अध्याय 5: उम्मीदों का सफर और एक अनकहा डर
गाँव की वो धूल भरी पगडंडी आज बहुत लंबी लग रही थी। बस स्टैंड की तरफ बढ़ते मेरे हर कदम के साथ पीछे छूट रहा था मेरा बचपन, मेरी गली और वो चेहरा जिसे मैं तीसरी क्लास से देखता आ रहा था।
मेरे हाथ अभी भी थोड़े काँप रहे थे। कुछ ही देर पहले मैंने उसे वो अंगूठी थमाई थी। जब उसने पूछा था, मैं क्या करूँ इसका? तो मेरे पास बहुत लंबी बातें करने का वक्त नहीं था। मैंने बस इतना ही कहा, इसे पहन लेना, और भारी मन से मुड़ गया।
जब मैं बस में बैठा, तो मेरे पास दो चीजें थीं - एक शहर जाकर काम करने का जज्बा और दूसरा, दिल में बैठा वो गहरा डर। बस की खिड़की से बाहर देखते हुए मैं सिर्फ एक ही बात सोच रहा था, क्या वो अंगूठी पहन लेगी? क्या मेरा यह इंतजार कभी खत्म होगा?
मैं गाँव से दूर तो जा रहा था, लेकिन मेरा मन उसी अंगूठी के इर्द-गिर्द घूम रहा था। शहर की ऊँची इमारतों और काम की तलाश में भटकते हुए भी, मेरे कान बस फोन की उस एक घंटी का इंतजार कर रहे थे।
अध्याय 6: तीन महीने और वो एक पैगाम
शहर की भीड़ में तीन महीने बीत चुके थे। दिन काम की मशक्कत में कट जाता, लेकिन शामें बहुत भारी होती थीं। मैं अक्सर डूबते सूरज को देखते हुए अपनी अधूरी मोहब्बत के बारे में सोचता।
फिर एक शाम, जब मैं थका-हारा बैठा था, अचानक फोन की लाइट जली। एक नया मैसेज था। उसे देखते ही मेरी धड़कनें रुक सी गईं। पूरे 90 दिनों के सन्नाटे के बाद उसका पैगाम आया था।
उसमें बस इतना लिखा था: मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ।
वो छोटा सा मैसेज मेरे लिए किसी मसीहा से कम नहीं था। उस एक लाइन को पढ़कर मेरे सीने में खुशी की एक ऐसी लहर दौड़ी कि पिछले तीन महीनों का सारा दर्द मिट गया।
अध्याय 7: दिवाली का वादा और वो इकरार
उस शाम फोन की स्क्रीन पर चमकते उन शब्दों ने मेरी दुनिया ही बदल दी। उसने लिखा था - मैं तुमसे प्यार करती हूँ।
इन चंद अल्फाजों को पढ़ने के बाद मेरे दिल में खुशी की ऐसी लहर दौड़ी कि मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था। जिस लड़की को मैंने तीसरी क्लास से चाहा, जिसके लिए मैं गाँव-घर छोड़ कर परदेस में मेहनत कर रहा था, आज उसने मेरे प्यार को कुबूल कर लिया था। उस वक्त शहर का शोर मुझे संगीत जैसा लगने लगा और काम की सारी थकान जैसे हवा में उड़ गई। मैं अकेला ही मुस्कुरा रहा था, जैसे मुझे कोई बड़ी दौलत मिल गई हो।
फिर उसका अगला पैगाम आया - तुम्हें इस दिवाली घर आना है, मुझे तुमसे मिलना है।
दिवाली... खुशियों और उजालों का त्यौहार। मुझे लगा कि इस बार की दिवाली मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा उजाला लेकर आएगी। मैंने बिना एक पल सोचे उसे जवाब दिया - ठीक है, मैं जरूर आऊँगा।
वो दिन मेरे लिए किसी सपने जैसा था। मैंने कैलेंडर पर दिवाली की तारीख को घेर लिया और दिनों को गिनना शुरू कर दिया। मेरे मन में बस एक ही तस्वीर थी - गाँव की उन्हीं पगडंडियों पर दोबारा चलूँगा और इस बार वो अंगूठी उसके हाथ में एक अधिकार के साथ होगी। मुझे अंदाजा भी नहीं था कि ये दिवाली मेरी जिंदगी में खुशियाँ नहीं, बल्कि एक ऐसा मोड़ लेकर आने वाली है जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
अध्याय 8: मेले की भीड़ और वो अधूरी मुलाकात
दिवाली का वक्त था, गाँव घर दीयों से सजे थे, पर मेरा दिल उस मुलाकात की रोशनी के इंतजार में था। उसने मुझे गाँव से 16 किलोमीटर दूर लगने वाले उस बड़े मेले में बुलाया था। शहर से लौटते वक्त मेरे मन में जो उत्साह था, वह अब घबराहट में बदल रहा था।
मैं वहाँ पहुँचा। चारों तरफ शोर था, मिठाइयों की महक थी, और लोगों का हुजूम... लेकिन मेरी आँखें सिर्फ उसे ढूँढ रही थीं। मैंने उन रास्तों पर न जाने कितने चक्कर लगाए, हर उस चेहरे को गौर से देखा जो उसकी तरह लग रहा था। भीड़ में धक्का खाते हुए भी मेरा सारा ध्यान बस फोन की घंटी और उसकी एक झलक पर था।
मैंने 16 किलोमीटर का सफर सिर्फ इसलिए तय किया था ताकि उन आँखों को देख सकूँ जिन्होंने तीन महीने पहले फोन पर प्यार का इकरार किया था। पर किस्मत का खेल देखिए, उस दिन हमारी मुलाकात न हो सकी। वह मेला, जो दूसरों के लिए खुशियों का जरिया था, मेरे लिए एक अंतहीन इंतजार बन गया। मैं घंटों वहीं खड़ा रहा, इस उम्मीद में कि शायद अभी वह कहीं से सामने आ जाएगी, शायद अभी वह मुझे पुकारेगी। पर जैसे-जैसे सूरज ढलने लगा, मेरी उम्मीदें भी ढलने लगीं। वह शाम मुझे एहसास करा गई कि फासले सिर्फ शहरों के बीच नहीं होते, कभी-कभी पास होकर भी हम अपनों से नहीं मिल पाते।
अध्याय 9