लोग कहते हैं कि जीवन में पैसा ही सब कुछ होता है। यह बात मैं नहीं कहता—मेरे आसपास के सभी लोग कहते हैं। बचपन से ही मैं यह सुनता आया था कि अगर आपके पास पैसा हो, तो जीवन की हर चीज आसान हो जाती है और इंसान खुश रह सकता है। लोग यह भी कहते हैं कि पैसे से इंसान लगभग सब कुछ खरीद सकता है। मैंने इस बात को बहुत गंभीरता से ले लिया। मैंने खूब मेहनत से पढ़ाई शुरू कर दी, क्योंकि मुझे पैसा कमाना था—बहुत सारा पैसा—ताकि मैं एक अच्छी जिंदगी जी सकूं। मैंने अलग-अलग जगहों से किताबें इकट्ठा करनी शुरू कीं। उन्हें पढ़ता और उनके अंदर छिपे रहस्यों को समझने की कोशिश करता। उन किताबों से जो कुछ भी मैंने सीखा, वही इस कहानी में आपको आगे जानने को मिलेगा।
Money Vs Me - Part 1
लोग कहते हैं कि जीवन में पैसा ही सब कुछ होता है। यह बात मैं नहीं कहता—मेरे आसपास के लोग कहते हैं। बचपन से ही मैं यह सुनता आया था कि अगर आपके पास पैसा हो, तो जीवन की हर चीज आसान हो जाती है और इंसान खुश रह सकता है। लोग यह भी कहते हैं कि पैसे से इंसान लगभग सब कुछ खरीद सकता है। मैंने इस बात को बहुत गंभीरता से ले लिया। मैंने खूब मेहनत से पढ़ाई शुरू कर दी, क्योंकि मुझे पैसा कमाना था—बहुत सारा पैसा—ताकि मैं एक अच्छी जिंदगी जी सकूं। मैंने अलग-अलग जगहों ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 2
“बिना मेहनत के अमीर बनने के दस तरीके।”मैं सोचने लगा—ये किताब आखिर मेरे किस काम आने वाली थी? शायद लेखक ने टाइम पास करने के लिए ही इसे लिख दिया होगा। इसमें लिखे तरीके मुझे इतने बेढंगे और गैर-तार्किक लगे, जैसे किसी ने अपनी कल्पनाओं को बस किताब का रूप दे दिया हो। मैंने मन ही मन सोचा—“क्या किसी ने सच में इन तरीकों को कभी आज़माया भी होगा?”लेकिन सच तो यह था… कि मैं खुद इन्हें आज़माने वाला था। मैं—क्षितिज के. चौधरी। मुझे बिना मेहनत के अमीर बनना था। मैं इस दुनिया को करीब से देखना चाहता था, ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 3
मैं दिन भर कैफ़े में काम करता और शाम को सज संवर कर निकल जाता अपनी हीरोइन की तलाश जो मुझे ज़िंदगी के सारे सुख दे — पैसा, पावर, लग्ज़री लाइफ़। हाँ, मैं आपको बता दूँ मेरी पर्सनैलिटी अच्छी खासी ठीक ठाक है। मेरी उम्र 24 की हो चुकी है, रंग साफ़ है बिल्कुल मेरी माँ की तरह, ऊँचा कद मेरे पापा जैसा और जिम जाकर बॉडी भी अच्छी बना चुका था। कुल मिला कर अगर देखा जाए तो कोई भी अच्छी खूबसूरत लड़की भी मुझे मिल सकती थी, लेकिन मुश्किल सवाल ये था कि कोई भी खूबसूरत लड़की… ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 4
उस दिन मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरी मन की मुराद अब बस पूरी होने ही वाली है। उस किताब में लिखे सारे आइडियाज़ सच में काम करते हों।उस शाम मैं रेस्टोरेंट में मीरा से मिला… या यूँ कहूँ कि मैंने पहली बार मीरा को देखा था। वो अपनी सहेलियों के साथ बैठी थी। शायद मेरी चोरी-छिपे उठती नज़रों को उसकी सहेलियों ने नोटिस कर लिया था। उन्हें लगा होगा कि मैं मीरा में दिलचस्पी रखता हूँ… वही प्यार-व्यार वाला चक्कर।लेकिन मैं कहाँ प्यार करने वालों में से था। मीरा… या कोई भी लड़की… मेरे लिए बस एक ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 5
मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि जो कुछ हो रहा था, वो था या कहीं कोई बड़ी गलती होने वाली थी। एक पल के लिए मन में डर आया, लेकिन अगले ही पल मैंने सिर झटक कर सारे नेगेटिव ख़याल बाहर निकाल दिए। “रिस्क लेने से ही किस्मत बदलती है, क्षितिज… जो डर गया, वो मर गया,” मैंने खुद से कहा।ज़िंदगी ने मुझे वो मौका दिया था, जिसका मैं कब से इंतज़ार कर रहा था। अब पीछे हटना कमजोरी होती। मैंने गहरी सांस ली, अपना कॉन्फिडेंस वापस जुटाया और धीरे-धीरे उसी दिशा ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 6
उस दिन के बाद मैं मीरा से अक्सर मिलने लगा। और हर मुलाकात के साथ एक अजीब सा खिंचाव भी गहरा होता जा रहा था। मीरा के शौक इतने महंगे थे कि उसके लिए गिफ्ट लेते-लेते मेरी पूरी सैलरी जैसे हवा में उड़ जाती थी। महीने के बाकी दिन कैसे कटते थे, यह सिर्फ मैं जानता था—और शायद मेरी खामोशी भी। लेकिन मैं खुद को समझा लेता था कि बस थोड़ा सा वक्त और… फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा। शायद किस्मत भी, और हालात भी, अपने हिसाब से लौट आएँगे। इसी उम्मीद के सहारे मैं जिंदा सा चल ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 7
संजना ने जो एड्रेस हमें दिया था, वहाँ पहुँचते ही हमारी गाड़ी एक बेहद पॉश और आलीशान सोसाइटी के आकर रुकी। ऊँची-ऊँची इमारतों और शानदार बंगलों से घिरी उस सोसाइटी का रुतबा दूर से ही महसूस किया जा सकता था। लेकिन जैसे ही हमारी नज़र उस खास बंगले पर पड़ी, जिसके सामने गाड़ी रुकी थी, हम कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गए। वो कोई साधारण बंगला नहीं था, बल्कि किसी राजा-महाराजा के महल से कम नहीं लग रहा था। उसकी भव्यता, उसकी चमक-दमक और उसकी शान देखते ही बनती थी। बंगले की ऊँची संगमरमर से बनी दीवारें, खूबसूरत ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 8
तभी दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई और हमारी नज़र उधर उठ गई। एक नौकर हाथों में चाँदी जैसी चमकती लिए खड़ा था। ट्रे में बर्फ से ठंडे शरबत के गिलास सजे हुए थे। वह बड़े सलीके से हमारे पास आया और एक-एक गिलास हमारे सामने रख दिया। मैंने और कुलदीप सेठ ने अपने-अपने गिलास उठा लिए। "लीजिए सर।" इतना कहकर नौकर वापस चला गया। कमरे में फिर से खामोशी छा गई। कुलदीप सेठ धीरे-धीरे शरबत की चुस्कियाँ लेते हुए पूरे कमरे का जायज़ा ले रहे थे। उनके चेहरे पर साफ़ दिखाई दे रहा था कि वे अंदर ही अंदर ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 9
"शितिज, मुझे संजना ने बताया कि तुम और मीरा एक-दूसरे को पसंद करते हो... और तुम उससे शादी करना हो।" संजना के पापा की आवाज़ सुनकर मैं अपनी उलझी हुई सोचों से बाहर आया। मेरे मन में अभी भी कई सवाल घूम रहे थे, लेकिन मैंने खुद को संभालते हुए कहा, "जी अंकल, यह बात सही है। और इसी वजह से मेरे अंकल, कुलदीप जी, मेरे साथ आए हैं ताकि आगे की बात हो सके।" मैंने कुलदीप सेठ की तरफ इशारा करते हुए कहा। संजना के पापा ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। "कुलदीप जी, आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। और ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 10
घर आकर मैं कुछ देर कुलदीप सेठ के साथ बैठा रहा। उनके होंठों पर जैसे एक ही बात अटक थी—“मीरा बहुत अच्छी लड़की है... सगाई की तारीख कब की रखनी है?” वो लगातार मुझसे बातें किए जा रहे थे और मैं बस खामोश बैठा सुनता रहा। बड़ी मुश्किल से मेरे होंठ हिले और मैं इतना ही कह पाया, “सोचकर बताता हूँ...” यह कहकर मैं लगभग भागता हुआ अपने कमरे में आ गया। ऐसा लग रहा था जैसे मेरा अपना दिमाग मुझ पर ठहाके लगा रहा हो। मैं इतना बड़ा बेवकूफ कैसे हो सकता था? बिना मीरा के बारे में ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 11
मैं एक बार फिर से उसी सिचुएशन में खड़ा था, जहाँ 8 साल पहले था। तब मैंने अपना घर था, और आज फिर से वही सब रिपीट हुआ। एक बार फिर सब कुछ पीछे छोड़कर मैं दूसरे अनजान शहर आ गया। मुझे नहीं पता था कि इस बार क्या होने वाला है, किस्मत मुझे कहाँ तक आज़माने वाली है। लेकिन फिलहाल मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल फिर से वही था—रहने के लिए घर और खाने के लिए दो वक्त की रोटी का। 3-4 दिन फिर से परेशान रहने के बाद मुझे आखिर रहने और खाने का बंदोबस्त हो ही ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 12
अध्याय 1: अधूरा सपना एक आलीशान बंगला था, जिसके बाहर महंगे संगमरमर की नेम प्लेट लगी हुई थी। उस सुनहरे अक्षरों में लिखा था— "क्षितिज के. चौधरी" बंगले के अंदर हर तरफ शानो-शौकत बिखरी हुई थी। आधा दर्जन नौकर मेरे आगे-पीछे घूम रहे थे। कोई पानी का गिलास लिए खड़ा था, कोई ताज़ा जूस लेकर इंतजार कर रहा था। एक नौकर तो मेरे पैरों के पास चप्पल लिए खड़ा था, मानो उसे इस बात की चिंता हो कि कहीं मेरे पैर जमीन को न छू लें। मैं पूरे रौब और ठाठ के साथ बिस्तर से उठा। चप्पलों में पैर ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 13
मैं उस दिन रात भर ठाकुर साहब के बंगले पर ही था। ठाकुर साहब बिल्कुल अकेले थे, बस एक उनके साथ मौजूद था। डॉक्टर ने चिंता जताई थी कि रात में उनके पास किसी का होना ज़रूरी है, इसलिए मुझे वहीं रुकना पड़ा। सुबह जैसे ही ठाकुर साहब को होश आया, तब औपचारिक रूप से मेरा उनसे परिचय हुआ। अब तक हम दोनों ही एक-दूसरे के लिए बिल्कुल अजनबी थे। मुझसे मिलकर वे कुछ संतुष्ट और निश्चिंत नज़र आ रहे थे। शायद इसलिए कि अचानक ज़रूरत पड़ने पर मैंने उनकी मदद की थी, और वे इस बात से खुश ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 14
यहाँ तक मेरी कहानी सुनकर शायद आपको भी यही लग रहा होगा कि अब तक तो मुझे हिम्मत हार चाहिए थी। लेकिन ज़रा सोचिए... क्या जो मैं चाहता था, वह सचमुच इतना गलत था? अगर नहीं, तो फिर आखिर मेरी किस्मत बार-बार मेरा साथ क्यों छोड़ रही थी? पहले मीरा... और फिर ठाकुर उदय प्रताप सिंह। ये दोनों मेरी ज़िंदगी में उम्मीद की किरण बनकर आए थे। लगा था कि अब शायद ज़िंदगी की दिशा बदल जाएगी। लेकिन जितनी तेज़ी से वे मेरी ज़िंदगी में आए, उससे भी ज़्यादा तेज़ी से डूबते सूरज की तरह ओझल हो गए और ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 15
मैं बिना एक पल गँवाए बोला, "सर, मैंने अब तक जितना खोया है, उसके बाद डरना लगभग छोड़ दिया अब अगर मौका मिलेगा, तो अपनी पूरी जान लगा दूँगा।" मेरी बात सुनकर ठाकुर साहब के चेहरे पर संतोष की हल्की-सी मुस्कान उभर आई। उन्होंने मेज़ पर रखी घंटी बजाई। कुछ ही क्षणों में उनका निजी सहायक कमरे के अंदर आया। "मिस्टर शर्मा," ठाकुर साहब ने कहा, "वह अपॉइंटमेंट लेटर लेकर आइए... जिसके बारे में मैंने कल बात की थी।" 'अपॉइंटमेंट लेटर'... ये दो शब्द मेरे कानों में गूँजने लगे। मुझे यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि जो मैं ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 16
मैंने उत्सुकता से उनकी ओर देखा। "आज के बाद तुम जो भी देखोगे, सुनोगे या जानोगे... वह इस कमरे बाहर नहीं जाना चाहिए। कई बार तुम्हें ऐसे फ़ैसले पता होंगे, जिनकी जानकारी कंपनी के बड़े-बड़े अधिकारियों को भी नहीं होगी। कई बार तुम्हें मेरे परिवार की सुरक्षा, मेरी यात्राओं और मेरे निजी जीवन से जुड़े मामलों में भी साथ रहना पड़ेगा।" उन्होंने कुछ पल रुककर कहा, "क्या तुम यह ज़िम्मेदारी निभा पाओगे?" मैं बिना एक पल गँवाए अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया। "सर... मैं वादा तो नहीं कर सकता कि मुझसे कभी कोई ग़लती नहीं होगी। क्योंकि मैं ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 17
ठाकुर साहब से मिलकर मुझे लगा जैसे मैं अपनी मंज़िल की पहली सीढ़ी चढ़ चुका हूँ। सीढ़ी इसलिए कहा, किसी की नौकरी करना मेरा सपना नहीं था। जो ठाठ की ज़िंदगी मैं जीना चाहता था, वह किसी की नौकरी करके तो मिलने वाली नहीं थी। असली मज़ा तो उस दिन आने वाला था, जब ठाकुर साहब अपना सब कुछ मुझे सौंपकर खुद किनारे हो जाएंगे। मैंने उसी दिन से उस दिन का इंतज़ार शुरू कर दिया था। कॉल सेंटर में किसी को बताना इतना ज़रूरी नहीं था। छोटी-सी नौकरी छोड़ना भी कोई इतना मुश्किल काम नहीं था। न किसी ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 18
इस हिस्से को मैं आपकी कहानी के मूल भाव को रखते हुए थोड़ा अधिक उपन्यासात्मक, सहज और रहस्य पैदा वाले अंदाज़ में लिख रहा हूँ, ताकि आगे आने वाला ट्विस्ट और मजबूत लगे। मैं धीरे-धीरे ऑफिस का सारा काम सीखता जा रहा था। अब ज्यादातर समय ठाकुर साहब के साथ ही बीतने लगा था। शायद ही कोई मीटिंग ऐसी होती, जिसमें वो मुझे अपने साथ न ले जाते। चाहे वो कोई ऑफिशियल मीटिंग हो, बिजनेस से जुड़ी कोई मुलाकात हो या फिर उनकी निजी जिंदगी से जुड़ा कोई मामला—हर जगह मैं उनके साथ रहने लगा था। धीरे-धीरे उन्होंने अपने ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 19
इस हिस्से में शितिज की बेबस हालत, डर और ठाकुर साहब की चाल को थोड़ा और गहरा किया है, पाठक को महसूस हो कि शितिज अब सिर्फ गवाह नहीं, बल्कि खुद फँस चुका है। मैं पूरी रात सो नहीं सका। ठाकुर साहब की जिंदगी में ऐसे खतरनाक काम भी होते हैं, ये मैंने कभी सोचा तक नहीं था। मैं चुपचाप बिस्तर पर पड़ा छत को घूरता रहा। कुछ देर पहले मेरी आँखों ने जो देखा था, उसके बाद जैसे मेरी जुबान से बोलने तक की ताकत छिन चुकी थी। मैं खुद को एक पिंजरे में कैद ऐसे जानवर की ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 20
ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से दौड़ रही थी और मेरा दिमाग भी उसी रफ्तार से अतीत की गलियों में रहा था। न जाने नानी कैसी होंगी? क्या वो मुझे देखकर खुश होंगी? और चाचा? क्या चाचा और उनका परिवार मुझे देखकर अपनाएगा, जैसे कभी बचपन में अपनाया था? उनके बच्चे भी तो अब बड़े हो गए होंगे। वही बच्चे, जिनकी वजह से मैंने कभी ये घर छोड़ दिया था। बचपन की कितनी सारी बातें एक-एक करके मेरी आँखों के सामने आने लगीं। माँ की दूसरी शादी नानी ने ही करवाई थी। मुझे लगा था कि अब शायद मेरी जिंदगी ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 21
आपके इस हिस्से को कहानी के प्रवाह, भावनाओं और रहस्य को बरकरार रखते हुए साहित्यिक हिंदी में ढाल दिया Writing मैं नानी की आवाज़ सुनकर चौंककर पलटा। “नहीं नानी... कुछ नहीं। ये आदमी कौन है तस्वीर में?” मैंने धीमी आवाज़ में पूछा। नानी ने कुछ पल तस्वीर को देखा, फिर जो जवाब दिया, उसने मेरे पैरों तले की जमीन खिसका दी। “बेटा... ये मोहिनी का दूसरा पति और तेरा सौतेला बाप है।” मैं जैसे अपनी जगह पर जम गया। नानी आगे कहने लगीं— “तेरे पिता के गुजर जाने के बाद घर के हालात बहुत खराब हो गए थे। तू ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 22
इस हिस्से को उसी उपन्यास-जैसे अंदाज़ में, भावनाओं और अतीत के दर्द को थोड़ा और गहरा करते हुए आगे है: Writing इस बार मामा, मामी और उनके बच्चे पहले की तरह मुझसे लड़ने-झगड़ने नहीं लगे थे। शायद मेरे चले जाने के बाद उन्हें अपनी गलतियों का एहसास हो गया था। और सच कहूँ तो मैंने भी अपने कजिन्स की पुरानी गलतियों को भुलाकर उन्हें दिल से माफ कर दिया था। आखिर कब तक मैं उन पुरानी बातों का बोझ अपने सीने में लिए घूमता रहता? मामा का एक छोटा-सा काम था, जिससे वह जैसे-तैसे घर चला रहे थे। बच्चों ...और पढ़े
Money Vs Me - Part 23
रात का समय था। स्टेशन ने जब मुझे वापस उसी शहर में लाकर उतारा, तो कुछ पल के लिए वहीं खड़ा रह गया। वही शहर... जिससे मैं कभी भागकर दूर चला गया था। पता नहीं वह डर था या हालात का असर, लेकिन मैंने एक पल में ही यह ज़िंदगी छोड़कर अपने गाँव, अपनी नानी के पास जाने का फैसला कर लिया था। शायद उस वक्त मुझे लगा था कि इस शहर से जितना दूर जाऊँगा, उतना ही अपने अतीत से भी दूर हो जाऊँगा। लेकिन अब जब मैं फिर उसी शहर में खड़ा था, तो मन के किसी ...और पढ़े