अल्हड़ Mukteshwar Prasad Singh द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

अल्हड़

Mukteshwar Prasad Singh मातृभारती सत्यापित द्वारा हिंदी कविता

तेज छिटकती बिजलीबादलों की गडगडाहटहवा के झूले पर डोलतीवारिस की बूंदें आ बैठती हैचेहरे पर।जलकणों से भीगता रोम रोम और सांसेंउतावली।बार बार तेज चमक से चौंकचुंधियाती आंखें मूंद जाती हैं बरबसमूंदी आंखों के झरोखों में सज गयी हैंवरषों की ...और पढ़े

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