स्वाभिमान - लघुकथा - 22 Janki Wahie द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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स्वाभिमान - लघुकथा - 22

Janki Wahie द्वारा हिंदी लघुकथा

हथकरघे पर बैठी गौरा को देख, सुबोध चहक कर बोला- चाची जी, दोनों गलीचे तुरन्त बिक गए। सुबोध, सच्ची ! आप सुंदर धागों और रंगों को बुनकर, जादुई डिज़ाइन का ऐसा ताना बाना बुनती हो ...और पढ़े


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