: प्रकरण -32 :
कई साल बीत गये थे. लेकिन मैं अनन्या का दोरंगी किस्सा भूल नहीं पाया था.
हमें शादी में न्योता मिला था. शादी में मैं केवल उपस्थित था. गीता बहन ने खुद गिफ्ट देकर मुझे अनन्या की शादी में भेजा था. मुझे देखकर उस ने ख़ुशी जाहिर की थी.
उस के साथ मेरा क्या रिश्ता था? मैं कभी नहीं समझ पाया था.
मैं इस रिश्ते को लेकर सदैव असमंजस में रहा था.
इस के लिये अनन्या और अपूर्व का दो रंगी रिश्ता जिम्मेदार था.
एक तरफ वह अपूर्व को राखी बांधती थी और दूसरी ओर उस के साथ रोमांस करती थी. मैं दोनो बातों का आंखों देखा साक्षी था.
उन के व्यवहार ने मुझे ऐसा सोचने पर विवश किया था. भाई बहन में भी ऐसा रिश्ता हो सकता हैं. वैसे मैंने हकीकत में उस के साथ ऐसा कुछ नहीं किया था. लेकिन मुझे अक्सर ऐसे सपने सताते रहते थे :
मैं उस के साथ साइकल पर डबल सवारी कर रहा हूं. मैं अपना हाथ उस के कंधो पर रखता हूं . उस पर वह नाराज हो जाती हैं वह और मुझे हाथ हटाने को कहती हैं.
" लोग हमें देख रहे हैं! "
मैं भी उसे किसी ना किसी बहाने उसे छूने की कोशिश करता था. उस का हाथ पकड़ता था. एक बार मैं रास्ते में 20-25 मिनिट तक उस की उंगली पकडकर घर तक आया था. उस पर उस ने क़ोई एतराज नहीं दर्शाया था.
एक बार मैंने अपूर्व की नकल करते हुए उस के दोनों गालों पर हाथ रखकर सहलाया था. उस बात पर अनन्याने नाराजगी जरूर जाहिर की थी. लेकिन मुझे कुछ नहीं कहां था.
उस वक़्त निशा भी वहाँ मौजूद थी.. वह यह देखकर नाराज हो गई थी.
न जाने अनन्या से मेरा क्या रिश्ता था?
मैं कभी नहीं समझ पाया था.
उसे बिन मा के बेटे के प्रति हमदर्दी थी जो शायद मेरे लिये उस का प्यार साबित हुआ था..
मैंने उस के लिये मेरे दोस्तों को छोड़ दिया था. जिस की वजह से भी मुझे बहुत परेशानी का सामना करना पड़ा था.
वह मेरे साथ अच्छी तरह से पेश आती थी. मेरा ख्याल रखती थी. फिर भी अपनी सगाई की बात उस ने मुझ से क्यों छिपाई थी.? क्या वह मुझे अपने मंगेतर का हरीफ मानती थी? मुझे जानकर दुःख होगा. यह सोचकर क्या उस ने मुझ से इतनी बड़ी बात छिपाई थी.
पड़ोसन औरत ने उस की मा को बधाई दी थी.
" आप तो बडे भाग्यशाली हैं, आप को अच्छा दामाद मिल गया. "
यह सुनकर मुझे ताजुब हुआ था.
उस ने मुझे नहीं बताया थ
उस की ख़ामोशी मुझे उकसाती रहती थी.
मैंने तो कभी सजाग रूप में ऐसा नहीं सोचा था.
मैं उसे प्यार करता हूं.
मैंने एक नादानी की थी.
निशा के भाई के सामने विधान किया था.
" सब लोग अनन्या से प्यार करते हैं. मैं भी उसे प्यार करता हूं. "
इस बात ने अनन्या के दिमाग़ में शक पैदा किया था. और वह मुझ से नाराज हो गई थी.. कुछ बिगड़ गई थी ..मेरी बेवकूफी हीं मेरी दुश्मन बन गई थी. मेरी ही टांगे मेरे गले में अटक गई थी.
एक बार उस ने मुझे अपने घर बुलाकर जो बात कहीं थी, उस से मुझे बड़ा झटका लगा था. मैंने कभी सभान रुप से उसे प्यार नहीं किया था. फिर भी उस ने मुझ पर सीधा इल्जाम लगाया था:
" आई एम नोट योर लवर. "
उस की बात सुनकर मानो मेरी सांसे थम सी गईं थी.
मैंने कभी उसे ऐसी नजरो से देखा नहीं था. फिर भी मेरी बेवकूफी का मुझे ऐसा सिला मिला था.
मेरी एक कमी थी. खुद श्याम ने मुझे उसके लिये अवगत कराया था.
" तुम कुछ भी करने से पहले सोचते नहीं हो.". शायद उस की बात में दम था. लेकिन मैं दुनियादारी के मुआमले में बिल्कुल अनजान था. अब सोचू तो भी क्या? मैं कुछ जानता भी नहीं था..
जो भी हो मैं दिनों तक अपने आप को माफ नहीं कर पाया था.
क्या करुं? क्या नहीं करुं? वह समझ नहीं पा रहा था.
दिव्येश की बातों ने मेरी परेशानी मे इजाफा किया था.
एस एस सी का साल था. और मैं काफ़ी परेशान था.
उस दौरान मेरा निशा से सामना हुआ था.
उस के व्यवहार ने मुझे चौंका दिया था.
वापस लौटने के बाद मेरी हालत काफ़ी नाजुक हो गई थी. मैं उस वक़्त बीमार हो गया था. एक महिने तक मैं स्कूल जा नहीं पाया था.
उस वक़्त मेरी आँखों के सामने बडे भाई के अंत समय के सारे दृश्य नजर आ रहे थे. मुझे भी अपनी मौत हो जाने का भय सताता रहा था.
उस वक़्त मैं अनन्या को याद कर रहा था. मैं चाहता था. वह मुझे मिलने आये. लेकिन उस ने ऐसा कुछ नहीं किया था. निशा की बात ने मेरे जख्मो पर नमक छिड़का था
" अब वह पराई अमानत है. उस की उम्मीद छोड़ दो. "
मुझे तो उस वक़्त भी सच्चाई का पता नहीं था.
उस वक़्त मुझे एक ही सवाल तंग कर रहा था.
" क्या एक बार किसी को बहन मानकर उस से शादी हो सकती हैं? "
मेरे हिसाब से यह गलत था. लेकिन आगे जाकर मेरे सामने एक नग्न सच्चाई आई थी.
दुनिया मे ज्यादातर प्रेम की शुरुआत भाई बहन के रिश्ते से होती हैं.
एक जाने माने और परिचित लेखक ने अपनी एक उपन्यास के जरिये इस बात का समर्थन भी दिया था.
और सुहानी और अनिश के प्यार ने भी ईस बात को सही मानने के लिये मुझे विवश किया था.
मेरी सासु मा को असलियत का पता लग गया था. उन्हों ने अपनी बेटी को रोकने लिये सूचन किया था
कहते हैं धनवान बनने के लिये भी एक सपना होना जरूरी होता हैं. अगर सपना हो तो उस को साकार करने की लगन पैदा होती हैं, उसे पाने के लिये कड़ी मेहनत करने का मन होता हैं. मैंने कभी ज्यादा पैसा कमाने का ऐसा सपना नहीं देखा था. यही मेरी नाकामी का बहुत बड़ा राज था. इसी वजह से मेरे साथ जो दोस्त, रिश्तेदार और परिचित लोग थे वह मुझ से आगे निकल गये थे.
मैं पढ़ने में कमजोर था. फिर भी हर साल पास होता जाता था. यही बात मुझे आगे बढने कई शक्ति प्रदान करती थी. मैं कभी फैल नहीं हुआ था, यही मेरे लिये सब से बडी ईश्वर की देन थी..
सब से मुश्किल परीक्षा में जिंदगी में मैं पहली बार सेकंड क्लास में पास हुआ था. उस के पीछे किसी की प्रेरणा काम कर गई थी. मैं कभी स्कोलर नहीं था. लेकिन ना जाने क्यों मेरे दोस्त की बहन पूजा मेरी गिनती स्कोलर में करती थी , मेरा मान बढ़ाती जिस की बदौलत सचमुच मुझे कोलेज के दूसरे साल - इंटर आर्ट्स परीक्षा में सेकंड क्लास प्राप्त हुआ था.
यह बात मुझे बारबार याद आती थी.
मेरा दोस्त अनुराग भी सेकंड क्लास में उत्तीर्ण हुआ था.
लेकिन मेरा दूसरा दोस्त मनिष और पूजा का भाई रॉयल क्लास में पास हुआ था. उस का उसे बड़ा अफ़सोस हुआ था. वह मेरी उपलब्धि झेल नहीं पाया था.
सीनियर बी ए में मैं पहली बार मैं फेईल हुआ था. उस के लिये मैं खुद जिम्मेदार था. ललिता पवार की अघटित टकोर ने मुझे तकलीफ पहुंचाई थी, जिस ने मुझे अस्वस्थ कर दिया था. और मैं बीच पेपर अधूरा छोड़कर घर आ गया था, जो मेरा आखिरी पेपर था.
फिर अक्टूबर में मैंने दोबारा परीक्षा दी थी और मैं पास हो गया था. फिर मैंने अन्य दोस्तों के साथ लो कोलेज में दाखला लिया था. पहले साल मैं पास भी हो गया था.
बाद में मेरी शादी हो गई थी.. एक बच्चे का बाप भी बन गया था. उस समय मुझे काम करना जरूरी था. और किसी परिचित व्यकित की सिफारिश से मुझे काम मिल गया था.
डेढ़ साल बाद सुजाता ने एक लड़को को जन्म दिया था.
0000000 ( क्रमश)
जमाना बदल रहा था.
रोजाना नये नये उपकरण, साधनों की खोज हो रही थी. रेडियो, टेप रेकोर्डर, सी डी प्ले, टी वी, मोबाईल और ना जाने कितने प्रसारण माध्यम का संसोधन होता आया है.
रोज नया कुछ होता रहता हैं . वह अच्छा हैं. वह प्रगति का अंदेशा देती है. लेकिन उस के दुरूपयोग से कई दुषणो ने जन्म लिया हैं. यह किसी को भी जानने, समझने की पड़ी नहीं हैं.
सब से ऊपर मोबाइल के आगमन से बहुत कुछ बदल गया हैं.
उस के आने से लोगो बहुत फायदा हुआ हैं. जिंदगी आसान हो गई हैं . कुरियर सेवा की जरुरत नहीं बची. जो चीज पहुंचाने में वक़्त लगता था वह सब कुछ मिनिटो में वॉट्सअप या मेल आई डी के जरिये जरूरत मंद लोगो क़ो फ़ौरन कम खर्चो में मिल जाता हैं.
मोबाईल ने लोगो की सारी मुश्किलें हल कर दी हैं. उस ने समय और पैसा भी बचाया हैं . शादी या पार्टी की निमंत्रण पत्रिका छपवाने का खर्चा भी बचा लिया हैं.
मोबाईल मानो सर्वगुण संपन्न हो गया हैं. हर क़ोई काम उस से आसानी से किया जा सकता हैं ..
देशी विदेशी कॉल का खर्चा भी करना नहीं पड़ता हैं.
बड़ी आसानी से देश विदेश में मित्रो, रिश्तेदार और ब्योपारी से मिलने का, बात करने का और धंधा करने का आसान से आसान साधन संपन्न हो गया हैं .