हिम स्पर्श - 65

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मैं बार बार क्यूँ अकेला हो जाता हूँ? जब भी कोई मेरा साथी बन जाएगा ऐसी अपेक्षा जागती है तब ही वह मुझसे बिछड़ जाता है। यह कैसा खेल है मेरे साथ, ए जिंदगी तेरा?

किन्तु यह अकेलापन तो तुमने ही पसंद किया था। तुम ही तो चले आए थे इस मरुभूमि में। तो अब क्या हो गया?

मेरे इस अकेलेपन को क्यूँ भंग कर देता है मेरा भाग्य? क्यूँ बार बार कोई आशा जगा कर चला जाता है?  

ना तो तुम अकेले हो और ना ही कोई तुम्हें छोड़ कर गया है।

तो यह क्या है? तुमने भी तो देखा है न कि वफ़ाई अभी अभी यहाँ से गई है? और अब यहाँ कोई नहीं है।

तुम सोचते ही गलत हो।

तो सत्य क्या है?

सत्य तो यही है कि कहने को तो तुम अकेले हो किन्तु थोड़ी भिन्न द्रष्टि से देखोगे तो पाओगे कि तुम अकेले नहीं रहोगे। तुम्हारे साथ वफ़ाई होगी। पिछले दिनों वफ़ाई ने तुम्हारे जीवन को रस से भर दिया है। यहाँ के कण कण में तुम्हें वफ़ाई के होने का अनुभव होगा। यहाँ की हवा में, रेत में, भीत में, केनवास में, रंगो में, चित्रों में, तूलिका में, कक्ष में, भोजन में, नींबू सूप में और सब से विशेष इस झूले में जिस पर तुम अभी बैठे हो, तुम्हें वफ़ाई का स्मरण आता रहेगा। वफ़ाई ने यहाँ की प्रत्येक वस्तु को अपने स्पर्श से जीवंत बना दिया है। अब तुम पर है कि तुम इन सब में वफ़ाई के होने का अनुभव कैसे करते हो।

तुम ठीक कह रहे हो। मैं यह कैसे भूल गया? तुम्हारा धन्यवाद मुझे यह सब याद दिलाने के लिए।  

इन स्मरणों के साथ दिन व्यतीत कर लो। कल तो वफ़ाई लौट आएगी।

क्या वफ़ाई लौट आएगी?  

इतना तो विश्वास होना चाहिए तुम्हें। और यदि नहीं है तो तुम वफ़ाई को पहचानने में भूल कर बैठे हो।

नहीं नहीं। मेरा विश्वास कहता है कि वफ़ाई अवश्य आएगी।

वह अकेलापन कुछ भिन्न था। जीत के साथ वफ़ाई का स्मरण था। वफ़ाई के लौटने की आशा थी। वफ़ाई के साथ रहते हुए जागी जिजीविषा थी। साथ में एक संशय भी था कि वफ़ाई लौट कर आएगी अथवा नहीं? 

आशा और संशय मिश्रित भावों के साथ जीत ने झूला चला दिया।  

वास्तव में कुछ दिवस ही तो हुए थे, वफ़ाई को यहाँ आए हुए। किन्तु ऐसा क्यूँ प्रतीत होता है कि जैसे वफ़ाई महीनों से, वर्षों से, अथवा जन्मों से मुझ से जुड़ी हो? लोग तो कहेते हैं कि यदि तुम कोई बात इक्कीस दिवस तक करोगे तो वह बात स्वभाव बन जाती है। किन्तु वफ़ाई को तो अभी इतने दिवस हुए भी नहीं। तो वफ़ाई का साथ मेरा स्वभाव कैसे बन गया? लोग असत्य कहते है।  

तो सत्य क्या है?

जो तुम स्वयं अनुभव कर रहे हो। कोई बात जब स्वभाव बन जाती है तो वह किसी नियमों को नहीं मानती। बस स्वभाव बन जाती है।

ठीक है। चलो छोड़ो। आज तो रसोई मुझे ही बनानी पड़ेगी। अकेले ही भोजन करना पड़ेगा। कोई नहीं आएगा।

जीत ने घड़ी देखि। यही समय है रसोई बनाने का। वह झूले से उठा, रसोई घर की तरफ चला। एक द्रष्टि झूले पर डाली। वह अभी भी धीरे धीरे झूल रहा था। जीत को आभास हुआ कि धीरे धीरे झूल रहे झूले पर वफ़ाई झूल रही है। वफ़ाई के खुल्ले केश हवा में लहरों की भांति उड रहे हैं। वफ़ाई के अधरों पर मीठा सा स्मित है। आँखों में एक भाव है जो उसे आमंत्रित कर रहा हो!

जीत दौड़ गया झूले तक। दोनों हाथ फैलाकर वफ़ाई को अपने आलिंगन में लेने के लिए आगे बढ़ा। वह झूले से टकरा गया, गिर पड़ा। वहाँ कोई नहीं था।

यह कैसा भरम है?  

जीत धीरे से उठा। वह रसोई घर लौट आया। रसोई बनाने के लिए बर्तन ढूँढने लगा।

अभी तो कुछ ही दिन हुए हैं और मैं यह सब भूल गया? जैसे मैं इस रसोई घर में पहली बार आया हूँ।  

तुम जिस रसोई घर को जानते हो वह वफ़ाई के हाथों कब का नष्ट हो गया है। यह बिलकुल अज्ञात है।

मैं भी तो यही कह रहा हूँ।

जहां जहां किसी लड़की के हाथ लगते हैं वहाँ वहाँ सब कुछ बदल जाता है। लड़कियों के स्पर्श में कोई जादू होता है।

मैं भी तो बदल गया हूँ इन दीनों में।

पुन: बदल जाओ और खाना बना लो अन्यथा भूखे ही रह जाओगे।

किन्तु बर्तन मिले तब न? कहते हैं स्त्रीयां घर की हर वस्तु उचित स्थान पर रखती है। किन्तु ना जाने वफ़ाई ने उन बर्तनों को कहाँ रख दिये हैं जो मुझे अभी चाहिए।

तुम वस्तु को क्यों खोजते हो?

तो?

तुम उचित स्थान की केएचपीजे निकालो, वस्तुएं स्वयं मिल जाएगी।   

ठीक है।

जीत एक कोने में जाकर खड़ा हो गया। पूरे रसोई घर को ध्यान से देखने लगा। यह रसोई घर उसे अपरिचित लगा। 

जीत ने देखा कि सामने गेस का चूल्हा था, स्टव था और उस पर कुछ बर्तन पड़े थे। बर्तन ढंके हुए थे। उसने स्मित किया।

अरे। बर्तन तो यहीं पर पड़े हैं जिसे मैं ढूंढ रहा था। कैसी है यह लड़की भी। कल रात से यह सब यहीं पड़े होंगें और झूठे भी होंगें। पहले इन सबको धोना पड़ेगा तब रसोई बनेगी। चलो भाई, लग जाओ काम पर।  

जीत बर्तन की तरफ बढ़ा। ऊपर पड़े ढक्कन को हटाया। कागज का एक टुकड़ा उड कर नीचे गिरा। जीत ने कागज उठा लिया। उस पर कुछ लिखा हुआ था।

जीत,

तुम जब बर्तन पर ढंके ढकन को उठाओगे तब यह कागज उड़कर नीचे गिरेगा। तुम उसे पकड़ने के लिए ढकन को उसी जगह ढँक कर दौड़ोगे। तुम ढंके हुए बर्तन में क्या है उसे देखोगे भी नहीं।

जीत ने बर्तन की तरफ देखा। वह अभी भी ढंका हुआ था। क्या होगा इस बर्तन में? जीत ने स्वयं से पूछा। हाथ में कागज लिए वह बर्तन की तरफ बढ़ा। ढकन फिर से उठाया और अंदर देखा। उसमें खाना था। जीत प्रसन्न हो गया। वह कागज आगे पढ़ने लगा।

तुम इस कागज को आगे पढे बिना ही बर्तन की तरफ जाओगे और ढकन खोल कर देखोगे कि इसमें क्या है? तुमने बिलकुल यही किया ना?

जीत ने बर्तन की तरफ देखा और हंस पड़ा। आगे पढ़ने लगा।

लड़के सदैव उतावले ही होते हैं। कभी उसका ध्यान लक्ष्य पर नहीं होता। लोग कहते हैं कि लड़कियां चंचल होती है किन्तु वास्तव में लड़के अधिक चंचल होते हैं।

तुम्हें भूख लगी होगी और पिछले कुछ दिनों से खाना बनाना छूट गया है। निश्चिंत रहो। तुमने देख ही लिया है कि बर्तन में खाना तैयार पड़ा है। समय पर खा लेना। कल शाम तक जब मैं लौट आऊँगी तब तक के लिए तुम्हारे खाने का प्रबंध कर रखा है। समय समय पर खा लेना और दवाइयाँ लेना मत भूलना। नहीं तो मैं माँ-दादी-नानी बनकर डांट दूँगी।

मैंने यह पहली बार तुम्हें पत्र लिखा है। यह मैंने मेरे ही हाथों से लिखा है, और आज ही लिखा है। कोई संशय मत करना। इस में अभी भी स्याही की सुगंध आ रही होगी।  

जीत ने पत्र को सूंघा। स्याही की सुगंध अभी भी आ रही थी।

तुम पूरा पढे बिना ही स्याही को सूंघने लगोगे। तुमने पत्र को सुंघा ना? स्याही की सुगंध कैसी लगी?

जीत हंस उठा।

वफ़ाई भी ना, सब कुछ जानती है। मैं क्या करूंगा, कब करूंगा। वह पत्र में भी लिख कर गई है। यह लड़कियां भी अजीब है। लड़कों के मन को कैसे पढ़ लेती है? यह लड़की भी, क्या नाम है? हाँ याद आया। यह वफ़ाई भी न।

जीत पत्र को आगे पढ़ने लगा।

चलो अब बहुत हो गया। सीधे सीधे खाना खा लो, दवाइयाँ खा लो और चित्र बनाने लगो। हो सके तो मुझे भी याद कर लेना। यह मत भूलना कि मैं लौट कर आऊँगी।

पत्र पढना कैसा लगा? मुझे तो पत्र लिखने में अत्यंत आनंद आ रहा है। किन्तु इसे यहीं पूर्ण करना होगा।

वफ़ाई।

वफ़ाई, केवल वफ़ाई। और कुछ नहीं।

इतना तो लिखती, ‘तुम्हारी वफ़ाई’।

ऊपर भी कहीं नहीं लिखा कि ‘प्रिय जीत’। केवल जीत लिख कर छोड़ दिया।

यह सब अपेक्षाएँ समय से पहले की है।

हो सकता है। किन्तु एक बात निश्चित है कि वफ़ाई मेरा पूरा ध्यान रखती है।

जीत ने खाना थाली में परोसा। पहला निवाला मुंह में डाला। 

आज इस रसोई का स्वाद भिन्न सा क्यूँ है?

भिन्न सा ही नहीं अधिक रसपूर्ण भी है।

अधिक स्वादिष्ट भी है।

है तो सही पर ऐसा क्यूँ है? क्या कारण है?

वह तो तुम जानो। किन्तु कुछ तो है।

तो उस कुछ को ढूंढो ना।  

पहले खाना खा लें बाद में देखा जाएगा।

जीत के पास वह कुछ का कोई उत्तर नहीं था। वह मौन ही खाने लगा।

जीत झूले पर आ बैठा। मन फिर से विचार में मग्न हो गया

आज खाना इतना स्वादिष्ट क्यूँ था? क्या विशेष बात थी?

झूला चलता रहा, हवा भी।

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Hetal Thakor 5 महीना पहले

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Avirat Patel 6 महीना पहले

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Nikita 6 महीना पहले

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Manjula 8 महीना पहले

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Reshma Patel Sandip Patel 8 महीना पहले