थ्योरी ऑफ वन शू: रात, रिस्क और स्प्लेंडर - 1 Shivam Dhuriya द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

थ्योरी ऑफ वन शू: रात, रिस्क और स्प्लेंडर - 1

Chapter 1: द अनप्लांड यू-टर्न

घड़ी में रात के ठीक पौने बारह बज रहे थे। कमरे में पंखा पूरी रफ्तार से खर्राटे भर रहा था और सामने खुली पड़ी 'रियल एनालिसिस' और 'ऑर्गेनिक केमिस्ट्री' की किताबों पर नींद की भारी परत जम चुकी थी। तभी दिनेश ने किताब पर जोर से थपकी मारी और उठ खड़ा हुआ।

"अबे यार, अब अगर इस बेंजीन रिंग को एक सेकंड भी और देखा, तो सुबह मेरा दिमाग उल्टी कर देगा। चलो, थोड़ी ताजी हवा खा के आते हैं।"

शिव ने भी बिना देर किए टेबल से स्प्लेंडर की चाबी उठाई और उंगली पर घुमाते हुए बोला, "डन है। वैसे भी रात के सन्नाटे में बाइक दौड़ाने का अपना अलग ही सुकून है।"

पीछे कोने में बैठा शैलेंद्र, जो पहले से ही रजाई में आधा समा चुका था, चौंककर बोला, "अबे पागल हो गए हो क्या? बाहर ठंड जैसी हवा चल रही है, ऊपर से कल सुबह आठ बजे प्रैक्टिकल है।"

"तू प्रैक्टिकल में ही वाइवा देता रह जाएगा मेरे भाई, चल उठ!" दिनेश ने उसका हाथ पकड़कर लगभग खींचते हुए खड़ा कर दिया।

दस मिनट बाद, खाली सड़कों पर स्प्लेंडर सरपट दौड़ रही थी। शिव हैंडल संभाले पायलट बना हुआ था, बीच में शैलेंद्र दोनों के बीच सैंडविच की तरह फंसा था, और सबसे पीछे बैठा दिनेश हवा में हाथ फैलाए मजे ले रहा था।

शहर की मेन रोड से जैसे ही बाइक एक चौराहे पर धीमी हुई, दिनेश के खुराफाती दिमाग में एक चिंगारी चमकी। उसने आगे झुककर शिव के कंधे पर धौल जमाई, "सुन शिव... गाड़ी सीधे मत ले। बाएं मोड़।"

"बाएं? बाएं किधर?" शिव ने मासूम बनते हुए पूछा, हालांकि दिल की धड़कन पहले ही तेज हो गई थी।

"अरे वही... भाभी की गली! सीधे भाभी के घर के सामने ले। आज तो भाभी के दर्शन करा दे मेरे भाई, फिर सीधे हॉस्टल लौटेंगे।"

दिनेश के मुंह से 'भाभी की गली' सुनते ही बीच में बैठे शैलेंद्र की आत्मा जैसे हलक में अटक गई। उसने तुरंत शिव का कंधा कस के पकड़ लिया, "नहीं भाई, बिल्कुल नहीं! कसम है तुझे हमारी दोस्ती की, गाड़ी उधर मत मोड़ना! साढ़े बारह बज रहे हैं। भाभी के ताऊ जी का घर भी उसी नुक्कड़ पर है, जो रिटायर्ड दरोगा हैं। अगर किसी ने देख लिया ना, तो कल कॉलेज में प्रैक्टिकल की जगह हमारी तेरहवीं का खाना बंटेगा!"

दिनेश ने पीछे से शैलेंद्र के सिर पर चपत लगाई, "अबे फट्टू चंद! बीएससी सेकंड ईयर में आ गया है, पर कलेजा चूहे जितना ही रहा तेरा। अरे, रात में सब घोड़े बेचकर सो रहे होते हैं। कोई बाहर नहीं निकलेगा। हम बस चुपचाप एक राउंड मारेंगे, शिव भाभी की बंद खिड़की को एक नजर देखेगा, थोड़ा रोमांटिक अहसास लेगा, और हम कट लेंगे।"

"अरे भाई, खिड़की बंद होगी तो खाक अहसास होगा? क्यों अपनी शामत बुला रहे हो?" शैलेंद्र गिड़गिड़ाया।

शिव ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए दोनों की बहस पर विराम लगाया और स्टाइल से एक्सीलेटर खींचा, "शैलू, चुपचाप बैठ। जब भाभी का मामला हो, तो रिस्क तो बनता है ना!"

बाइक ने कट मारा और सीधे 'भाभी की गली' में दाखिल हो गई। दिन में चहल-पहल से भरी रहने वाली वह संकरी गली इस वक्त कब्रिस्तान जैसी शांत थी। दोनों तरफ की स्ट्रीट लाइटें पीली रोशनी फेंक रही थीं। शिव ने बाइक की स्पीड बिल्कुल धीमी कर दी, ताकि साइलेंसर की आवाज से मोहल्ले में किसी की नींद न टूटे।

"बस... बस, आगे जो दो मंजिला सफेद मकान है ना, वही है भाभी का महल," दिनेश ने फुसफुसाते हुए शिव के कान में लोकेशन कन्फर्म की।

जैसे ही बाइक उस मकान के सामने पहुंची, शिव ने ब्रेक दबाया और तीनों ने अपनी नजरें ऊपर फर्स्ट फ्लोर वाली खिड़की की तरफ उठाईं। खिड़की पर गहरा पर्दा गिरा हुआ था, कोई हलचल नहीं थी।

"देखा? भाभी सो रही हैं आराम से। अब चलो प्लीज, वापस मुड़ो," शैलेंद्र फुसफुसाया, उसकी आवाज कांप रही थी।

"रुक ना बे, एक मिनट भाभी की याद में सांस तो लेने दे..." दिनेश बोला ही था कि अचानक सन्नाटे को चीरती हुई एक भारी, घुरघुराती आवाज आई—

“गुररररर...”

शैलेंद्र का खून जम गया। "शिव... ये आवाज साइलेंसर की तो नहीं लग रही।"

शिव ने धीरे से नजरें नीचे कीं। भाभी के मकान के ठीक सामने वाले चबूतरे के नीचे, अंधेरे में चार नहीं, पूरे पांच आवारा कुत्ते लेटे हुए थे। उनमें से एक काला वाला, जिसका साइज किसी छोटे बछड़े जितना था, धीरे-धीरे उठकर अंगड़ाई ले रहा था। उसकी लाल आंखें सीधे इन तीनों पर टिकी थीं। मानो कह रहा हो—भाभी के मोहल्ले में आशिकी करने आए हो बेटा?

दिनेश ने बहुत धीरे से कहा, "शिव... भाई... धीरे से क्लच छोड़ और निकाल..."

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। घबराहट में शिव से एक्सीलेटर थोड़ा ज्यादा खिंच गया। सन्नाटे में स्प्लेंडर ने ऐसी तेज गुर्राहट मारी कि कुत्तों के सिक्योरिटी सिस्टम का अलार्म बज गया।

अगले ही पल, उस काले कुत्ते ने कान खड़े किए और आसमान की तरफ मुंह करके ऐसा भयानक भौंका कि गली के बाकी चारों शिकारी भी बिजली की रफ्तार से खड़े हो गए।

“भौंक! भौंक! भऊऊऊऊ!”

"अरे बाप रे! भगाओ भाई, भगाओ!" शैलेंद्र की चीख गली के इस छोर से उस छोर तक गूंज गई।

शिव ने तुरंत गियर डालकर भागने की कोशिश की, लेकिन संकरी गली में आनन-फानन में यू-टर्न लेते वक्त बाइक का संतुलन बिगड़ गया और हड़बड़ाहट में इंजन बंद हो गया!

कुत्ते अब सिर्फ भौंक नहीं रहे थे, वो पूरे जबड़े खोले, लार टपकाते हुए चार्ज ले चुके थे और दूरी बमुश्किल पांच कदम रह गई थी।

"अबे छोड़ बाइक! भागो!" दिनेश चिल्लाया।

तीनों ने दुनिया के सारे नियम, शिष्टाचार और बीएससी की डिग्रियां ताक पर रख दीं। शिव ने चलती हालत में ही बाइक को वहीं जमीन पर पटका और तीनों ने जो दौड़ लगाई, वो ओलंपिक के धावकों को भी शर्मिंदा कर दे।

"शैलेंद्र, तेज भाग साले! वो तेरे पैंट की तरफ लपक रहा है!" दिनेश आगे भागते हुए मुड़कर चिल्लाया।

"अबे भाभी के चक्कर में आज मैं रेबीज का इंजेक्शन लगवाऊंगा!" शैलेंद्र रोते हुए हवा में पैर फेंक रहा था। उसका एक जूता फिसलकर वहीं गली में छूट गया, लेकिन पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत यमराज के डर से भी बड़ी थी।

पीछे पांचों शिकारी पूरे जोश में दौड़ा रहे थे। कुत्तों का झुंड ऐसे पीछे पड़ा था जैसे भाभी के घर की चौकीदारी का पूरा ठेका आज यमराज ने उन्हीं को सौंप रखा हो।

तीनों हवा की रफ्तार से गली के मुहाने तक पहुंचे, जहां लोहे का बड़ा गेट लगा था। बिना सोचे-समझे, तीनों ने गेट पर बंदरों की तरह छलांग लगाई और दूसरी तरफ कूदकर धड़ाम से सड़क पर गिरे।

कुत्ते गेट के उस पार आकर ग्रिल से मुंह सटाकर पागलों की तरह भौंकने लगे।

सड़क पर तीनों औंधे मुंह पड़े थे, सांसें ऐसे चल रही थीं जैसे फेफड़े अभी बाहर आ जाएंगे। शैलेंद्र का एक पैर नंगा था, शिव की कोहनी छिल चुकी थी, और दिनेश की टी-शर्ट कहीं से फट गई थी।

लगभग दो मिनट तक सिर्फ हांफने की आवाजें आती रहीं।

फिर शैलेंद्र ने जमीन से सिर उठाया, नंगे पैर को देखा और खून भरी नजरों से शिव और दिनेश की तरफ घूमा, "मिल गए भाभी के दर्शन? आ गया सुकून? भाभी की तो खिड़की भी नहीं खुली, लेकिन मेरी किस्मत का दरवाजा जरूर बंद हो गया आज! अब बाइक कौन लाएगा वहां से?"

शिव ने हांफते-हांफते अपनी फटी हुई जेब से चाबी निकाली, उसे देखा और जोर से हंस पड़ा। उसकी हंसी देखकर दिनेश भी पेट पकड़कर हंसने लगा।

"हंसो मत बे! मेरी बाइक लावारिस पड़ी है भाभी के घर के ठीक सामने," शिव हंसते हुए बोला, "सुबह अगर भाभी के घर वालों ने बाइक देख ली, तो रिश्ता पक्का समझने के बजाय सीधे थाने में एफआईआर कटेगी!"

दिनेश ने उठकर शैलेंद्र के कंधे पर हाथ रखा, "अरे छोड़ ना यार, बाइक तो सुबह ले आएंगे। पर एक बात माननी पड़ेगी शैलू... आज तूने भाभी की गली में जो नंगे पैर स्प्रिंट मारी है ना, उसे देखकर अगर भाभी खिड़की से देख लेतीं, तो शिव को छोड़ सीधे तुझ पर ही फिदा हो जातीं!"

"दफा हो जाओ दोनों और तुम्हारी भाभी भी!" शैलेंद्र ने अपना बचा हुआ दूसरा जूता भी उतारकर दिनेश की तरफ फेंक दिया, और रात के डेढ़ बजे, सूनी सड़क पर तीनों के ठहाके गूंजने लगे।

अभी समस्या खत्म नहीं हुई थी खुली बाइक तो वही पड़ी हुई थी ...

कहानी अभी ज़ारी है ...