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चंदू चचाने खेली होली

चंदू चच्चा ने खेली होली!

अर्चना चतुर्वेदी



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चंदू चच्चा ने खेली होली!

होली का नाम सुनते ही हमें अपने के मोहल्ले चंदू चच्चा — की याद बडी जोरों से आ जाती है । वैसे तो हमारे चाचा जी बडे ही शांत शरीफ आदमी टाइप थे पर होली का मौसम आते यानि फागुन शुरू होते ही चचा के भीतर कोई शैतान सा घुस जावे था और फिर शुरू होती चचा की शैतानियाँ । चचा के खुराफाती दिमाग में ऐसी ऐसी शैतानियाँ आती कि कोई कितना भी होशियार हो तो भी उनके हमले से बच नही पाता । उनकी एक टोली बन जाती और फिर शुरू होता नाक में दम करने का दौर । यदि कोई चच्चा को डांटे या उनके माँ बाबा से उनकी शिकायत करे तो चच्चा ऐसा सबक सिखाते कि वो ससुरा पूरी जिंदगी चच्चा के रस्ते में आने की हिम्मत ना करता । एक बार हमारे मौहल्ले के ही रामचरण काका ने चचा की शिकायत उनके पिताजी से कर दी और चच्चा को पडी मार । चच्चा का खून खौल गया और अपनी बन्दर टोली के साथ मिलकर रामचरण काका को सबक सिखाने की सोची ।

चच्चा ने गली से गाय का गोबर उठाया और एक दौने में रख बाहर चाट वाले के पास गए उसे रूपये दिए और बोले ”इस पर दही सौंठ चटनी सब डार दे जे एक दम दही बडा जैसो लगनो चाहिए“ चाट वाला उन्हें जानता था चुप चाप दौना सजाया और दे दिया । फिर चच्चा ने एक बच्चे को पकडा और उसके हाथो वो गोबर वाला दही बडा रामचरण काका के पास भिजवा दिया । काका खाने के शौकीन थे सो अडौस पडौस वाले कुछ ना कुछ भेजते रहते थे । बच्चे ने कहा ”काका ये माँ ने भेजा है“ काका ने चट्ट से दौना लपका और गप्प से चम्मच भर के मुहं में डाला, जिस गति से दही बडा मुहं में गया, उसकी दुगुनी गति से वापिस भी आ गया । अब तो बेचारे काका हलक में उँगलियाँ दे दे कर उल्टियां कर रहे थे और चच्चा टोली तालियाँ पीट पीट कर हँस रही थी और काका रंग बिरंगी गालियाँ बरसा रहे थे । पूरा मोहल्ला इस फ्री की फिल्म का आनंद ले रहा था । पर ये पक्का था अब काका हमारे चच्चा के रस्ते में तो नही आएगा ।

ये चच्चा और उनकी बन्दर टोली, होली जलाने के लिए गाते बजाते चंदा मांगने आती और हर दरवाजे पर चिल्लाते ”पैसा देगी जभी टरेंगे,नई तौ तेरे घर में मूसे मरेंगे“ और जो आनाकानी करता उसके घर का लकडी का सामान ले जाकर फूंक डालती । किसी की चारपाई तो किसी के किबाड उखार कर ले जाते इसलिए सब चुपचाप चंदा देते । होली की मिठाई के नाम पर कितनों को भांग की बर्फी या लड्डू खिला डालते और मेला करवा देते । कभी पीली मिटटी से मेवावाटी बना कर खिलाते । पूरे महीने भर उनकी ही कौतुक कथाएं चलती ।

चच्चा की एक खासियत और थी कि वो जो करने की ठान लें उसे करके ही मानते थे । पर चच्चा दिल के भी बहुत अच्छे थे, हमारी माँ की तो बहुत इज्जत करते थे और उन्हें कृष्णा भौजाई कहते ।

हमारी माँ थोडे पुराने विचारों की गंभीर महिला हैं, पूरा महल्ला उनकी इज्जत करता था और उनके गुस्से से डरता ।माँ हमेशा घूंघट में रहती और मजाल है, कोई उनकी शक्ल देख ले । उन्हें होली से परहेज नहीं पर कोई मर्द उनका मुहं देखे या रंग लगाये, ये उन्हें कतई पसंद नही था । सो होली के दिन या तो वो रसोई में खाने पीने के बीच रहती या कमरे में खुद को बंद कर लेती । मौहल्ले भर के देवर हर साल उन्हें रंग लगाने की सारी कोशिशें कर डालते, पर मजाल है आज तक कोई उन्हें छू भी पाया हो । वो इस तरह सबकी बैंड बजाती कि देवर तो दूर कभी हमारे पिताजी ने भी उन्हें रंग लगाने की हिम्मत नही की । एक बार होली के आस पास की बात है , हमारे चाचा ,पिताजी और मौहल्ले के अन्य लोग बैठे गप्पें लगा रहे थे तभी चच्चा बोले ”हम तो अबकी कृष्णा भौजाई के संग होली खेलेंगे ” सब हँसने लगे और पिताजी हँसते हँसते बोले ”क्यों रे चंदू आज कल नींद पूरी ना है रही दीखे, सो तू दिन में ही सपने देखन लग्यो है । आज तक २० साल में तेरी भौजाई का खसम तो उसके संग होली खेल ना पायो तू खेलेगो होली ? पिताजी की बात सुनते ही सब और जोर जोर से हँसने लगे पर चच्चा फुल कोंफिडेन्स बोले, ”लगी शर्त अबकी हम भौजाई संग होली खेल के दिखायेंगे ।“ पिताजी तुरंत बोले ”लगी ५०० की अब तो तू रंग लगा के दिखा, हम सब भी तेरे साथ हैं । उस दिन तो सब घर चले गए पर सबके दिमाग में यही चल रहा था चंदू चच्चा अब क्या करेंगे ?

होली वाले दिन शाम का वक्त था, सभी लोग होली की पूजा करने गए थे,घर पर दादी और हमारी माँ थी तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया ........माँ ने दरवाजा खोला तो हमारे चाचा के दोस्त पप्पू चाचा थे, जिनकी पिछले महीने ही शादी हुई थी, उनके साथ घूघट में एक महिला थी, जो नई दुल्हन लग रही थी । चाचा ने दुल्हन से कहा, ”भाभी के पैर छुओ“ फिर कुछ शर्माते हुए बोले, ”भाभी जे आपकी देवरानी हैं“ मम्मी ने प्यार से उन दोनों को अंदर बुलाया ”अरे भीतर आओ..... बहुरानी तौ पहली बार हमारे घर आई है“ फिर मिठाई नमकीन ले आयीं तभी चाचा बोले ” भाभी आप नाराज ना हों तो एक बात कहें “

माँ बोली ”बोलो देवर जी नाराज क्यों होंगे? बोलो क्या कहना हैं ?

”जे आपकी देवरानी आपके साथ होली खेलना चाहे, इनके मायके में रीत है कि सबसे पहले जेठानी के रंग लगावें, पर हमारा तो कोई बडा भाई भाभी है ना, आप ही हैं हमारी भाभी सो हम इन्हें यही ले आये“ चाचा एक साँस में पूरी बात कह गए और ऐसे मुहं लटका लिया मानो कितने दुखी हों ।

माँ बोली ”देवर जी आप तो जानो हो हम होली ना खेलते“ पर आप उदास ना हो, यदि बात रीति रिवाज की है तो हम अपनी देवरानी से शगुन का थोडा सा रंग लगवा ही लेंगे, आप बाहर जाओ ।

चाचा चुपचाप बाहर चले गए फिर माँ अपने सर से पल्ला हटाती हुई बोली ”ले बहुरानी लगा ले गुलाल“ नई चाची ने झट से खूब सारा गुलाल माँ के चेहरे पर लगा दिया ।

”लाओ थोडा हमें भी दो थोडा गुलाल, हम भी तुम्हे लगा लें “....... कहते हुए जैसे ही माँ ने नई चाची का घूंघट हटाया........ ऐसा लगा मानो हमारे घर में तूफान आ गया हो दुल्हन का मुहं देखते ही माँ ने झट से अपना पल्लू सिर पर रखा और पास रखा डंडा उठाया और गुस्से से चीखती हुई नई बहुरानी को मारने को दौडी और तभी पापा आ गए और बडी मुश्किल से बहुरानी को मम्मी से पिटने से बचाया और उसे लेकर घर के बाहर भागे । अब माँ गुस्से से गालियाँ बरसा रही थी और बाहर पापा चाचा और बाकी लोग जोर जोर से हँस रहे थे, और तालियाँ बजा रहे थे । नई दुलहन यानि चंदू चच्चा अपनी साडी घुटने तक उठाये पापा से अपनी शर्त के ५०० रूपये मांग रहे थे । आखिर वो माँ को रंग लगाने की अपनी शर्त जीत जो गए थे । हैं ना हमारे चंदू चच्चा असली हुरियारे !

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