आईने में बदलता जीवन ( भाग -13) Chandni choudhary द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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आईने में बदलता जीवन ( भाग -13)



उस दिन एकार्थ्य की कही हुई बातों ने विभा के मन को बहुत गहरी चोट पहुँचाई थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर उसने ऐसा क्या कह दिया था, जिसके कारण एकार्थ्य उससे इतनी नाराज़गी रखने लगा। जिस व्यक्ति के लिए उसके मन में इतना अपनापन था, उसी ने उसे कुछ ऐसी बातें कह दी थीं, जिन्हें वह चाहकर भी भुला नहीं पा रही थी।

विभा को इस बात का भी दुख था कि एकार्थ्य ने उसे स्वार्थी समझ लिया था। वह तो केवल उसके करीब रहना चाहती थी, उससे बातें करना चाहती थी और उसे समझना चाहती थी। उसने कभी नहीं सोचा था कि उसके अपनेपन को इस तरह समझा जाएगा।

वह कई दिनों तक उदास रही। कभी एकार्थ्य की बातें याद करती, तो कभी उन पलों को, जब दोनों के बीच सहजता से बातचीत हुआ करती थी। उसके मन में कई सवाल थे, लेकिन उनका जवाब देने वाला कोई नहीं था।

इसी दौरान विभा ने अपने मन की पीड़ा को शब्दों में ढालते हुए कुछ पंक्तियाँ लिखीं—

आख़िर ऐसा भी क्या कह दिया हमने,
जो तुमने हमसे इतनी दूरियाँ बना लीं?
हम न नाराज़ हुए, न कभी रूठे,
फिर भी तुम हमसे ऐसे रूठे
कि दोबारा कभी मुलाक़ात ही न की।

एक बार बताया तो होता,
आख़िर ऐसी क्या ख़ता हुई हमसे,
कि तुमने हमें इतना दूर कर दिया।

ये पंक्तियाँ केवल शिकायत नहीं थीं, बल्कि उस मन की आवाज़ थीं, जो किसी अपने से दूर होने का कारण तक नहीं जान पा रहा था।

कई दिन बीत गए। फिर एक दिन अचानक विभा के पास एकार्थ्य का संदेश आया—

“कहाँ हो तुम, विभा?”

संदेश देखकर विभा कुछ पल के लिए ठहर गई। इतने दिनों बाद एकार्थ्य का संदेश आया था। उसने तुरंत उत्तर नहीं दिया। कुछ समय तक सोचती रही और फिर लिखा—

“मैं तो यहीं थी, तुम ही कहीं गायब थे।”

एकार्थ्य ने कहा—

“मैंने तुम्हें याद किया। मैं सोच रहा था कि तुम तो बहुत अच्छी थीं। शायद मैं ही कुछ बुरा था, जो तुम्हें ठीक से समझ नहीं पाया। तुम हमेशा मुझसे इतना अपनापन रखती थीं। मुझे अपना मानती थीं। तुम कहती थीं कि मैं तुम्हें सबसे ज़्यादा प्यारा हूँ, लेकिन मैं ही तुम्हारी भावनाओं को समझ नहीं पाया।

तुम सबसे अलग थीं। तुम्हारे भीतर एक अलग ही अपनापन था। शायद मैंने तुम्हें समझने में बहुत देर कर दी। तुम एक अच्छी लड़की थीं और मैं तुम्हें एक मौका देना चाहता हूँ। मैं तुमसे प्रेम करना चाहता हूँ। क्या तुम मुझे अपनाओगी?”

एकार्थ्य की ये बातें सुनकर विभा कुछ पल के लिए निःशब्द रह गई। जिस व्यक्ति को वह इतने दिनों से अपने मन में सँजोए हुए थी, आज वही उससे प्रेम करने की बात कह रहा था।

विभा ने बहुत कुछ सोचा भी नहीं। उसके मन में तो पहले से ही एकार्थ्य के लिए प्रेम था। उसने सहजता से उत्तर दिया—

“मैं तो तुमसे हमेशा से ही प्रेम करती थी। तुम ही मेरी भावनाओं को समझ नहीं पाए। मेरी ओर से तो हमेशा ही हाँ थी, लेकिन तुम ही मुझे अपना नहीं मानते थे।”

एकार्थ्य ने कहा—

“आज मैं तुम्हें अपना मानता हूँ।”

उस दिन विभा बहुत खुश थी। उसके मन में जो उम्मीद इतने दिनों से कहीं दबी हुई थी, वह फिर से जाग उठी थी। उसे लगा कि शायद अब एकार्थ्य उसकी भावनाओं को समझने लगा है।

उस दिन से एकार्थ्य ने विभा को अपना मित्र, अपना परम मित्र और अपनेपन से जुड़ा एक ऐसा साथी मान लिया, जिसके साथ वह अपने मन की बातें साझा कर सकता था। उसने विभा को अपने जीवन में एक विशेष स्थान दिया। विभा भी उसके लिए वही अपनापन रखना चाहती थी, जो वह पहले से महसूस करती आई थी।

उस दिन दोनों के बीच बहुत-सी बातें हुईं। विभा के लिए वह दिन बेहद ख़ास था। वह बहुत खुश थी और उसे लग रहा था कि अब उनके बीच पहले जैसी दूरी नहीं रहेगी। एकार्थ्य भी उससे बातें करके खुश था।

लेकिन यह खुशी अधिक समय तक नहीं टिक पाई।

उस दिन के बाद अचानक एकार्थ्य की ओर से फिर कोई संदेश नहीं आया। न उसने विभा से बात की, न अपनी ख़ामोशी का कोई कारण बताया।

दिन बीतते गए। एक सप्ताह, फिर कई सप्ताह और देखते-देखते लगभग एक महीना बीत गया।

विभा समझ नहीं पा रही थी कि आखिर एकार्थ्य फिर कहाँ चला गया। अभी तो उसने स्वयं अपने मन की बात कही थी। अभी तो उसने विभा को अपनाने की बात की थी। फिर अचानक ऐसी ख़ामोशी क्यों?

विभा ने उसे समझने की बहुत कोशिश की। उसके बारे में सोचती रही, उसके संदेश की प्रतीक्षा करती रही और अपने मन में उठते प्रश्नों के उत्तर खोजती रही।

वह सोचती—

जिसने कभी मुझसे कहा था कि वह मुझसे प्रेम करना चाहता है, वही आज मुझसे इतनी दूर क्यों है? क्या उसकी कही हुई बातें सच थीं? क्या वह सचमुच मुझे अपना मानता था? या फिर यह भी कुछ पलों का एहसास था, जो समय के साथ ख़ामोश हो गया?

विभा के पास इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था।

एकार्थ्य एक बार फिर उसकी ज़िंदगी में आया था, उसके मन में उम्मीद जगाई थी और फिर बिना कुछ कहे कहीं खो गया था।

विभा अब केवल उसके लौटने की प्रतीक्षा नहीं कर रही थी, बल्कि यह समझने की कोशिश भी कर रही थी कि आखिर एकार्थ्य के मन में चल क्या रहा था।

उसे नहीं पता था कि यह ख़ामोशी कितने दिनों तक रहेगी और एकार्थ्य फिर कब उससे बात करेगा।

कभी-कभी किसी का लौटना उतनी खुशी नहीं देता, जितना उसके लौटकर फिर चले जाने का दुख दे जाता है। विभा के जीवन में भी शायद यही हो रहा था।