हिम स्पर्श - 39

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दो दिवस तक वफ़ाई अविरत रूप से चित्रकारी सीखती रही। अब वह गगन, बादल, पंखी आदि के चित्र बनाने में सक्षम थी। किन्तु वह तूलिका से संतुष्ट नहीं थी क्यों कि वह वफ़ाई की इच्छानुसार रंग भरने में सहाय नहीं कर रही थी। तूलिका के ऊपर वफ़ाई का नियंत्रण अभी बाकी था।

जीत ने भी अपनी कला में सुधार किया था। अब वह किसी भी पदार्थ जो उसकी आँखों के सामने हो उसका चित्र बना सकता था। वह सब चित्र अच्छे तो लगते थे किन्तु कुछ अभाव था जो चित्र को पूर्ण नहीं बना रहा था। जीत उस ‘कुछ’ को ढूँढने का प्रयास करता रहा किन्तु वह उसके हाथ नहीं लग रहा था।

वफ़ाई एवं जीत, दोनों कला में प्रगति कर रहे थे, तथापि दोनों असंतुष्ट थे।

“वफ़ाई, बालक के इस चित्र में किस वस्तु का अभाव है, बता सकती हो?”

वफ़ाई ने चित्र को देखा,”मुझे लगता है कि बालक के मुख पर भाव और भावनाएं उचित रूप से प्रकट नहीं कर पाये हो तुम। इसका मुख तो बालक जैसा है किन्तु भाव किसी वयस्क जैसे गंभीर। बालक कि सहजता एवं सरलता कहीं नहीं दिख रही। इन भावों को चित्र में डालोगे तभी यह चित्र पूर्ण होगा। भाव ही तो किसी चित्र के प्राण होते हैं, आत्मा होती है। अन्यथा वह जीवन हिन प्रतिमा जैसा लगेगा। यह मेरा मत है। आवश्यक नहीं की यही सत्य हो।“  

“वफ़ाई, मैं तुम्हार तथा तुम्हारे मत का सम्मान करता हूँ। किन्तु मैं उन भावों को इस चित्र में कैसे ला सकता हूँ?”

“श्रीमान कलाकार, यह तुम्हारी समस्या है।“ वफ़ाई हंस दी। जीत पर एक द्रष्टि डाल कर वह कक्ष में दौड़ गई। दूर जाती हुई वफ़ाई को जीत देखता रहा। वफ़ाई के मुख पर तब अनेक भाव थे जो पहले कभी नहीं देखे। वह भावों का रंग लाल था, गालों पर गुलाबी छाया थी।

जीत ने उन रंगों को ह्रदय में भर लिए। उसे वह रंग मिल चुके थे जिसे वह चित्र में डालना चाहता था। वह केनवास तक गया, तूलिका को रंगों में डुबो दिया। उन रंगों से चित्र भर दिया।

जीत ने चित्र पूर्ण किया। वफ़ाई को बुलाया।

”क्या बात है, श्रीमान चित्रकार?”

वफ़ाई के मुख पर वही लाल रंग, गालों पर वही गुलाबी छाया थी। बालक के चित्र के भाव बदल गए थे।

“ओह, चित्रकार। अंतत: तुमने यह कर दिखाया। यह सुंदर है, अपेक्षा के अनुरूप है। यह सहज है, एक बालक की भांति। तुमने यह कर दिखाया है जीत। मैं तुमसे प्रभावित हूँ।“ वफ़ाई के मुख पर छाए  लाल-गुलाबी रंग उसे सुंदरता प्रदान कर रहे थे।

वफ़ाई को अविरत देखते रहने का जीत को कारण मिल गया किन्तु वह देख नहीं सका। जीत ने वफ़ाई पर से ड्राष्टि हटा दी, केनवास को देखता रहा।

“हे चित्रकार, मुझे एक बात बताओ। आशा करती हूँ कि तुम्हारा उत्तर इस बालक के मुख के भावों की भांति शुध्ध ही होगा।“

“तुम जानती हो कि मैं मेरे विचार एवं मेरे चित्रों के साथ कभी नहीं खेलता।“

“तुम प्रामाणिक हो वह मुझे ज्ञात है।“

“सीधे मुद्दे पर आओ। पुछो जो पुछना हो।“

“फिर से तुम उतावले हो रहे हो।“ वफ़ाई हंस दी।

वफ़ाई के हास्य का जीत आनंद नहीं ले सका, वह वास्तव में शीघ्रता में था। केवल उसे ही उस उतावलेपन का कारण ज्ञात था। अनकहे कारण को छाती में बंध करके रखा था जीत ने। 

“इतने अल्प समय में तुमने इस चित्र के भावों को कैसे बदल दिया? जीत, कहीं तुम वास्तव में उत्तम कलाकार तो नहीं जो मुझ से अपनी इस कला को छुपा रहा हो? कुछ ही क्षणों में इन भावों को बदलने का रहस्य क्या है?”

“मैं स्त्रीयों को कभी समझ नहीं सका। स्त्रीयाँ इतनी संदेह क्यों करती है? सदैव संदेह करती रहती है।“

जीत के मुख पर व्यग्रता थी। वफ़ाई को वह पसंद आई।

व्यग्रता में जीत कितना सुंदर लग रहा है। इसे और चिडाती हूँ, आनंद लेती हूँ।

नहीं नहीं, कहीं क्रोध कर बेठा तो?

तो सीधे सीधे जीत के प्रश्न का सरल उत्तर दे दो।

यही उचित रहेगा।

“जीत, यह सहज है। पुरुष पर संदेह करना स्त्री का अधिकार है। यह स्त्री की प्रकृति है। यह स्वाभाविक भी है। इसके लिए तुम ईश्वर को दोष दे सकते हो, स्त्री को नहीं। यदि कोई स्त्री पुरुष पर संदेह करती हो यह स्पष्ट हे की वह स्त्री उस पुरुष से अत्यंत प्रीत करती होगी।“

“तुम करती हो प्रीत मुझ से?” जीत ने बिना किसी उद्देश्य से पूछा। किन्तु वफ़ाई ने उन शब्दों को पकड़ लिया। वह लाल हो गई। मुख पर गुलाबी आभा प्रकट हो गई। जीत ने उसे देख लिया।

“जीत, तुम मेरे प्रश्न का उत्तर टाल रहे हो। तुमने मेरे प्रश्न को सुना था? तुम्हें मेरा प्रश्न याद है? क्या मुझे उसे पुन: पुछना पड़ेगा?”

“उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। यह रहे उत्तर।

प्रथम बात, मैं पुन: स्पष्ट कर देता हूँ कि मैं कोई कलाकार नहीं हूँ। मैं कला को सीख रहा हूँ। मैंने मेरी कला के विषय में कुछ भी नहीं छुपाया। 

दूसरी बात, तुम जब यहाँ से भाग कर कक्ष में जा रही थी तब मैंने तुम्हारे मुख पर कुछ भाव देखे थे। मैंने उसे पकड़ लिया। इस चित्र के द्वारा उसे प्रकट कर दिया।“

“कैसे भाव? मेरे मुख पर कौन से भाव देखे तुमने? कहो ना, जीत। कहो, मैं उत्सुक हूँ।”

“वह लाल थे, गुलाबी थे, नारंगी थे।”

“वास्तव में वह क्या थे?”

“इन सभी का मिश्रण थे वह।“

“जीत, मैं कैसी दिख रही थी? भाव कैसे लग रहे थे?”

“मैं कोई लेखक नहीं हूँ। शब्दों में उसे कैसे कहूँ?” जीत ने स्मित दिया।

“किन्तु तुम प्रयास तो कर सकते हो। तुम कहो बाकी मैं समझ जाऊँगी।“

“कभी कभी, शब्द किसी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर सकते। ना ही वह उन भावनाओं का वर्णन करने में समर्थ होते हैं। शब्दों की अपनी मर्यादा है। भावों का केवल अनुभव किया जा सकता है।“

“जीत, तुम तो...।“

“वफ़ाई, हम अपने भावों को अपनी आँखों से नहीं देख सकते। यही इसकी सुंदरता है, यही इसका अनुपम सौन्दर्य है।“

“तुम ठीक कह रहे हो। किन्तु दर्पण में तो देखा जा सकता है। मुझे उस समय दर्पण देखना चाहिए था। उस समय तुमने मुझे दर्पण में देखने को क्यों नहीं कहा? यदि तुमने कहा होता तो...।“

“स्वयं के भावों को देखने का यह उचित मार्ग नहीं है।“

“क्यों? क्या समस्या है इसमें, जीत?”

“एक तो ऐसा करने से मेरा ध्यान भंग होगा और मैं तुम्हारे भावों को देखने से वंचित हो जाऊंगा। दूसरा, जैसे ही मैं तुम्हें दर्पण देखने को कहूँगा, तुम जागृत हो जाओगी और तुम तुम्हारे सहज भावों को खो दोगी। तुम नहीं जानती कि यह जागरूकता कितनी क्रूर होती है। यह हमारे अंदर जो भी सहज है, प्राकृतिक है उन्हें नष्ट कर देती है।“

“तो क्या, जीत?”

“इन दोनों स्थिति हमारे लिए पराजय की स्थिति बन जाती है। मैं पराजित होना नहीं चाहता। वफ़ाई, उचित तो यही है कि मैं तुम्हारे भावों को देखता रहूँ, अनुभव करता रहूँ, तुम्हें बताए बिना ही।“ जीत ने आँखें बंध कर ली और अपने ही विश्व में खो गया।

वफ़ाई ने धैर्य रखा, किन्तु वह धैर्य शीघ्र ही टूट गया,”जीत, कहाँ हो तुम? मैं यहाँ हूँ, तुम्हारे साथ। तुम अकेले नहीं हो। तुम अपने विश्व से लौट आओ अथवा मुझे तुम्हारे साथ ले चलो तुम्हारे इस विश्व में। किन्तु किसी भी स्थिति में मुझे अकेली...।“

जीत ने शांत चित्त से आँखें खोली।

“हे प्रभु, तेरा धन्यवाद। जीत लौट आया है इस विश्व में।“ जीत अभी भी शांत था, मौन था।

“जीत, मुझे तुम से भय लगता है।“

“क्यों? क्या मैं हिंसक पशु हूँ? मैं कोई राक्षस हूँ? तुम्हारे इन शब्दों से मुझे आश्चर्य होता है।“

“मेरे साथ मत खेलो जीत। मैं उपहास नहीं कर रही हूँ। मैं चिंतित हूँ कि...।“

“क्या बात है वफ़ाई?”

“तुम्हारी दो बातें है इसका कारण। तुम अचानक ही किसी भिन्न जगत में चले जाते हो, आँखें बंध कर लेते हो। उसके पश्चात इस वास्तविक जगत में लौटने में तुम विलंब कर देते हो। कभी कभी तो मुझे आशंका भी रहती है कि तुम इस विश्व में लौट कर कभी नहीं आओगे।“

“और दूसरा कारण?”

“अनेक बार तुम्हारा मौन अधिक लंबा हो जाता है, जैसे अंतहिन मौन।“

“तो मुझे क्या करना चाहिए?”

“बस तुम मेरे साथ रहो इस विश्व में, हमारे विश्व में। इस वास्तविक विश्व में। मेरे साथ बात करते रहो।“

“क्या तुम्हें विश्वास है कि यह जगत ही वास्तविक जगत है?”

“मैं नहीं जानती। किन्तु, तुम इसी विश्व में रहो मेरे साथ। चाहे यह विश्व वास्तविक हो अथवा आभासी।“

“मैं प्रयास करूंगा।“

“जीत, धन्यवाद।“

जीत ने स्मित दिया। उस स्मित ने वफ़ाई को निश्चिंत कर दिया।

“जीत, मेरा प्रश्न अभी भी उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है। मेरे मुख के भावों को मैं कैसे देख सकती हूँ? मैं उत्सुक हूँ उसे देखने को। इस प्रश्न का कोई तो उपाय होगा।”

“उस क्षण कोई केमेरे में तुम्हारे भावों को कैद कर ले। अथवा कोई उस भावों को चित्र बनाकर प्रकट कर ले। दोनों स्थिति में तुम्हें इस प्रक्रिया का भान नहीं होना चाहिए।“

“यह ‘कोई’ का क्या अर्थ है? तुम जानते हो कि मेरे तथा तुम्हारे सिवा यहाँ कोई नहीं है। और मैं मेरी तस्वीर नहीं ले सकती ना ही उसे चित्रित कर सकती हूँ। तो स्वाभाविक है कि वह ‘कोई’ तुम ही हो जो यह दोनों कार्य कर सके।“

“किन्तु मुख्य बात है तुम्हारी अभानता। यदि तुम्हें ज्ञात हो जाए कि कोई तुम्हारा चित्र बना रहा है अथवा तुम्हारी तस्वीर खींच रहा है तो तुम अभानता खो दोगी और जो भाव मुख पर होंगे वह कृत्रिम होंगे। वह भावों के सौन्दर्य को नष्ट कर देगा।“

“तो क्या? अभी भी मेरा आग्रह है इन बातों के लिए।“

“मैं प्रयास करूंगा।“

“प्रयास नहीं, जीत, तुम्हें सफल होना है। जब भी मेरे मूख पर वह भाव हो मेरी तस्वीर लेनी है तुम्हें। उस भावों को क्या नाम दिया था तुमने? लाल, नारंगी, गुलाबी?”

वफ़ाई ने जीत को देखा, क्षण भर रुकी, चित्राधार के समीप गई, उँगलियों से तूलिका को उठाया, जीत के पास आकार जीत की हथेलियों में तूलिका रख दी, ”मुझे रंग दो,जीत, मुझे रंग दो। मुझे लाल रंग दो, मुझे नारंगी रंग दो, मुझे गुलाबी रंग दो।“ कुछ कदम पीछे हट गई वफ़ाई और गीत गुनगुनाने लगी।

रंग दे मुझे लाल,

रंग दे मुझे कोई गुलाल,

रंग दे गेरुआ ओ चित्रकार....

रंग दे मुझे, रंग दे मुझे, रंग दे मुझे। ओ चित्रकार ....

जीत ने स्मित किया और तूलिका को चित्राधार पर रख दिया,”तुम्हारा चित्र जो तुम चाहती हो उसे बनाने का वह क्षण व्यतीत हो चुका है। अब उचित समय की प्रतीक्षा करनी होगी। उस समय मैं तुम्हें लाल, नारंगी अथवा गुलाबी ही नहीं किन्तु इंद्रधनुष के रंगों से रंग दूंगा।“ जीत दूर गगन में देखने लगा।

मौन व्याप्त हो गया, पुन:।

 

 

व्रजेश दवे 

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Amita Saxena 5 महीना पहले