षण जब कभी आए तो उसे खो मत देना।“

“तो यह क्षण कौन सा भाव लेकर खड़ा है हम दोनों के बीच?” जीत ने दुविधा में पूछा।

“यह क्षण गुस्सा भी है और नाराज भी है।“ वफ़ाई ने अपना ध्यान जीत पर से हटा दिया। वह जीत द्वारा बनाई गई अपनी ही छवि को देखने लगी।

जीत ने अति सुंदर चित्र बनाया था वफ़ाई का। आँखों में जो भावों का सर्जन किया गया था वह भी अदभूत था। कदाचित जीत का यह सर्व श्रेष्ठ चित्र था। वफ़ाई को अपना ही चित्र लुभाने लगा, मोहीत करने लगा। वह विचारों में खो गई।

सत्य क्या है? मैं जो यहाँ स्वयं जीवित हूँ वह अथवा यह छवि जो जीवित नहीं हो कर भी जीवित सी लगती है?

मैं क्या हूँ? मैं कौन हूँ? मेरा अस्तित्व सत्य है या इस चित्र का? मैं बिम्ब हूँ या प्रतिबिंब? मैं सत्य हूँ या कोई भ्रम? अपनी ही छवि में स्वयं को ढूँढने लगी हूँ मैं। स्वयं से ही उलझ गई हूँ मैं।

कुछ क्षण पश्चात वफ़ाई शांत हो गई।

“जीत, तुम कुछ कह रहे थे इस चित्र के विषय में।“

“हाँ, मैं कह रहा था कि” जीत चित्र के पास गया,  हाथ में तूलिका ली, रंग में डुबोया, “यहाँ देखो। यह तुम्हारे माथे पर एक काली सी बिंदी दिख रही है?” जीत तूलिका को वहाँ तक ले गया।

“हाँ, दिख रही है। बड़ी सुंदर लग रही है।“

“नहीं वफ़ाई, यह सुंदर नहीं है। वास्तव में यह तूलिका जब मेरे हाथ से गिर रही थी तो उसने होठों के साथ साथ माथे पर भी यह काला रंग छोड़ दिया था। मेरे मूल चित्र में यह नहीं था। यह ...।”

“तो क्या हुआ? तूलिका भी उचित स्थान देख कर ही अपना रंग छोड़ती है।“

“तुम तो कभी माथे पर बिंदी नहीं लगाती हो।“

“तो क्या हुआ?”

“मेरा मानना है कि तुम बिंदी पसंद नहीं करती। यदि तुम्हारी पसंद नहीं है तो फिर चित्र में भी वह नहीं होनी चाहिए। चित्र अवास्तविक लगेगा।“

“किस ने कहा कि मैं बिंदी पसंद नहीं करती?”

“मैंने कभी तुम्हारे माथे पर बिंदी देखि ही नहीं।“

“हाँ, यह बात भी है कि मैंने कभी बिंदी लगाई ही नहीं। अरे, मेरी पर्स में भी बिंदी नहीं है।“

“तो मैं इस बिंदी को यहाँ से हटा देता हूँ।”

“बिंदी चित्र से हट सकती है किंतु इस समस्या का समाधान और भी तो हो सकता है।

“वह क्या है?

“मेरे माथे पर भी तो बिंदी लगा सकते हो।”

“तुम्हारे माथे पर? मतलब यह कि तुम अब बिंदी लगाना चाहती हो? नहीं मैं यह नहीं कर सकता। मैंने मेरे चित्र में जो भूल की है उसे मिटाना चाहूँगा। मैं दूसरी कोई भूल नहीं करना चाहता।“

“ऐसा क्यूँ?”

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Amita Saxena 2 महीना पहले

Bharati Ben Dagha 2 महीना पहले