मेरा चाँद - 2 Pratibha Gautam द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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मेरा चाँद - 2

         सूरज का पीलापन कहीं छुप-सा गया था और उसने कुछ नारंगी, कुछ लाल सा आवरण ओढ़ लिया था। पंछियों की चहचाहट का कलरव भी आकाश में गुंजायमान होने लगा था। हवा भी कुछ शीतल जान पड़ रही थी। सन्नाटे से आच्छादित गलियों में भी अब कुछ धीमी, कुछ तीखी-सी आवाज़ों ने जगह बना ली थी। बच्चों की टोलियाँ भी हवा की तरह इधर-उधर भागती-सी थी। कहीं खिलखिलाहट थी कहीं गुस्से की आहट। जिंदगी के रंग बस यूँ ही बिखरे-से थे और इन सबको तकती सी मैं.....कुछ खोज तो नही रही थी फिर भी न जाने कहाँ खोयी हुई सी थी। शायद किसी को देखकर, किसी की यादों में, जिसकी याद में मेरी कोई जगह बाकी न थी। फिर भी वो किसी जिद्दी बच्चे सा हठ करके मेरी यादों में समाया था।
          बहुत पहले और बहुत पीछे सब छोड़ आयी थी मैं।  उसे, उसकी बातों को, उसके दिए जख्मों को और कड़वी यादों को। फिर भी कुछ बाकी-सा था। जो मेरे चाहने के बाद भी, मेरे दुत्कार देने के बाद भी, मौजूद था मुझमें। किसी के साथ की तो कोई तमन्ना ना थी फिर भी ना जाने क्यों वो बातें मेरी तन्हाई को तन्हा, और तन्हा करती जा रही थी।
         चाय का कप, न मालूम कब खाली हो गया था लेकिन मेरा मन अभी भी भरा था। उसके जाने का गम तो न था बल्कि सुकून था। रोज़-रोज की चिकचिक से, उसके अनमने  व्यवहार से। उसके होकर भी न होने के अहसास से। उसका प्रेम जब उसी के व्यवहार की जकड़न बन गया था तब दूर चले जाना ही तो सही था। फिर क्यों मैं उसकी यादों को खुद को पल-पल डँसने का आमंत्रण देती थी। नही.....नहीं, मैं तो नही पुकारा करती थी। आखिर कुछ बचा भी तो नही था। ना प्रेम था, न कुछ अहसास बाकी था, ना ही उसके साथ जिंदगी बिताने की ही कोई इच्छा थी अब। 

         लेकिन वो फिर भी आता था। जैसे हर रोज अँधेरा आ ही जाता है, रोशनी को चीरता हुआ। शायद ये अँधेरा ही था जो उसे ले आता था अपने संग। या फिर मैंने ही हर रात को अमावस्या स्वीकार कर लिया था। अन्यथा मेरा चाँद क्यों कहीं लुप्त सा था......

            'मेरा चाँद....?' मन जैसे खुद से ही सवाल करने लगा था। आखिर, कौन है मेरा चाँद? जो इतने अँधेरे मन में भी जगमगाने को आतुर होगा?
 
          सोचते-सोचते कब नींद की आगोश में जा पहुंची, इसका अंदाज़ा न रहा। सुबह जब घड़ी ने 5 बजाएँ तो अलार्म की आवाज़ ने उठने का निर्देश दिया। उठ तो गयी थी लेकिन कल शाम से रात तक बुने विचारों के जाल में ही उलझी रही। अनमनी सी ऑफिस के लिए तैयार हुई और चल पड़ी रोज की ही सड़कों को नापती हुई। वही सुबह, वही सड़क और वही लोग। सबकुछ रूखा-रूखा,  बेजान लग रहा था, जैसे गर्मी की दोपहरी में बहती शुष्क हवा। जैसे एक सूखी नदी। मेरे अंदर का अकेलापन दिनोंदिन बढ़ता जा रहा था। शायद इसलिए, अब हर वस्तु-व्यक्ति भी  उजाड़, तन्हा और वीरान नजर आ रहे थे। जिंदगी मानो नीरस हो गयी थी। न कुछ अच्छा लगता था, न कुछ बुरा। सजीव-सी निर्जीव बन गयी थी। एक शरीर बचा था, वो भी बहुत हद तक मृतप्रायः सा। मेरे साथ मेरी जिंदगी भी कुछ थकी-थकी सी हो गयी थी। आराम बहुत जरूरी हो गया था और फिर मेरे चलते कदम जैसे किसी अनचाही शक्ति द्वारा रोक दिए गए। मैं जड़वत होकर वहीं पास ही पार्क में पड़ी मुझ-सी बेजान बेंच पर जा बैठी। कुछ खोयी-खोयी, बेसुध सी।

          झुकी हुई सी मैं, घास को झुकाने पर तुली थी । इसका पता तो मुझे खुद न था कि तभी एक आवाज़ आयी....."क्यों, किसी का गुस्सा घास पर उतार रही हो?"

मैं कुछ चौंकी, और झेंप गयी। कुछ बोलते न बना तो बस नजरें झुकाकर, अपनी गलती मान लेने की भाव-मुद्रा बनाएं बैठी रही।

"माफ़ कीजिये, लेकिन मैंने बस ऐसे ही कहा। वैसे पहली बार देखा है आपको इधर?

प्रश्नमयी आवाज़ उधर से आयी तो जवाब देना जरूरी हो गया।

"जी, वो... बस , मैं...आज...."

"कोई बात नही, आप बैठिये, वैसे भी आजकल भागती-दौड़ती जिंदगी में किसी के पास इतना समय नही होता कि प्रकृति के साथ खुद को जोड़े। अच्छा, मुझे काम है, मैं चलता हूँ, आया कीजिये कभी कभी। पार्क वीरान रहें तो जंगल जैसा लगता है" कहते हुए वह आवाज़ धीरे-धीरे मद्धम हो गई, और फिर लुप्त।

         इन दो पलों में जैसे कुछ होश-सा आया और मैं ऑफिस की ओर भागी।

         शाम को जब घर लौटी तो चाय पीते हुए बालकनी में जा खड़ी हुई। दिमाग कुछ शांत था। काम करते हुए न मालूम कब शाम, रात में तब्दील हो गयी थी। मैं बिस्तर पर पहुँची तो आज आसमान में चाँद का दीदार करने का मन हो उठा। शायद मैं उस स्वीकार को अस्वीकार करना चाहती थी जिसमें, मैं मान चुकी थी कि हर रात अमावस्या होती है। खिड़की के पास पहुँची ही थी कि हवा के झोंके से खिड़की पर टंगा पर्दा मेरे चेहरे को छू गया । ऐसा लगा मानो बरसों बाद किसी ने प्यार से सहला दिया हो।
          चाँद पूरा गोल था, चमक भी कुछ ज्यादा ही थी जैसे मेरे पुराने विचार, जिसमें, मैं हर रात को अमावस्या समझती थी, को आज तोड़ने की खातिर ही चमक रहा हो। मैं खुश थी। जिसमें ठंडी बहती हवा की छुअन ने वृद्धि कर दी थी।

       अगली सुबह, खूबसूरत लग रही थी। रास्ते भी वीरान नही जान पड़े। शायद पिछली रात की चांदनी में, तन्हाई का अँधेरा धीरे-धीरे कम होने लगा था।
    
         ऑफिस के बाद पैरो का रूख पार्क की होने लगा।  जिसकी वज़ह न केवल मेरा पॉजिटिव एट्टीट्यूड था बल्कि कल की वह प्रभावमयी अनजानी आवाज़ भी थी। जिसने कहा था, 'दौड़ती-भागती जिंदगी में किसी के पास इतना समय नही होता कि प्रकृति के साथ खुद को जोड़े' और 'पार्क वीरान रहें तो जंगल जैसा लगता है'। वो सीधे-सरल  शब्द ख़ास न होते हुए भी कुछ ख़ास जान पड़ रहे थे।

      पार्क में पहुँची तो कल वाली बेंच मुझे मेरा इंतज़ार करती मिली। बेंच के अकेलेपन को अपने होने से भरकर,  कल रात की चाँदनी के खूबसूरत ख्याल में ठीक से खोयी भी नही थी कि एक आवाज़ ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा,

"अच्छा लगा, आज भी आपको यहाँ देखकर।" यह वही, कल वाली, कुछ सरल, कुछ ख़ास सी आवाज़ थी।

मैंने दूसरी और देखा तो कुछ छः फ़ीट लंबा, सुडौल लड़का हल्का-सा मुस्कुराता हुआ खड़ा था। गेहुआँ रंग, छोटी-छोटी आँखे, किसी पेड़ की पत्ती को तराशकर बनाये गए होंठ, जिनमें गुलाबी रंग भर दिया गया था, अपने आप में एक परफेक्ट सी नाक और हवा के झोंको से लहराते उसके बाल। उससे देखकर एकबारगी लगा जैसे उसके पीछे रोशनी का ढेर बिखरा पड़ा हो जिसे अपने साथ लेकर चलते हुए वो यहाँ-वहाँ बिखरा रहा हो।  उसे देखकर जैसे मैं मंत्रमुग्ध सी हो गयी। इधर-उधर भागते बच्चों की आवाज़ जब कान में पड़ी तो खुद को संभालते हुए मैं बोली...."जी हाँ, मैं सोच रही थी कि पार्क को पार्क ही रहने दिया जाये, इसलिए....बस.....चली आयी " कहते हुए, मैं हल्की सी मुस्कुरा दी।

हँसी की गूँज के साथ एक आवाज़ भी आयी.....

" हर शाम मैं यहाँ आता ही हूँ, कभी सुबह समय मिलता है तब भी घर की चारदीवारी में खुद को बंद करने की बजाय इधर का ही रुख करता हूँ"....कहते हुए यह आवाज़ मेरे समीप आयी और बोली, "अगर आपको कोई परेशानी न हो तो क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?"

मैं, जो अभी तक उसमें कुछ खोयी हुई थी, ने कहा....

"जी, बिल्कुल, मुझे कोई परेशानी नही"

कहीं, बच्चों का शोरगुल था, कहीं ठिठोलियों की आवाज़। कभी पत्तो की सरसराहट तो कभी पंछियों की चहचाहट पार्क को जीवंत बनाये हुए थी। इन सबके बीच गुजरती हवा की आहट, हमारे मध्य में पसरे सन्नाटे से रूबरू करा रही थी।

"कल से पहले आपको यहाँ देखा नही, यहीं-कहीं, आस-पास रहती हैं आप?" कहते हुए उस आवाज़ ने सन्नाटे की मौजूदगी को बाहर का रास्ता दिखाया और बातों का छोटा ही लेकिन एक सिलसिला आरम्भ हुआ।

"हाँ भी और नही भी"  कहकर, मैं थोड़ा मुस्कुरायी।

"जी, मैं समझा नही" एक उलझन भरी आवाज़ ने कहा।

"एक्चुअली, यहीं पास में ऑफिस है, आधे से ज्यादा समय यही बीतता है लेकिन घर कुछ 3 किलोमीटर दूर है"

"ओह, अच्छा, समझा।

"अच्छा, मैं चलती हूँ अब" कहते हुए मैंने विदा ली।

उसने भी "जी  ठीक है" कहते हुए जवाब दिया और मैं अपने घर की ओर चल पड़ी।

            घर पहुँची तो महसूस हुआ कि  तन्हाई का आलम  घटने लगा था। उदासी कहीं दूर जाती सी प्रतीत हो रही थी और निराशा के बादल भी छटने लगे थे। उनकी जगह अब रोशनी और बारिश की मदमस्त बूंदों ने ले ली थी। धीरे-धीरे, 'कुछ मैं' और 'कुछ प्रकृति' मेरे करीब आ गयी थी और एक अजनबी शख्स भी। जिसके साथ बातों का सिलसिला चल निकला था। महीने ऐसे ही निकल गए और फिर एक दिन.....

"कैसी हो, आज देर से आयी? काम ज्यादा था क्या?" आकाश (वही अजनबी आवाज़) ने पूछा।

"हाँ, आजकल काम ज्यादा है, यहां आने का टाइम भी नही था लेकिन....."  (कहना तो चाहती थी कि प्रकृति के साये में तुम्हारे साथ समय बिताना सुकून देता है, दिनभर की थकान से पलभर में राहत मिल जाती है, लेकिन मैंने इन एहसासों को शब्द देने से पहले ही होंठो की ओट में चुपके से दबा लिया) मैं चुप रही।

"लेकिन......क्या?" आकाश ने पूछा।

"नहीं, कुछ नही, वो ऐसे ही" मैंने कहा।

"अच्छा, ठीक है। अच्छा, सुरु...मैं काफी समय से कुछ कहना चाह रहा था, सोचा आज कह दूँ" उसने इतना कहा ही था कि  मेरे दिल की धड़कन अचानक बढ़ गयी। शायद मैं सब जानती थी....

आकाश ने  मेरी ओर देखा, मैंने सब समझकर भी अनजान बनकर कहा..."हाँ बोलो, क्या कहना है"

वो बोला, मुझे ऐसा लगता है कि तुम महज़ मेरी अच्छी दोस्त नही बल्कि उससे कुछ ज्यादा हो। कुछ खास हो।  जिसके रहने से, मैं भी ख़ास हो जाता है। शायद, तुम मेरे लिए , पतझड़ के मौसम में भी किसी बहार-सी हो। रात में जगमग करती जूग्नू हो तो सुबह-सवेरे महकती खुशबू। कभी ठण्ड में सुकून पहुँचाती अलाव हो तो कभी गर्मी की तपिश में राहत देती बयार हो। जैसे बारिश के बाद मिट्टी महकने लगती है वैसे ही तुमसे मिलने के बाद मैं महकने लगा हूँ, कभी तुम्हारे विचारों से, कभी तुम्हारी सकारात्मकता से। कभी तुम्हारी बच्चों सी बातों पर हँस खुद बच्चा बन जाता हूँ तो कभी तुम्हारे गलतियाँ करने पर, तुम्हें समझाता हुआ, इस दुनिया का सबसे समझदार इंसान। तुम्हें नही मालूम लेकिन जब भी मैं तुम्हारे साथ होता हूँ तो  लगता है, मानो मेरे पास कोई परेशानी ही नही  है या फिर परेशानी होते हुए भी वो इतनी बड़ी नही कि मुझे विचलित कर दें। तुम्हारे होने के एहसास भर से, उलझनों के बीच भी मैं खुश रहता हूँ, बेहद खुश। कुछ सुकून सा रहता है और तुम्हारी मौजूदगी से यह बढ़ता चला जाता है। ऐसे में मुझे यकीन हो चला है कि तुम वही हो जिसका हाथ पकड़कर मैं चलना चाहता हूँ। जिसके सहयोग से जिंदगी की बड़ी-से-बड़ी मुश्किल को पार करना चाहता हूँ। तुम ही हो, जिसके सामने मैं बच्चा बन सकता हूँ और जिंदगी को कल से अधिक ख़ूबसूरती के साथ जी सकता हूँ। और बस  इसलिए, अब तुम्हारे साथ जीना चाहता हूँ......क्या.....तुम.....मेरे साथ, मेरा हाथ पकड़कर मेरी हमसफर बनना चाहोगी...?"

आकाश का यह सब बोलना, मेरे दिल को राहत पहुँचा रहा था। बरसों के सूनेपन के गड्ढे को भर रहा था। तन्हाई को विस्थापित कर आबाद जिंदगी का बसेरा बसा रहा था।   लेकिन, फिर भी...... न जाने क्यों मैं चुप रही।

मुझे शांत देखकर, आकाश बोला, 'देखो सुरु, मैं तुम्हारे होने से कुछ खास, कुछ अलग महसूस करता हूँ लेकिन जरूरी नही कि तुम्हारे साथ भी ऐसा हो। हाँ यह सच है कि  तुम्हारे 'हाँ' कहने से, शायद मैं उस बच्चे की तरह खुश हो जाऊँ, जो अपनी प्रिय वस्तु पाकर हो जाता है। लेकिन तुम्हारे 'ना' कहने से, मुझे तुमसे कोई शिकायत नही होगी।

मैं भावहीन- सी आकाश को देखती रही और फिर बोली,

"मैं, कल बताती हूँ, अभी चलती हूँ" मैंने कहा, और बिना जवाब की प्रतीक्षा किये घर लौट आयी।

     आकाश की बातें रास्ते भर किसी साये की तरह  मेरे साथ रही। उसका हर एक शब्द किसी भँवरे की भाँति  मेरे कान में गुंजन कर रहा था। शाम भी , रात में लुप्त हो चुकी थी लेकिन आकाश के मुँह से निकला हर एक शब्द,  हर एक वाक्य, मेरी साँसों में घुलकर विचरण करते रहे।  और साथ ही, वो पुरानी यादें भी, जिसमें मुझे दर्द, तकलीफ व तन्हाई मिली थी। कितनी मुश्किल से सब भूली थी मैं लेकिन फिर भी विरह की वो पीड़ा और उससे भी ज्यादा उसके अनमने व्यवहार की टीस रह-रहकर, मौक़ा पाते ही मुझमें ज़िंदा हो जाया करती थी। जैसे बचपन का कोई डर गाहे-बगाहे प्रत्यक्ष हो ही जता है, वैसे ही यह पुरानी टीस मुझे सताने, दुर्बल करने आ ही जाती थी। मन में सिर्फ एक ही ख्याल आता, अगर वही सब फिर घटित हुआ तो...? सोचते-सोचते मैं खुद से ही सवाल करने लगी। जवाब देने वाला कोई न था तो खुद ही जवाब भी तलाशने लगी और कहती, 'माना कि एक बार ठोकर खा ली, इसका मतलब यह तो नही कि मैं चलना ही छोड़ दूँ।' और फिर दूसरी आवाज़ आती, 'तो क्या पुनः उसी रास्ते पर चलना जरूरी है?

मैं डर से सहम जाती और बड़बड़ाती....नही.....नही, मैं फिर से उस दर्द से नही गुजरना चाहती।' और तभी इस बात का प्रतिकार करती पहली आवाज़ उठती, 'लेकिन कब तक इस डर के साएँ में जीऊँगी? क्या हमेशा? मैं हमेशा अकेले नही रहना चाहती, मेरा भी मन करता है कि किसी के साथ अपना सुख-दुख बाटूँ, कभी वो अपनी जिंदगी के पलों में मुझे अपना सहयोगी बनाएं।' फिर वही विपरीत आवाज़, 'और ऐसा न हुआ तब? मौसम की तरह वो भी बदल गया तब और फिर तब क्या जब एक दिन वो भी छोड़कर चला जाएगा? संभाल पाऊँगी खुद को?'

         ना जाने कब तक मन में ऐसी ही उधेड़बुन चलती रही और रात की कालिमा को दूर करता सूरज भी जगमगा उठा। मैं ऑफिस के लिए तैयार हुई। लेकिन आकाश को क्या जवाब देना है इसका निर्णय अभी तक नही कर पायी थी।

          मैं ऑफिस के लिए निकल पड़ी। रास्ते में होने वाली हर हलचल में अपना जवाब ढूँढ़ते हुए। कहीं प्यार था, कहीं झगड़ा। कहीं मिलन तो कहीं विरह। मेरा सिर मानो किसी पहाड़ को उठाये चला जा रहा था। अकल पर मानो पत्थर पड़ गए थे जिसने मेरी सोचने-समझने की शक्ति छिन्न कर दी थी।
           दिन आज कुछ लम्बा हो गया था लेकिन धीरे-धीरे रोशनी मद्धम होने लगी थी। कुछ उजाला, कुछ अन्धेरा सा छाने लगा था। घड़ी की टिक-टिक के साथ मेरे दिल की धड़कनें बढ़ने लगी। काटो तो खून नही जैसी हालत हो गयी और दिल बस यही गुजारिश करता रहता कि आज का दिन ढले ही नही, किसी भी तरह, कोई आज की शाम  को समय की घड़ी से  गायब कर दे। लेकिन बेतुके विचार आखिरकार बेतुके ही होते हैं। सूरज लालिमायुक्त हो गया था। पंछी अपने घर की ओर उड़ते जा रहे थे। सभी अपने-अपने घर लौटने का उत्साह चेहरे पर लिए लौटने लगे थे और एक मैं थी कि बस ठहर जाना चाहती थी। घर तक का सफर आज कुछ लम्बा जान पड़ रहा था।

           ऑफिस से तो निकल गयी लेकिन फिर कहाँ गयी कुछ मालूम न था। पार्क में जाने की हिम्मत न थी। खुद को भुलाने के लिए या फिर आकाश के सवाल को नजरअंदाज करने के लिए बस भाग रही थी। ऑफिस के बाद का समय कहाँ बीता कुछ मालूम न था। पास ही एक चर्च की घड़ी ने 90 डिग्री का कोण बनाया तो  कुछ होश आया। मैं बिना कुछ सोचे पार्क की ओर बढ़ चली। वहाँ आकाश न था......

           मैं धम्म से उस बेंच पर कुछ गिरती सी जा बैठी जिस पर बैठकर हम दोनों घण्टों बातें किया करते थे। हँसी-मज़ाक किया करते थे और कभी ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें किया करते थे। यही वो बेंच थी जो हम दोनों की दोस्ती की गवाह थी। जिसके प्रत्यक्ष आकाश ने एक कदम मेरी ओर बढ़ाया था.....लेकिन.....आकाश..... कहाँ गया.....वह.....?

         चला गया वो, आखिर कब तक तेरा इंतज़ार करता। अब तू रो, आराम से रो। कोई चुप नही कराएगा, कोई जबर्दस्ती हँसाने की कोशिश नही करेगा। है भी तो इसी लायक। किसके साथ बुरा नही होता? क्या वो इसी तरह भूतकाल में जीता रहता है, डरा-डरा, सहमा हुआ? आज बस यही एक आवाज़ थी। कल तक जो आवाज़ प्रतिकारस्वरूप उठ रही थी, वो भी आज गैरमौजूद थी।

           तभी किसी ने कंधे पर हाथ रखा तो मैं सहम गयी। पीछे मुड़कर देखा तो आकाश खड़ा था (जो अब तक मेरे इंतज़ार में वहीं ठहरा हुआ था)।  उलझन के समुंद्र को लांघकर, एहसासों के बाँध को तोड़कर, मैं  सिसकते हुए आकाश से जा लिपटी......मुझे 'मेरा चाँद' मिल चुका था। अब शब्दो की जरूरत नही रही थी। इस एक कदम ने मेरे मन के अनकहे सभी जज्बातों को शब्द दे दिए थे.....