आरजू Darshita Babubhai Shah द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

आरजू

Darshita Babubhai Shah मातृभारती सत्यापित द्वारा हिंदी कविता

जैसे चलना, बसना, सजना ये मशीन की तरह अपने आप बनते कर्म हो गए है दूसरी और सोचो तो आदमी जैसे किसीके लिए या अपने आप के लिये यह सबकुछ नहीं कर रहा है, फिर भी कर्म कर ...और पढ़े

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