(भाग 14)
एकार्थ्य के उस दिन के बाद फिर कोई संदेश नहीं आया।
दिन धीरे-धीरे बीतते रहे। विभा हर दिन की तरह अपना जीवन जीती रही, लेकिन उसके मन का एक हिस्सा जैसे कहीं ठहर गया था। वह कई बार सोचती कि जिस व्यक्ति ने उससे इतने अपनेपन से बातें की थीं, जिसने उसे अपना कहा था, वह अचानक बिना कुछ बताए कहाँ चला गया।
विभा ने उसे जानने की कोशिश की, उसके बारे में पता लगाने की कोशिश की, लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला।
एक दिन विभा अपने कमरे में आईने के सामने खड़ी थी। उसने कुछ देर तक चुपचाप स्वयं को देखा।
उसे लगा जैसे आईने में केवल उसका चेहरा नहीं, बल्कि उसका बदलता हुआ जीवन दिखाई दे रहा हो।
वह सोचने लगी—
जीवन भी कितना अजीब है। शायद यह आईने की तरह ही होता है।
जब हम प्रसन्न होते हैं, तो हमारे चेहरे की मुस्कान आईने में भी खिल उठती है। जब मन दुखी होता है, तो वही उदासी हमारे चेहरे पर दिखाई देती है। और जब जीवन में कोई ग़म होता है, तो उसका असर हमारे पूरे व्यक्तित्व पर दिखाई देने लगता है।
हम समय के साथ बदलते रहते हैं और आईना हर दिन हमें हमारा बदला हुआ रूप दिखाता रहता है।
विभा आईने के सामने खड़ी अपने उसी बदले हुए स्वरूप को देख रही थी। उसे लगा कि कुछ समय पहले तक उसका जीवन कितना अलग था और अब न जाने कितना कुछ बदल चुका है।
वह केवल आईने में अपना चेहरा नहीं देख रही थी, बल्कि अपने जीवन में आए उन बदलावों को भी महसूस कर रही थी, जिन्होंने धीरे-धीरे उसे पहले से अलग बना दिया था।
कुछ समय पहले तक वह अपने ही संसार में रहती थी, अपनी बातों और अपने विचारों में खोई रहती थी। फिर एक आवाज़ उसके जीवन में आई और न जाने कब वह आवाज़ उसके मन का एक हिस्सा बन गई।
विभा को पहली बार लगा था कि कभी-कभी हम किसी के लिए वहीं ठहर जाते हैं, लेकिन वह व्यक्ति हमें पीछे छोड़कर कहीं चला जाता है।
हम उसके लौटने की प्रतीक्षा करते रहते हैं, लेकिन शायद उसे यह भी पता नहीं होता कि कोई उसके इंतज़ार में अपने जीवन के कितने पल बिता रहा है।
विभा को एकार्थ्य से कोई शिकायत नहीं थी कि वह अपने जीवन में जहाँ भी हो, खुश रहे। लेकिन उसके मन में एक प्रश्न अवश्य था।
तुमने एक बार बताया क्यों नहीं?
यदि कोई मजबूरी थी, कोई परेशानी थी या जीवन में कोई ऐसी बात थी, जिसके कारण उसे जाना पड़ा, तो वह एक बार विभा को बता सकता था।
विभा सोचती—
तुम एक बार कहते तो सही। मैं तुम्हारी बात समझने की कोशिश करती।
वह दूसरों की बातों को सुनती थी और उनकी परिस्थितियों को समझने का प्रयास करती थी। वह अपने मन की बातें भी बहुत सरलता से कह देती थी। लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं था कि उसकी अपनी भावनाएँ नहीं थीं।
उसके मन को भी दुख होता था। वह भी किसी के बिना बताए चले जाने के बाद उदास हो सकती थी।
आईने के सामने खड़ी विभा के मन में अचानक एक और विचार आया।
क्या प्रेम में हमेशा कुछ पाने की इच्छा होती है?
फिर उसने अपने मन से ही उत्तर दिया—
शायद नहीं।
प्रेम तो केवल प्रेम होता है।
वह कभी-कभी बिना कहे भी हो जाता है। बिना देखे भी हो जाता है और बिना सुने भी किसी एहसास की तरह हमारे भीतर जन्म ले लेता है।
प्रेम में हमेशा यह चाहना ज़रूरी नहीं होता कि सामने वाला हमारे लिए कुछ करे। कभी-कभी उसकी केवल मौजूदगी का एहसास ही बहुत होता है।
शायद विभा का प्रेम भी ऐसा ही था।
वह एकार्थ्य से कुछ नहीं चाहती थी। वह बस चाहती थी कि वह उसके जीवन में कहीं बना रहे। चाहे वह सामने न हो, चाहे वह उससे बात न करे, फिर भी उसके होने का एहसास उसके साथ रहे।
वह उसे अपने मन में एक सुंदर-सी स्मृति और एक अपनेपन के एहसास की तरह सँजोए रखना चाहती थी।
लेकिन अब वह एहसास भी अधूरा-सा लगने लगा था।
एकार्थ्य कहाँ था, कैसा था और उसके जीवन में क्या चल रहा था—विभा को कुछ भी पता नहीं था।
वह बस इतना जानती थी कि वह अचानक चला गया था, बिना कुछ कहे।
विभा ने आईने में स्वयं को फिर देखा। उसके मन में अब भी कई प्रश्न थे।
अगर एकार्थ्य कभी लौटकर आता, तो शायद वह उससे बस इतना पूछती—
मैंने तुम्हारे इंतज़ार में इतना समय बिताया। तुम्हारी यादों में अपने जीवन के कितने पल गुज़ार दिए। क्या तुम एक बार भी मुझे यह नहीं बता सकते थे कि तुम कहाँ जा रहे हो?
फिर वह स्वयं ही सोचती कि शायद उसकी कोई मजबूरी रही हो। शायद कोई ऐसी परेशानी रही हो, जिसके बारे में वह विभा को बता नहीं पाया।
लेकिन एक बात उसके मन को बार-बार दुखी करती थी—
मैं तुम्हें समझने के लिए तैयार थी, लेकिन तुमने मुझे समझने का अवसर ही नहीं दिया।
विभा कुछ देर तक आईने के सामने खड़ी रही।
वह अपने चेहरे को नहीं, अपने बदलते हुए जीवन को देख रही थी।
वह नहीं जानती थी कि आगे क्या होगा।
क्या एकार्थ्य कभी उसके जीवन में वापस आएगा?
क्या वह फिर से उसी सहजता से उससे बातें करेगा?
या फिर यह कहानी यहीं रुक जाएगी?
आईने में अपना प्रतिबिंब देखते हुए विभा सोचती रही कि जीवन रुकता नहीं है। वह समय के साथ बदलता रहता है और शायद इसी बदलते हुए जीवन के किसी मोड़ पर उसे अपने सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाएँ।
विभा ने आईने से नज़र हटाई और धीरे से अपने कमरे से बाहर चली गई।
लेकिन उसके मन में एक एहसास अब भी बाकी था—
एकार्थ्य कहीं भी हो, वह उसके मन की कहानी का एक हिस्सा बन चुका था।