हिम स्पर्श - 36

36

“जीत, आ जाओ सब तैयार है। यह केनवास तुम्हारी प्रतीक्षा में है।“

जीत ने केनवास को देखा। वह उसे आमंत्रित कर रहा था। वह दो तीन कदम चला और रुक गया। उसने केनवास को फिर देखा। उसे अंदर से कोई रोक रहा था, वह आगे नहीं बढ़ सका।

वफ़ाई ने जीत के कदमों को देखा और समझ गई की जीत बारह-तेरह कदमों का अंतर पार नहीं कर पा रहा है। वफ़ाई ने जीत का हाथ पकड़ा और केनवास तक खींच लाई।

जीत को पेंसिल हाथ में देते वफ़ाई ने कहा,” इस झूले का चित्र बनाने का प्रयास करो। उसे देखो, निहारो और चित्र रच दो। तुम यह कर सकते हो।“

“चलो यही सही। प्रारम्भ तो करना ही होगा।“ जीत केनवास के समीप गया। वफ़ाई ने चित्राधार की दिशा बदल दी। अब झूला आँखों के सामने था।  

जीत झूले को केनवास पर अवतार देने लगा। परिचित सा झूला कि जिस पर बैठ कर वह पिछले कई महीनों से दिवस का अधिकतम समय व्यतीत करता था, वह परिचित झूला अब अपरिचित सा लगने लगा। वह व्याकुल था कि कहाँ से प्रारम्भ करूँ, कैसे करूँ कि यह झूले को चित्रित कर पाउं? जीत ने प्रयास चालू रखा। केनवास पर कुछ रेखायेँ खींची। कुछ आकृतियाँ बनाई। दो घंटों के पश्चात रंग हिन केनवास पर कोई आकृति प्रकट हुई। चित्राधार को छोड़ कर दस बारह फिट दूर जाकर उसे देखने लगा।

“चित्र बुरा नहीं है किन्तु मैं संतुष्ट नहीं हूं। कई स्थान पर सुधार किया जा सकता है। इससे यह चित्र अधिक सुंदर हो जाएगा। मुझे उन बिन्दुओं पर पुन: काम करना होगा।“

जीत केनवास की तरफ बढ़ा और कुछ सुधार करने जा रहा था कि उसके कान पर शब्द पड़े।

”उसमें कोई सुधार मत करना। तुमने अच्छा चित्र बनाया है।“

जीत ने ध्वनि की दिशा में देखा। वह शब्द वफ़ाई के थे। जीत चित्रकारी में इतना व्यस्त हो गया था कि स्वयं के अस्तित्व को भी भूल गया था, वफ़ाई को भी। 

जीत ने वफ़ाई की तरफ अपरिचित भाव से देखा। जैसे उसे वह प्रथम बार देख रहा हो। जैसे जीत की आँखें पुछ रही हो,”कौन हो तुम?”

“जीत, क्या हुआ? तुम मुझे इस तरह किसी अपरिचित की भांति क्यों देख रहे हो? मैं अपरिचित नहीं हूँ। मैं वफ़ाई हूँ।“

जीत किसी अज्ञात विश्व से लौट आया। वफ़ाई को अपने सामने पाया। उसने पूछा,”तुम कहाँ थी?”

“मैं तो यहीं थी, यहीं हूँ और यहीं रहूँगी। जब तक तुम्हारी बात पूरी नहीं कर लेती, मैं यहाँ से जाने वाली नहीं हूँ।“

“तुम क्या कर रही थी? मैंने तुम्हें कहीं आसपास नहीं देखा।“

“जब तुम चित्र बना रहे थे तब मैं नमाझ अदा कर रही थी।“

जीत ने स्मित दिया,”हाँ, यही समय है तुम्हारे नमाझ करने का।“ जीत ने घड़ी में समय देखा।

“जीत, एक बात समज नहीं आई। मैं जब से यहाँ आई हूँ, नियमित रूप से नमाझ कर रही हूँ। किन्तु तुम्हें कभी मैंने प्रार्थना करते अथवा किसी भगवान की पुजा करते हुए नहीं देखा। मेरा मानना है कि तुम हिन्दू हो।“

“यह सत्य है कि मैंने कभी प्रार्थना अथवा पुजा नहीं की। मैं किसी धर्म में विश्वास नहीं करता।“

“अर्थात तुम्हारा कोई धर्म नहीं है?”

“हाँ, मेरा कोई धर्म नहीं है।”

“हाय अल्लाह। बिना धर्म के, बिना मझहब के भी कोई इंसान होता है क्या?”

“क्यों नहीं? हमें धर्म की आवश्यकता क्यों है?”

“हमें पुजा के लिए ईश्वर चाहिए, प्रार्थना के लिए ईश्वर चाहिए।” वफ़ाई दुविधा में पड गई। “आज तक तो ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं मिला जिसका कोई धर्म ना हो। ऐसा भी हो सकता है?”

“ईश्वर की प्रार्थना अथवा पुजा हेतु हमें किसी भी धर्म की आवश्यकता नहीं है। तुम्हारा धर्म कौन सा है, इस्लाम?”

“हाँ, मैं इस्लाम को मानती हूँ।“

“तुमने इस्लाम को मानना कब से प्रारम्भ किया?”

“मैं जन्म से मुस्लिम हूँ। मेरे जन्म के दिवस से ही, बल्कि, मेरे जन्म के क्षण से ही मैं इस्लाम को मानती हूँ।“

“तो क्या तुम्हें जन्म से ही धर्म क्या है, इस्लाम क्या है आदि का ज्ञान था? होगा ही ना?“

“तब तो मुझे कोई ज्ञान नहीं था। मैं कौन हूँ? कहाँ हूँ? क्यों हूँ? कुछ भी ज्ञान नहीं था। तो धर्म और इस्लाम आदि का भी ज्ञान नहीं था।“

“तो इस्लाम को धर्म के रूप में कैसे स्वीकार किया?”

“क्या तात्पर्य है तुम्हारा? जन्म से ही मैं मुस्लिम हूँ। मैं इस्लाम को मानती हूँ क्यों कि मेरा जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ था। मेरे माता-पिता मुस्लिम है जो इस्लाम को मानते हैं। तो स्वाभाविक है कि मैं भी इस्लाम को मानती हूँ। यह सहज है। इस बात पर तुम्हें दुविधा क्यों है।“

“वफ़ाई, इसका अर्थ है कि तुमने धर्म को पसंद नहीं किया।”

“जीत, कोई व्यक्ति धर्म को कैसे पसंद कर सकता है? यह तो पारिवारिक परंपरा है।“

“यह तो अनुचित है।“

“इसमें अनुचित क्या है, जीत?”

“किसी भी विचार का बिना समझे, आँख बंध कर अनुसरण करना अनुचित है।“

“धर्म के विषय में कुछ भी समझने की आवश्यक्ता नहीं है। इसके नियम एवं परंपरा ईश्वर अथवा अल्लाह जो भी नाम दो उसके आदेश है। यह नियम, यह परम्पराएँ तो सभी धर्म के अनुयायियों द्वारा युगों से निभाए जा रहे हैं, माने जा रहे हैं।“

“हमारे पूर्वज एवं माता-पिता जिसे युगों से मानते आए हैं उसे कसौटी पर कसे बिना ही मान लेना है। यही कह रही हो ना तुम वफ़ाई?”

“हाँ, बिलकुल।"

“चलो, धर्म को भूल जाओ। सोचो कि, हाँ तुम्हारा यह केमरा। तुमने यह केमरा खरीदा है ना?”

“अवश्य। यह एक अजोड़ केमेरा है।“

“तुम्हें अपनी इस पसंद पर गर्व है ना?“

“क्यों नहीं? कोई संदेह है क्या? मेरी इस पसंद से मेरे सभी साथी अचंभित थे।“

“अभिनंदन सुंदरी वफ़ाई। आप उत्तम हैं। आप श्रेष्ठ हैं। आप सबसे भिन्न हैं। आपकी पसंद भी अनन्य है। यह अदभूत है। क्या पसंद है तुम्हारी! मान गए जी। वाह,वाह! यही सब शब्द तुम्हारे साथियों से तुमने सुने होंगे। है ना?” 

“हाँ, बिलकुल ऐसा ही हुआ था, सब ने यही शब्द बोले थे। किन्तु तुम यह कैसे जानते हो?” वफ़ाई के मुख पर आश्चर्य था।

“क्या तुम जानती हो कि वह सब ने तुम्हारी ऐसी प्रशंसा क्यों की थी?”

“क्यों कि मेरी पसंद श्रेष्ठ थी।“

“यह अर्धसत्य है वफ़ाई। पूर्ण सत्य यह है कि केमेरा खरीदने से पहले तुमने बड़ा ही गहन अभ्यास किया था इस केमेरे के विषय में। इसके प्रत्येक लक्षण पर पूरा अनुसंधान किया था, पूरा विश्लेषण किया था। उसके पश्चात तुमने अपने सभी तर्क एवं पूर्ण बुध्धी का प्रयोग किया था। जिसके कारण तुम श्रेष्ठ निर्णय कर सकी थी। तुम्हारी इस पसंद की प्रशंसा तो होनी ही थी।“ जीत के अधरों पर स्मित था।

“धन्यवाद। किन्तु तुम क्या सिध्ध करना चाहते हो?” वफ़ाई व्याकुल हो गई।

“एक प्रश्न और। उसके पश्चात सब बात स्पष्ट हो जाएगी।“

“एक और प्रश्न? अर्थात एक और दुविधा? क्या है वह?”

“तुमने जब धर्म को पसंद किया था तब भी तुम्हें इतनी सारी प्रशंसा मिली थी?”

“वह कैसे मिलती मुझे? तब तो मैं अभी अभी जन्मी थी।“

“तो उसके पश्चात कभी किसी समय पर प्रशंसा मिली थी?”

“नहीं, कभी नहीं। मेरा जन्म हुआ, मेरा धर्म निश्चित हो गया। उसके पश्चात कभी भी धर्म के विषय में बात भी नहीं हुई।“

“वफ़ाई, उसके पश्चात उस पर विचार भी नहीं किया गया, ठीक है ना?”

“तुम ठीक कह रहे हो, जीत। हमने कभी ऐसा नहीं किया, यह सहज है। तुम क्या कहना चाहते हो?”

“कोई एक वस्तु जो पाँच सात वर्ष टिकेगी, जो नाशवंत है, जो अस्थायी है उस पर निर्णय करने से पूर्व हम कितना विचार करते हैं। किन्तु जब धर्म की बात आती है, तब हम उसे बुध्धी के द्वार बंध करके स्वीकार लेते हैं। उस पर विचार करने का, बात करने का, चर्चा करने का कष्ट तक नहीं करते। बस धर्म को मानने लगते हैं। हमने कभी स्वयं से भी यह प्रश्न नहीं किया कि मुझे क्यों इस अथवा उस धर्म को मानना है? मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है? किसी धर्म को मानते हुए क्या मुझे वह लक्ष्य प्राप्त होगा? यह धर्म किसने रचे? क्यों रचे? उसका अनुसरण करने का अंतिम लक्ष्य क्या है? उस के पीछे का तर्क क्या है? यह हमारी विडम्बना रही है कि हमने इन बातों की कभी चिंता नहीं की।“ जीत क्षण भर रुका। वफ़ाई उसके शब्दों को ध्यान से सुन रही थी। उन शब्दों पर विचार कर रही थी। वह दुविधा में थी, विचार मग्न थी। उसके मन में अनेक विचार चल रहे थे। 

“वफ़ाई, यह तो स्पष्ट हो गया कि जो धर्म को तुम मान रही हो वह तुम्हारी पसंद नहीं थी किन्तु तुम पर वह थोपा गया था।“ 

“अर्थात मेरा धर्म क्षति से भरा है। बाकी सभी धर्म पूर्ण है।“ 

“नहीं, कदापि नहीं। यही तो छलना है। यही तो भ्रमणा है। यही तो दिशा से भटकाता है। यही तो असत्य है। कोई भी धर्म पूर्ण नहीं है। सभी भ्रम का प्रसार करते हैं। सभी दुविधाएँ बढ़ा देते हैं। वह जीवन के किसी उद्देश्य की तरफ नहीं ले जाता, ना ही वह आनंद प्रदान करता है। वह कभी भी ईश्वर के समीप नहीं ले जाता। वास्तव में धर्म के कारण ही हम ईश्वर से कहीं दूर चले गए हैं। धर्म मानव मात्र को ईश्वर से विमुख कर देता है।“

“तो तुम मानते हो कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है?’

“मैंने ऐसा नहीं कहा। ईश्वर के प्रति मेरी पूरी श्रध्धा है।“

“किन्तु तुम किसी धर्म में आस्था क्यों नहीं रखते? जीत, तुम्हारी बातें मुझे अधिक से अधिक दुविधा में ड़ाल रही है।“

“यही कार्य है धर्म का, दुविधाओं में डाल देना। मेरा विश्वास किसी धर्म में नहीं है इसका अर्थ यह नहीं कि मैं नास्तिक हूँ। मैं भगवान के अस्तित्व को मानता हूँ।“

“तो उस भगवान को कैसे प्राप्त किया जा सकता है? उस लक्ष्य तक का मार्ग क्या है?” वफ़ाई ने निर्दोष बालक की भांति प्रश्न कर दिया।

“इस विषय में कोई तुम्हारा मार्गदर्शन नहीं कर सकता। यह सम्पूर्ण रूप से व्यक्तिगत है। यह तुम्हारे तथा ईश्वर के बीच की बात है। ईश्वर से ही पूछ लो। तुम जिस मार्ग पर यात्रा करना चाहती हो उस पथ का मार्गदर्शन वही कर सकता है। यह व्यक्ति का अपना मार्ग है। तुम्हें उस मार्ग को ढूँढना होगा। इस में कोई सहाय नहीं कर सकता। अपने ईश्वर को, उस तक के मार्ग को स्वयं ढूंढो। वह विशेष होगा, भिन्न होगा। वह आनंद से पूर्ण होगा, वह शाश्वत होगा। ढूंढो उसे। वह तुम्हारे अंदर ही है कहीं।“

“जीत, मुझे लगता है कि तुम कोई महान संत हो। क्या तुम्हें तुम्हारा ईश्वर मिल गया? क्या तुम्हें तुम्हारा मार्ग मिल गया? मेरी धारणा है कि तुम उस लक्ष्य को प्राप्त कर चुके हो।“

“पुन: तुम छलना को पकड़ रही हो। मुझे मेरा ईश्वर नहीं मिला है, मैं अभी भी उसे ढूँढ रहा हूँ।“

“जब तुम्हें ही तुम्हारे ईश्वर एवं तुम्हारे लक्ष्य का ज्ञान नहीं है तो तुम मुझे क्यों मार्ग से भटका रहे हो?“ वफ़ाई उत्तेजित हो गई।

“मैंने तुम्हें मार्ग भ्रष्ट नहीं किया। मैंने यह भी आग्रह नहीं किया कि तुम मेरे शब्दों को अनुसरो। मैंने तो केवल तुम्हारे शब्दों का उत्तर ही दिया है।“ जीत शांत था, सौम्य था। उसके अधरों पर स्मित था।

“मुझे भटकाओ मत। यह बता दो कि मुझे क्या करना चाहिए? क्या मुझे मेरे अल्लाह तथा मेरे धर्म को छोड़ देना चाहिए?” वफ़ाई ने सीधा प्रश्न किया।

“यह तुम्हारा प्रश्न है, तुम ही उत्तर ढूंढ लो।“

“ठीक है, जीत। तुम्हारा धर्म कौन सा है? कौन तुम्हारा ईश्वर है?”

“कोई नहीं। ईश्वर तथा धर्म की बातों से मैं मुक्त हूँ।“

वफ़ाई कुछ भी निष्कर्ष पर नहीं आ सकी, अधिक दुविधा में पड गई।  

                                               

व्रजेश दवे 

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