चुपके-चुपके आऊँगा

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यह कहानी कुछ ही दिन पहले की है। एक दिन मैं अपनी डायरी में कहानी लिख रहा था। तभी मेरी खिड़की के पास एक बिल्ली आ गई। वह “म्याऊँ-म्याऊँ” कर रही थी। मैंने उसे प्यार से “पूसी” कहकर बुलाया। वह बिल्ली बिना डरे मेरे पास आ गई और कुछ पल मेरे पास बैठी रही। थोड़ी देर बाद वह उठकर चल दी। मैं उसे बुलाता रह गया, लेकिन वह नहीं रुकी। फिर भी मैं उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। कुछ दूर जाकर वह एक घर के सामने रुक गई। मुझे लगा कि शायद वह लौटकर मेरे पास आएगी, लेकिन जब मैं उसके करीब पहुँचा तो वह पास के घर के अंदर चली गई।

Full Novel

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 1

लेखक -एसटीडी मौर्य ️कटनी मध्य प्रदेशदूरभाष +917648959825यह कहानी कुछ ही दिन पहले की है।एक दिन मैं अपनी डायरी में लिख रहा था। तभी मेरी खिड़की के पास एक बिल्ली आ गई। वह “म्याऊँ-म्याऊँ” कर रही थी।मैंने उसे प्यार से “पूसी” कहकर बुलाया। वह बिल्ली बिना डरे मेरे पास आ गई और कुछ पल मेरे पास बैठी रही। थोड़ी देर बाद वह उठकर चल दी। मैं उसे बुलाता रह गया, लेकिन वह नहीं रुकी।फिर भी मैं उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। कुछ दूर जाकर वह एक घर के सामने रुक गई। मुझे लगा कि शायद वह लौटकर मेरे पास आएगी, लेकिन ...और पढ़े

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 2

लेखक - एसटीडी मौर्य ️चुपके-चुपके आऊँगा – भाग 2जैसा कि मैंने पिछले भाग में बताया था कि जब मैं रहा था, तभी एक बिल्ली आई थी। उसी बिल्ली की वजह से मेरी मुलाकात प्रियांशी नाम की एक लड़की से हुई थी।मेरी छोटी बहन अंकिता जब यह बात जान गई, तो वह जिद करने लगी कि उसे भी प्रियांशी से मिलना है।अब कहानी आगे शुरू होती है…मैं और मेरी बहन बाइक से निकल पड़े और प्रियांशी के घर पहुँच गए। लेकिन जब हम वहाँ पहुँचे तो देखा कि दरवाजे पर ताला लगा हुआ था।अंकिता बोली —“भैया, यही घर है? इसमें ...और पढ़े

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 3

लेखक -एसटीडी मौर्य ️कटनी मध्य प्रदेशमैं अपने कमरे में गया और फ्रेश हो गया।फ्रेश होने के बाद मैं और बहन अंकिता, दोनों प्रियांशी के कमरे की ओर चल पड़े। वहाँ पहुँचकर हमने दरवाज़े के बाहर से आवाज़ लगाई—“कोई है घर में?”हमने दो-तीन बार इसी तरह पुकारा।कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला और सामने प्रियांशी का छोटा भाई खड़ा था।वह हमें देखकर थोड़ा हैरान हुआ और पूछने लगा—“आप लोग कौन हैं?”अंकिता मुस्कुराकर बोली—“मैं प्रियांशी की सहेली हूँ। मैं कटनी से आई हूँ। पहले मैं उनके पुराने घर गई थी, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। इसलिए मैं इतनी दूर उससे मिलने चली ...और पढ़े

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 4

लेखक -एसटीडी मौर्य ️कटनी मध्य प्रदेश (भारत )जैसा कि मैंने पिछले भाग में बताया था, रात को जन्मदिन का बहुत खुशी से पूरा हुआ था। हम सबने मिलकर केक काटा, खाना खाया और देर रात तक बातें करते रहे। उसी रात मैं और प्रियांशी छत की बालकनी में बैठकर अपने दिल की बातें भी कर रहे थे, लेकिन अचानक उनके पापा आ गए थे। उस समय हम दोनों थोड़ा डर भी गए थे, क्योंकि हमें लगा था कि शायद उन्होंने हमें देख लिया है।अब कहानी आगे वहीं से शुरू होती है…मैं और प्रियांशी वहीं रह गए और एक-दूसरे से ...और पढ़े

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 5

जैसा कि पिछले भाग में मैंने बताया था, हमारे रिश्ते की बात धीरे-धीरे घर के लोगों तक पहुँच गई पहले तो सबको थोड़ा आश्चर्य हुआ, लेकिन बाद में घर में इस बात पर चर्चा होने लगी कि अगर हम दोनों एक-दूसरे को सच में चाहते हैं, तो आगे क्या किया जाए।दादी तो शुरू से ही हमारे साथ थीं। वह बार-बार यही कहती थीं कि लड़की की खुशी सबसे बड़ी होती है। लेकिन घर के कुछ लोग अभी भी सोच में पड़े थे। इसी बीच घर में यह भी बात उठने लगी कि अगर सब ठीक रहा, तो शादी की ...और पढ़े

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 6

लेखक -एसटीडी मौर्य ️जैसा कि पिछले भाग में हुआ था, प्रियांशी के पापा मुझसे कई बातें पूछ चुके थे—मेरे के बारे में, पढ़ाई के बारे में और मैं क्या करता हूँ उसके बारे में। मैं भी शांत होकर उनके हर सवाल का जवाब दे रहा था। तभी उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा और एक और सवाल पूछा, जो मेरे लिए थोड़ा अलग था।उन्होंने कहा— “बेटा, क्या मैं तुम्हारा पूरा नाम जान सकता हूँ?”यहीं से आगे की बात शुरू होती है…फिर प्रियांशी के पापा मुस्कुराते हुए कहने लगे—“बेटा, तुमने मेरा दिल जीत लिया। मैं तुमसे बहुत प्रभावित हूँ, क्योंकि ...और पढ़े

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 7

लेखक -एसटीडी मौर्य ️बस पंक्चर हो जाने के बाद हम तीनों जल्दी-जल्दी पैदल ही रेलवे स्टेशन की ओर चलने समय बहुत कम बचा था और हमारे मन में बस एक ही चिंता थी—कहीं ट्रेन छूट न जाए।प्रियांशी बार-बार घड़ी देख रही थी और अंकिता भी घबराई हुई थी। मैं उन्हें दिलासा देता हुआ तेज कदमों से आगे बढ़ रहा था।कुछ देर बाद आखिरकार हमें दूर से रेलवे स्टेशन दिखाई देने लगा। यह देखकर हम तीनों के चेहरे पर थोड़ी राहत आ गई।स्टेशन के अंदर पहुँचते ही हमने चारों ओर देखा। प्लेटफॉर्म पर कुछ लोग इधर-उधर बैठे थे, कुछ लोग ...और पढ़े

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 8

लेखक - एसटीडी मौर्य ️कटनी मध्य प्रदेशट्रेन से उतरने के बाद हम लोग स्टेशन के बाहर ऑटो पकड़ने के पार्किंग की ओर चले गए।वहाँ बहुत सारे ऑटो लाइन में खड़े थे। ऑटो वाले जोर-जोर से आवाज लगा रहे थे—“कटनी बाईपास…!”“मधु नगर… मधु नगर चलो…!”इतने में नर्स गुड़िया बोली—“ठीक है, मैं मधु नगर जा रही हूँ। वहीं मैं एक कमरा लेकर रहती हूँ। अब मैं यहीं से चली जाऊँगी। बाय, फिर कभी मुलाकात होगी।”इतना सुनते ही अंकिता तुरंत बोली—“ठीक है, लेकिन अपना नंबर तो दे दीजिए। अगर पास में न मिल सके तो कम से कम फोन पर बात तो ...और पढ़े

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 9

लेखक - एसटीडी मौर्य ️कटनी मध्य प्रदेश भारतजैसे ही हम कमरे में पहुँचे, मैंने उत्साहित होकर कहा—“अरे अंकिता! देखो… को होश आ गया है!”अंकिता खुशी से बोली—“हाँ भैया… अब मम्मी ठीक हैं।”हम तीनों तुरंत मम्मी के पास जाकर बैठ गए।अंकिता मम्मी के पैरों को दबाने लगी,और प्रियांशी मम्मी के सिर में हल्के-हल्के तेल लगाने लगी।मम्मी बोलीं—“अरे बेटी, रहने दो… मैं अब ठीक हूँ, सिर पर तेल मत लगाओ।”प्रियांशी मुस्कुराकर बोली—“नहीं आंटी जी, आप अभी ठीक नहीं हैं… आप बस आराम कीजिए।”मम्मी फिर बोलीं—“अरे बेटी, रहने दो… अंकिता ही कर देगी। तुम कर रही हो, अच्छा नहीं लगता।”प्रियांशी हल्का सा ...और पढ़े

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 10

लेखक - एसटीडी मौर्य ️कटनी मध्य प्रदेशअंकिता बिना कुछ सोचे-समझे मेरे पास आ गई।मैंने तुरंत मज़ाक में उसके कान लिए—जैसा कि पापा ने इशारा किया था।अंकिता चिल्लाते हुए बोली—“अरे भैया! कान छोड़ो… दर्द हो रहा है!”फिर पापा की तरफ देखकर बोली—“देखो पापा! भैया मेरे कान पकड़ लिए हैं, छोड़ ही नहीं रहे!”मम्मी भी मुस्कुराते हुए बोलीं—“अरे नालायक! मेरी बेटी का कान तो छोड़ दे।”यह सब देखकर प्रियांशी चुपचाप मुस्कुरा रही थी।उसे हमारा यह अपनापन और मस्ती बहुत अच्छा लग रहा था।फिर वह हल्के से बोली—“अरे, अंकिता का कान छोड़ दीजिए…नहीं तो जब यह ससुराल जाएगी, तब आप ही रोने ...और पढ़े

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 11

पापा बोले—“नहीं बेटा, कोई नहीं आया होगा… लगता है खिड़की खुली रह गई थी, उसी वजह से सामान बिखर होगा।”मैंने कहा—“ठीक है, चलो अपने-अपने कमरे चेक करते हैं… तभी पता चल जाएगा कि कोई आया था या नहीं।”हम लोगों ने मम्मी को उनके कमरे में बैठा दिया।प्रियांशी उनके पास ही रुक गई, और हम बाकी लोग अपने-अपने कमरों की तरफ चले गए।हमने अपना कमरा चेक किया—लेकिन वहाँ सब कुछ ठीक था, कुछ भी गायब नहीं था।फिर हम मम्मी के कमरे में गए…और जैसे ही अलमारी खोली, हम सबके होश उड़ गए।मम्मी के सारे गहने गायब थे…मैंने घबराकर कहा—“मम्मी, आपके ...और पढ़े

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 12

मैंने पूछा— “कोई बात नहीं सर… लेकिन सुनवाई शुरू होने में कितना समय लग सकता है?” अधिकारी ने शांत में कहा— “यही कोई कुछ हफ्ते लग सकते हैं… और आपको एक वकील रखना होगा।” फिर उन्होंने समझाते हुए कहा— “चाहें तो आप सरकारी वकील ले सकते हैं, या अपनी पसंद का निजी वकील भी रख सकते हैं।” मैंने तुरंत कहा— “ठीक है सर, हम अपना वकील खुद ही रख लेंगे। आप बस कार्रवाई शुरू कर दीजिए।” अधिकारी ने सिर हिलाकर हामी भर दी। हम दोनों वहाँ से निकल पड़े… मन में थोड़ी राहत थी कि अब मामला आगे बढ़ेगा, ...और पढ़े

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 13

मैं रात भर इन्हीं बातों को सोचता रहा… और सोचते-सोचते कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला। (अगले सुबह मैं गहरी नींद में सोया हुआ था, तभी प्रियांशी मेरे पास आ गई और मुझे जगाने लगी। लेकिन मैं इतनी गहरी नींद में था कि मुझे कुछ पता ही नहीं चल रहा था। वह मेरी चादर खींच रही थी… फिर भी मैं नहीं जागा। तभी अंकिता हँसते हुए बोली— “प्रियांशी, ये ऐसे नहीं उठेगा… लो पानी, इसके ऊपर डाल दो… तुरंत उठ जाएगा!” फिर क्या था… प्रियांशी ने सच में पानी लेकर मेरे ऊपर डाल दिया! मैं झटके से ...और पढ़े

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 14

मैंने कहा—“चलो ठीक है… सफर का आनंद लेते हैं।लो, तुम लोग भी मूंगफली खाओ…”इतना कहकर मैंने मूंगफली का लिफाफा तरफ बढ़ा दिया।अंकिता ऊपर वाली सीट से नीचे उतरी और2–3 मूंगफली उठाकर खाने लगी।तभी प्रियांशी मुस्कुराते हुए बोली—“और बताओ अंकिता, सफर कैसा लग रहा है?”अंकिता ने उत्साह से कहा—“मुझे तो बहुत अच्छा लग रहा है…मैं पहली बार दोस्तों के साथ सफर कर रही हूँ।”फिर थोड़ी देर रुककर बोली—“सच में, मैंने सफर तो बहुत किया है…लेकिन हमेशा मम्मी-पापा के साथ ही।”हमारी बर्थ पर दो और यात्री भी बैठे हुए थे।उन्होंने हमारी बातें सुनकर मुस्कुराते हुए पूछा—“अरे, तुम लोग कहाँ जा रहे ...और पढ़े

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