मेरी वर्षा... दिल की आवाज़ - 1 Abhishek Tripathi द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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मेरी वर्षा... दिल की आवाज़ - 1

यह उन दिनों की बात है मैं कक्षा दसवीं की पढ़ाई के लिए अपने गांव से शहर आया था !

    नया शहर था नये  लोग सभी बातें नयी थी !शहर को समझने में कुछ वक्त तो जरूर लगता घर की याद तो बहुत ही सताती थी जब भी अकेला बैठता तो बस घर की याद आने लगती !

    समय बीतने लगा शहर में जैसे  मैं वहां के माहौल में अब घुलने मिलने सा लगा था और समय बीता ! कुछ दिनों बाद नवरात्रि का पावन पर्व आया ! शाम को मैं कमरे  से निकल कर बाहर शांत सड़क में टहल रहा था ! तभी, एक मधुर संगीत की  आवाज मेरे कानों पर पड़ी और मैं कुछ समय के लिए स्तब्ध सा  हो गया !  मैं उस आवाज की खोज में निकल पड़ा और उसको सुनते सुनते उस जगह तक जा पहुंचा जहां से वह आ रही थी ! 
    मैंने देखा वहा  एक सुंदर लड़की आरती गा रही थी, जिसे मैं पीछे से देख पा रहा था उसके कानों के कुंडल से उसकी सुंदरता प्रतीक हो रही थी ! मानो  उसने चांद को दो टुकड़ों में करके अपने कानों में पहन लिया हो ! वह आरती  गाने  के  बाद  अब अपनी पहचान कि  किसी औरत से  बात करने मैं व्यस्त थी और मैं बस उसको देखता  जा रहा था !

       उसकी सुंदरता का क्या वर्णन करू - जितनी मधुर उसकी आवाज थी उसी तरह  उसकी सुंदरता का कोई काट नहीं  ! 
 किसी शांत बह रही झील  जैसी  उसकी आंखें, गुलाब की पंखुड़ियों के समान उसका चेहरा, चंचल मृग  के समान उसकी चाल ! किसी का भी मन मोह लें !
   मैंने उससे उस के गाने कि तारीफ करनी चाहि, पर एक डर था कहीं वह कुछ और ना समझ बैठे ! डर के कारण मैं कुछ कह न  सका.!
     अब तो जैसे यह प्रतिदिन की दिनचर्या बन गई थी, शाम होते ही मैं रोज उसी जगह पर पहुंच जाता और उसके गाए हुए गीतों में  कहीं खो जाता ! 

एक दिन मैं बस उसको देखता रहा  वह अपने घर की ओर निकलीं तो  ना जाने कब मेरे कदम उसके पीछे पीछे चल पड़े ! कुछ दूर तक चलता रहा कि वो अचानक रुक गई और पीछे मुड़ कर देखा मैं भी उसे देख कर रुक गया ! वह मेरे पास आई और एक सवाल किया तुम्हें मैं इतने दिनों से देख रही हूं तुम शायद  रोज मुझे ही  देखने आते हो क्यूँ?  सवाल इतना सीधा और सटीक था कि मैं उसका कुछ उत्तर ना दे सका ! मैं चुप था उसने कहा ठीक है अब अगर नहीं बता रहे हो तो मेरे पीछे भी मत आना ! मैं  निराश होकर घर वापस लौट आया !
        अगली सुबह मैं स्कूल जा ही रहा था कि मैंने  देखा  सडक के किनारे, वही लड़की अपनी साइकल की उतरी हुई चैन बना  रही थी ! न जाने क्यों मैं अंदर से उत्साहित हो गया और उसके  पास जाने की कोशिश करने लगा तभी मुझे उस के कहे हुए शब्द याद आ गए और मैं सिर नीचे करके आगे की ओर बढ़ने लगा तभी एक आवाज पीछे से आती है सुनो........
      यह सुनकर तो मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा मैं तुरंत पीछे मुड़कर देखा और वही लड़की मुझे आवाज दे रही थी ! वह अपनी मदद के लिए ही बुला रही थी जैसा कि मैंने सोचा था और मैं गया भी मैंने उसकी साइकिल की चैन चढ़ा दी और बदले में उसने थैंक्यू कहा और अब मेरी हिम्मत कुछ  ज्यादा ही बढ़ने लगी थी और मैंने धीरे से उसका नाम पूछ लिया !
 उसने थोड़ी सी मुस्कुराहट  के साथ कहां क्या करोगे हमारा नाम जानकर हम  यहां की ठकुराइन हैं ! उन्होंने अपना हाथ मिलाने को  हमारी और बढ़ाया हम ने मुस्कुराते हुए दोनों हाथ जोड़कर उनसे नमस्कार किया,और फिर चल पड़ा ! तभी पीछे से उसने कहा #वर्षा  नाम है हमारा, और वहा से चली गई ! मेरी खुशी का तो मानो कोई ठिकाना ही ना रहा !!
        कुछ दिनों बाद  पिताजी हमसे मिलने शहर आए ! हमने उनसे साइकिल दिलाने  की मांग रख दी ! और वह मान भी गए हमें एक साइकिल मिल गई ! मेरे स्कूल से आने का समय, और उसकी कोचिंग जाने का समय एक होने के कारण हम एक दूसरे को रोज देखने लगे ! 
          एक दिन वह मेरे पास से गुजरी और उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी मैं भी अपनी मुस्कान रोक नहीं पाया,और  वहीं पर रुक गया,ये  देख कर वो  वापस लौट कर आई, उसने पूछा--- अच्छा आपका नाम क्या है? नाम तो मेरा बस चार अक्षर का ही है लेकिन वह चार अक्षर न जाने क्यों मेरे गले से निकल नहीं पा रहे थे ! उसने कहा बोलो, और मैं किसी तरह अपने अंदर की खुशी को रोकते  हुए अपना नाम बताने में कामयाब रहा ! उसने कहा-नाम तो ठीक है पर..... ! मैंने पूछा पर..... क्या? वो यह कहते हुए चली गई कुछ नहीं अभी मुझे जल्दी घर जाना है!
       उस पर......? का उत्तर ढूंढने के लिए मैं रोज उसका इंतजार करता पर वह अब  दिखती नहीं थी ! एक हफ्ता गुजर गया वह मुझे नहीं दिखी अब मैंने तो सोचा कि वह नहीं दिखेगी ! तभी अचानक एक दिन दूर से उसकी साइकल आती दिखाई दी और मैं वहीं रुक गया! उसने पूछा क्या हुआ?  मैंने कहा कुछ नहीं, यह बताइए कि आपने उस दिन पर....... क्यों कहा?