यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई Ramesh Desai द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                     :  प्रकरण - 21 :

सोमवार को मुझे मैनेजमेंट का सामना करना था. उस के लिये मैं तैयार था. मेरा कोई दोष नहीं था. राजहंस क़ी खुद क़ी बातों ने मुझे उस के खिलाफ उकसाने के लिये विवश किया था.

ओफिस में पैर रखते ही प्यून ने मुझे बताया था.

" बड़े साहब ने आप को बुलाया हैं!

और मैं पानी पीकर उन क़ी केबिन तक गया था. दरवाजा खोलकर पूछा था :

" May I come in sir? "

" प्लीझ! कम!! "

और मैं दरवाजा खोलकर केबिन में दाखिल हुआ था. वहाँ मालिक और मैनेजर दोनों बैठे थे.

उन्होंने मुझे खुर्शी पर बैठने का इशारा किया था.

और मैं उन के सामने खुर्शी में बैठ गया था.

मैनेजर ने बात क़ी शुरुआत क़ी थी.

" राज हंस से तुम्हे क्या प्रोब्लेम हैं? क्यों उसे सहयोग नहीं देते? "

" इस सवाल खड़ा करने के बाद जवाब के लिये उसे यहाँ हाजिर रहना था. वह कहाँ हैं? "

" वह बीमार हैं! वह आज नहीं आयेंगा! "

" बीमार तो मुझे होना था, उसे यकायक क्या हो गया? "

" उस का कहना हैं. उस ने तुम्हारी कोई कहानी छापने से मना कर दिया तो आप उस से टेढ़े चल रहे हो. "

" साब! इस बात में कोई दम नहीं हैं.. मैंने आज तक कितनी कहानिया लिखी हैं, बहुत छपी हैं कुछ अस्वीकृत हुई हैं. मैंने उस का कभी बुरा नहीं माना हैं और कोई गलत प्रतिभाव नहीं दिया."

" कल ही उस क़ी अस्वीकृत कहानी मुंबई के नंबर वन दैनिक पेपर क़ी साप्ताहिक पूर्ति में छपी हैं. "

" आप को शायद पता भी नहीं होगा. वह आप का मुलाझिम हैं आप से पगार लेता है और हरीफ न्यूज पेपर और सामायिक के लिये दूसरे नाम से काम करता हैं और दुगुना कमाता हैं. "

" हमने भी उस के बारे में ऐसा कुछ सुना हैं. लेकिन ऊस के कुष्ट रोग क़ी वज़ह से हमें ऊस पर दया आ रही थी तो चूप बैठे रहे हैं . हम उसे जोब से बाहर कर नहीं पाये हैं. "

" सर! आप जानते हैं यह बीमारी कैसे उसे लग गई हैं? " बहुतेक यह बीमारी नजदीकी रिश्तों के बीच शारीरिक रिश्ता होने क़ी वजह से होती हैं. "

" नहीं हमने ऊस के बारे में कभी सोचा नहीं हैं. "

" यह उन के खुद के दुष्कर्म का नतीजा हैं. ऊस ने अपनी छोटी बहन के साथ अनुचित व्यवहार किया था. ऊस का यौन शोषण किया था. मैंने अपनी कहानी में इस बात का जिक्र किया था.. उसी वजह से ऊस ने मेरी कहानी साभार परत किया था..

उस पर उन्होंने कहां था.

" हमने यह बात तुम्हारी कहानी में पढ़ी हैं.

मैंने कहीं पढ़ा था, किसी से सुना भी था.

" नजदीकी रिश्तों में शारीरिक संबंध होने से ऐसा हो सकता हैं. यह बात क़ो तुम्हारे जरिये ही जान पाये हैं. "

मै जो कुछ राजहंस के बारे में जानता था. वह उन्हें बता दिया था. और उसे अपने जोब से हाथ धोना पड़ा था.

और मैंने भी ' सुधा पब्लिकेशन' को छोड़ दिया था.

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उस वक़्त मुझे याद आया था.

एक लड़का सुहानी को देखने आया था. उस का नाम आशुतोष था.

उस वक़्त मेरी साली तृषाली वहाँ मौजूद थी.

जो रंग रूप और दिखने में सुहानी से ज्यादा आकर्षक और सुंदर थी. उस का यौवन उभार देखकर लड़का आकर्षित हो गया था. .वह उस को जच गई थी. उस के दिमाग़ में उस से शादी करने का ख्याल जगा था..

लेकिन यह संभावित नहीं था.

क्यों की तृषाली अभी पंद्रह साल की भी नहीं हुई थी. उस के पहले और सुहानी के बाद मेरी एक ओर साली थी, शुभांगी की पहले शादी होनी थी.

उस ने तृषाली का ख्याल अपने दिमाग़ से निकाल दिया था. और सुहानी से शादी कर ली थी.

मैंने वादे के मुताबिक आशुतोष को अपना छोटा भाई कबूल कर लिया था.

शादी को दो साल बीत गये थे. लेकिन सुहानी की कोख सुनी की सुनी रह गई थी . उसे मा बनने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था. यह बात घर में सब को खटक रही थी.

उस की सासु मा परिवार के वारिस को तरस रही थी. लेकिन उन की मुराद पूरी नहीं हुई थी. वारिस के लिये सासु मा ने जो कुछ हो सकता था, वह सब कुछ किया था. ज्योतिषी की राय ली थी..

और उस के जवाब से घर में भूकंप सा छा गया था.

उस के नसीब में एक संतान का सुख लिखा था, जिस का मैंने ललिता पवार और पुष्पा बहन के कहने पर निकाल कर के बड़ा अपराध किया था.

सच्चाई जानने के बाद सासु मा, देवर, देवरानी और ननद सब का व्यवहार बदल गया था. सुहानी सौतेली बहू बनकर रह गई थी.

मैं सब कुछ जानता था.

" सुहानी उस के प्रथम प्रेमी संजय की पार्टी में होटल गई थी. वहाँ उस के अलावा अनिश, हसमुख और उस की बीवी सब मौजूद थे. रात भर पार्टी चली थी, शराब की बोटल्स खुली थी. सुहानी को भी कोल्ड ड्रिंक मैं शराब मिलाकर पिलाई गईं थी,  जिस से वह बेहोश हो गई थी. लेकिन बाद में क्या हुआ था?

किसी को उस की जानकारी नहीं थी.

सुबह में सुहानी को होंश आया तो? उस के शरीर पर क़ोई भी कपडा नहीं था और बाजू में अनिश नग्न हालत में सोया हुआ था. जिस से उस ने मान लिया था की अनिश ने ही उस की यह हालत की हैं .

लेकिन बात अलग थी. पार्टी में सभी लोग थे. सुहानी के भूत पूर्व प्रेमी, हसमुख और अनिश.. उन तीन लोगो ने ऐसी हरकत की थी और उस का दोष अनिश पर मढ लिया था. 

और अगले महिने मंथली साइकल बंद होने पर उस बात का समर्थन भी मिल गया था.

वह प्रेग्नेंट थी.

उस ने मुझ साफ शब्दो में कबूल किया था.

" अनिश ही इस के लिये जिम्मेदार हैं.

पानी बहुत बह गया था.

और बड़ी मा ने मुझे यह खबर सुनाई थी.

उस की इज्जत बचानी थी..

उस के लिये उस का गर्भ गिराना अति आवश्यक था

बड़ी मा ने उस को मुसीबत से छुटकारा दिलाने की जिम्मेदारी मुझे सोंपी थी. और मैं उसे अपने घर ले आया था. उस का क्यूरिटीन करवाया था और उस की इज्जत बचाई थी.

बाद में वह कभी मा बन नहीं पाई थी.

लोग उसे वाँझ होने का ताने मारते थे.

उस की सासु मा भी उस के सामने ही बेटे आशुतोष की दूसरी शादी करने में व्यस्त हो गई थी.

इतना ही नहीं दूसरे बेटे की शादी हो गई थी. और उस की बहु बड़ा दहेज लेकर आई थी. और एक साल में उस ने वारिस का उपहार भी दिया था. ईस हालत में उस का मान मरतबा बढ़ गया था और सुहानी की हालत कोड़ी से भी बदतर हो गई थी.

फिर भी उसे मेरा एक सहारा था. वह मुझे राखी बांधती थी. भाऊ बीज को सह परिवार घर बुलाती थी.

दिवाली का दिन था. सुहानी आशुतोष को लेकर एक दिन पहले हमें नए साल की बधाई देने आई थी. जो हमारी आख़री मुलाक़ात साबित हुई थी. जाते जाते वह मुझे भाऊ बीज का निमंत्रण देकर गई थी.

वह शारीरिक और मानसिक रूप से बिल्कुल खत्म हो गई थी. उस का शरीर हाडपिंजर, कंकाल बनकर रह गया था. उस की एक एक हड़िया गिनी जा सकती थी. फिर भी उस की सासु मा ने उसे टॉर्चर करने में क़ोई कसर बाकी छोड़ी नहीं थी.

नए साल के दिन सासु मा ने उसे पड़ोस के घर में पानी लेने को भेजा था. उसे देखकर पडोसी ने उसे ताना मारते हुए कहां था.

" दिवाली जैसे शुभ मौके पर हम किसी वाँझ की सूरत नहीं देखते!! "

यह बात वह सह नहीं पाई थी. पूरा दिन उस ने ज्यो त्यों बिता दिया था.

और फिर रात में?

वह यकायक गायब हो गई थी.

सासु मा ने उसे ढूंढने का प्रयास भी नहीं किया था.

उस वक़्त सिक्योरिटी ओफिसर ने आकर बताया था.

" कुए में किसी की लाश तैर रही है. 

रात को तीन बजे फोन कर के सुहानी की ननद ने मुझे खबर दी थी

हम लोग तुरंत उस के घर जाने के लिये निकल पड़े थे. मैंने सुहानी को अपनी बहन माना था. इस लिये पिताजी भी साथ आने को तैयार हो गये थे. लेकिन उम्र का लिहाज कर के मैंने उन्हें मना किया था. और समजाया था.

" शौक समारोह में आइयेगा. "

और वह मान गये थे.

रात का समय था. जगह जगह अंधेरा छाया हुआ था. उस स्थिति में हमें पहुंचने काफी दिक्कत हो रही थी. आशुतोष उस वक़्त बाहर गांव में था. उसे खबर दी गई थी. लेकिन वह पहुंच नहीं पाया था.

मैं शौकातुर था . सुहानी के मौत से मुझे और सुजाता को बड़ा दुख हुआ था.

उस की सासु के चेहरे पर क़ोई विषाद क़ी कोई झलक नहीं दिख रही थी.

सारे परिचित, दोस्त और रिश्तेदार जमा हो गये थे.. अड़ोस पड़ोस के लोग सुहानी की ननामी तैयार कर रहे थे.. यह देखकर मैंने उन्हें मदद की थी.

ननामी तैयार हो गई थी.

भीतर से महिलाओ के रोने की आवाज सुनाई दे रही था. उस समय मुझे सुहानी की बातें मेरे कानो में दस्तक दे रही थी :

" बड़ी दीदी! लोग कुछ भी कहे लेकिन मेरे जीजू मेरे लिये एक बड़े भाई से बढ़कर है. उन्हों ने मुझे ढेर सारा प्यार दिया है मेरे लिये बहुत कुछ किया है. यही मेरी सब से बड़ी संपत्ति है.. जो मैं अपने साथ ले जाउंगी. "

और उस की यह बात सच साबित हुई थी.

उस के लिये मैं बार बार एक गीत गुनगुनाता था:

" बहना ओ बहना तेरी डोली मैं सजाऊंगा. "

और ईश्वर ने मुझे उस की अर्थी उठाने की जिम्मेदारी सोंपी थी.

                          000000000 ( क्रमशः )