पहचान मजीठा का नौजवान - अध्याय 5 surinder Kumar Gupta द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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पहचान मजीठा का नौजवान - अध्याय 5

### पहचान

### सीज़न 1 — अध्याय 5

### एक सैनिक का संकल्प

अमृतसर के शरणार्थी शिविर में बिताए गए दिन सरदार जोगिंदर सिंह के जीवन की सबसे कठिन यादों में शामिल थे। पंद्रह वर्ष की उम्र में उसने वह सब देख लिया था, जिसे देखने के लिए किसी भी बच्चे को मजबूर नहीं होना चाहिए। अपना घर छूट गया था, परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई थी और जिन रिश्तों पर सबसे अधिक भरोसा था, उन्हीं में से एक ने निराश कर दिया था।स लेकिन जोगिंदर ने अपनी परिस्थितियों को अपनी नियति मानने से इनकार कर दिया था।

वह अक्सर अपने पिता की बात याद करता—

“बेटा, मुश्किल समय में इंसान की असली पहचान उसके फैसलों से होती है। हालात तुम्हें गिरा सकते हैं, लेकिन उठना तुम्हारे अपने हाथ में है।”

इन शब्दों ने उसके मन में गहरी जगह बना ली थी।

वह जानता था कि परिवार को स्थायी सहारा देने के लिए उसे कोई ऐसा रास्ता चुनना होगा, जिससे नियमित आमदनी हो और भविष्य में आगे बढ़ने के अवसर भी मिलें।

इसी तलाश में उसकी नज़र भारतीय सेना में भर्ती होने के अवसर पर पड़ी।

सेना में नौकरी उसके लिए केवल रोजगार नहीं थी। उसमें उसे अनुशासन, आत्मसम्मान और अपने परिवार को सुरक्षित जीवन देने की संभावना दिखाई देती थी।

उसने मन ही मन निर्णय कर लिया।

वह सैनिक बनेगा।

सेना में भर्ती होने का निर्णय लेना आसान था, लेकिन उसके लिए स्वयं को तैयार करना कठिन।

जोगिंदर की उम्र कम थी। उसे भर्ती के लिए निर्धारित आयु, शारीरिक क्षमता और शैक्षणिक योग्यताओं को पूरा करना था। उसने उपलब्ध जानकारी जुटाई और अपनी तैयारी में लग गया।

सुबह जल्दी उठना, दौड़ लगाना और शरीर को मजबूत बनाना उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। जब दूसरे नौजवान खाली समय में मनोरंजन करते, वह अपनी तैयारी के बारे में सोचता रहता।

उसकी माँ कभी-कभी उसे देखकर चिंतित हो जातीं।

“जोगिंदर, अपने शरीर का भी ध्यान रखा कर। दिनभर मेहनत करता है, फिर सुबह उठकर दौड़ने चला जाता है।”

वह मुस्कराकर जवाब देता, “माँ, कुछ साल मेहनत कर लूँगा तो हमारा घर संभल जाएगा।”

माँ उसके सिर पर हाथ फेरतीं।

“भगवान करे, तेरी मेहनत सफल हो।”

उसके पिता इस निर्णय से प्रसन्न थे। उन्हें लगता था कि उनका बेटा अपने जीवन को सही दिशा में ले जा रहा है। फिर भी वे उसे एक बात बार-बार समझाते।

“सैनिक बनना केवल वर्दी पहनना नहीं है। यह जिम्मेदारी है। अनुशासन के साथ ईमानदारी भी जरूरी है।”

जोगिंदर हर बार गंभीरता से उनकी बात सुनता।

उसके मन में एक स्पष्ट लक्ष्य था—वह ऐसा जीवन बनाएगा, जिसमें उसके परिवार को किसी के सामने विवश न होना पड़े।

समय के साथ जोगिंदर की तैयारी आगे बढ़ी। जब वह भर्ती के लिए निर्धारित योग्यताओं को पूरा करने की स्थिति में पहुँचा, तो उसने आवेदन किया और चयन प्रक्रिया में भाग लिया।

प्रतीक्षा के वे दिन उसके लिए बहुत लंबे थे।

वह जानता था कि चयन हो गया तो उसके जीवन की दिशा बदल सकती है। लेकिन अगर असफल रहा, तो उसे फिर से कोई दूसरा रास्ता तलाशना होगा।

एक दिन उसे अच्छी खबर मिली।

उसका भारतीय सेना में चयन हो गया था।

जब उसने घर आकर अपने पिता को यह समाचार सुनाया, तो कुछ क्षणों के लिए घर में सन्नाटा छा गया। फिर पिता ने उसे गले लगा लिया।

“शाबाश, बेटा! आज तूने साबित कर दिया कि कठिनाइयाँ इंसान की हिम्मत नहीं छीन सकतीं।”

माँ की आँखों में आँसू थे। लेकिन इस बार वे दुख के नहीं, खुशी के आँसू थे।

जोगिंदर ने उनके चरण छुए।

“माँ, अब आप चिंता मत करना। मैं अपनी पूरी मेहनत करूँगा।”

उस दिन उसे पहली बार लगा कि जीवन ने उसके लिए एक नया दरवाज़ा खोला है।

वह दरवाज़ा, जिसके पीछे संघर्ष तो था, लेकिन साथ ही आगे बढ़ने की संभावना भी थी।

सेना में जोगिंदर को जल्द ही समझ आ गया कि केवल शारीरिक ताकत से काम नहीं चलता। एक सैनिक को आदेशों का पालन करना, समय की कीमत समझना और कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना भी सीखना पड़ता है।

शुरुआत में उसे कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। घर से दूर रहना, कठोर दिनचर्या और वरिष्ठ अधिकारियों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना आसान नहीं था।

लेकिन वह पीछे हटने वालों में से नहीं था।

वह अपने काम को गंभीरता से लेता। समय पर ड्यूटी करता, अपने वरिष्ठों से सीखता और अपने साथियों की सहायता के लिए तैयार रहता।

उसकी मेहनत धीरे-धीरे लोगों की नज़र में आने लगी।

उसे यह भी महसूस हुआ कि उसकी शिक्षा अधूरी रहने से भविष्य में आगे बढ़ने के अवसर सीमित हो सकते हैं। इसलिए उसने अपनी पढ़ाई पूरी करने का निश्चय किया।

दिनभर की ड्यूटी के बाद जब दूसरे सैनिक आराम करते, जोगिंदर किताबें खोलकर बैठ जाता। थकान के कारण कभी-कभी उसकी आँखें बंद होने लगतीं, लेकिन वह फिर पानी पीकर पढ़ने लगता।

एक साथी ने एक दिन उससे पूछा, “जोगिंदर, इतनी मेहनत क्यों करता है? नौकरी तो मिल ही गई है।”

जोगिंदर ने पुस्तक से नज़र उठाई।

“नौकरी मिलना मंज़िल नहीं है, भाई। मैं चाहता हूँ कि आगे बढ़ने का मौका मिले तो केवल पढ़ाई की कमी के कारण पीछे न रह जाऊँ।”

साथी हँस पड़ा।

“तू तो बड़ा दूर तक सोचता है!”

जोगिंदर भी मुस्करा दिया।

“जिन्होंने अपना घर खोया हो, वे भविष्य के बारे में थोड़ा ज्यादा सोचते हैं।”

उसके इस उत्तर में उसके जीवन का पूरा अनुभव छिपा था।

कई वर्षों की मेहनत और अनुशासन के बाद जोगिंदर ने अपनी मैट्रिक की पढ़ाई पूरी कर ली। यह उपलब्धि उसके लिए केवल एक शैक्षणिक प्रमाणपत्र नहीं थी। यह इस बात का प्रमाण थी कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, इच्छाशक्ति के सहारे अधूरे काम पूरे किए जा सकते हैं।

सेना में भी उसकी जिम्मेदारियाँ बढ़ने लगीं।

वह अपने काम में ईमानदार था और अनुशासन के मामले में किसी तरह की लापरवाही पसंद नहीं करता था। उसके वरिष्ठ अधिकारियों ने उसकी मेहनत और जिम्मेदारी निभाने की क्षमता को पहचाना।

आखिरकार, वह पदोन्नति पाकर हवलदार बन गया।

जिस युवक ने कभी शरणार्थी शिविर में खड़े होकर परिवार के भविष्य की चिंता की थी, वह अब अपनी मेहनत के बल पर एक सम्मानजनक स्थान तक पहुँच चुका था।

जब यह समाचार घर पहुँचा, तो उसके पिता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

“मुझे पता था कि मेरा बेटा एक दिन अपने पैरों पर खड़ा होगा,” उन्होंने गर्व से कहा।

जोगिंदर ने उत्तर दिया, “बाबाजी, अभी बहुत कुछ करना बाकी है।”

उसकी नज़र में सफलता का अर्थ केवल अपनी तरक्की नहीं था। वह चाहता था कि उसका परिवार स्थिर हो, उसकी माँ को किसी तरह की चिंता न रहे और भविष्य में उसके बच्चों को विस्थापन तथा असुरक्षा का सामना न करना पड़े।

उसे लगता था कि जीवन अब धीरे-धीरे पटरी पर लौट रहा है।

लेकिन जिंदगी का एक नियम वह अभी तक पूरी तरह नहीं समझ पाया था।

इंसान अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए कितनी भी मेहनत कर ले, अतीत की कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जो सही समय आने पर फिर सामने खड़ी हो जाती हैं।

रावलपिंडी में उसका भाई दर्शन अब दिशावर बन चुका था। उधर भारत में जोगिंदर ने अपनी पहचान मेहनत और अनुशासन से बनाई थी।

दोनों भाइयों के रास्ते अलग हो चुके थे।

फिर भी उनके परिवारों की कहानी का एक अध्याय अभी बाकी था।

जोगिंदर के जीवन में अब विवाह का समय आने वाला था। परिवार को उम्मीद थी कि उसके जीवन में एक ऐसा साथी आएगा, जिसके साथ वह अपने संघर्षों के बाद सुखी संसार बसा सकेगा।

उसे नहीं मालूम था कि आने वाले वर्षों में उसकी पत्नी जसबीर कौर और उनका बेटा कुलवंत सिंह ऐसी त्रासदी से गुजरेंगे, जो इस परिवार की अगली पीढ़ी की दिशा बदल देगी।

क्रमशः…