गुप्त ख़ज़ाना Shivam Dhuriya द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

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गुप्त ख़ज़ाना

रविवार की वह दोपहर इतनी सुस्त और गर्म थी कि मोहल्ले के आवारा कुत्ते भी पीपल की छांव में गहरी समाधि ले चुके थे। लेकिन कस्बे के पुराने पुल के नीचे बैठे तीन दिमागों में किसी बड़ी तबाही की रूपरेखा तैयार हो रही थी। ये तीन थे—शिव, दिनेश और शैलेंद्र।

शिव का मानना था कि दुनिया में जो भी बोरियत है, वह उसकी निजी बेइज्जती है। दिनेश का दिमाग बिना किसी वजह के हमेशा जुगाड़ और खुराफात के बीच पिसता रहता था, और शैलेंद्र वह शरीफ, हमेशा डर के साए में जीने वाला बलि का बकरा था जिसे हर योजना के अंत में या तो डांट खानी पड़ती थी या फिर सबसे तेज दौड़ना पड़ता था।

"भाई, अगर आज कुछ तूफानी नहीं किया, तो मेरी आत्मा इस दोपहर की धूप में भाप बनकर उड़ जाएगी," शिव ने टूटी हुई दीवार पर पत्थर मारते हुए कहा।

"तूफानी छोड़, यह बता कि जेब में कितने पैसे हैं?" दिनेश ने अपनी खाली जेब झाड़ते हुए पूछा।

कुल जमा पूंजी निकली पैंतालीस रुपये। इतने में न तो कोल्ड ड्रिंक आ सकती थी और न ही कस्बे के मशहूर 'दाऊ के समोसे'।

दाऊ का नाम आते ही तीनों के चेहरों पर एक अजीब सी चमक आ गई। दाऊ यानी कस्बे के सबसे खड़ूस, सबसे सख्त और सबसे ज्यादा तौलिए से पसीना पोंछने वाले हलवाई। उनकी दुकान के समोसे जितने लजीज थे, उनका मिजाज उतना ही कड़वा था। उनका एक ही उसूल था—'न उधार, न प्यार, सिर्फ नकद व्यवहार।' पिछले हफ्ते ही उन्होंने दिनेश को सिर्फ इसलिए दुकान से भगा दिया था क्योंकि उसने पूछ लिया था कि क्या समोसे के साथ चटनी मुफ्त में मिलती है।

"बदला लेने का वक्त आ गया है," दिनेश की आंखों में शैतानी की चिंगारी चमकी।

"कैसा बदला? भाई, उनके हाथ में जो खौलता हुआ करछुल रहता है न, वो सीधा पीठ पर छपता है," शैलेंद्र ने सहमते हुए याद दिलाया।

"अरे डरपोक! हम हिंसा नहीं करेंगे, हम मानसिक खेल खेलेंगे," शिव ने अपनी कॉलर ठीक करते हुए कहा। योजना तय हुई। योजना का कोडनेम रखा गया—'ऑपरेशन गुप्त खजाना'।

दाऊ की दुकान के ठीक पीछे एक पुराना, सूखा कुआं था, जिसके पास पीपल का बड़ा पेड़ था। कस्बे में अफवाह थी कि उस कुएं के आसपास कभी-कभी अजीब आवाजें आती हैं, हालांकि सब जानते थे कि वहां सिर्फ मोहल्ले की बिल्लियां लड़ती थीं। लेकिन अंधविश्वास की जड़ें गहरी होती हैं, और शिव इसी का फायदा उठाने वाला था।

शाम के करीब पांच बजे, जब दाऊ की दुकान पर गरमा-गरम समोसों की पहली खेप कड़ाही में उतरी और खुशबू से पूरा बाजार महकने लगा, तब शैलेंद्र हांफता हुआ दुकान के सामने पहुंचा। उसके चेहरे पर ऐसा स्वाभाविक खौफ था मानो उसने साक्षात यमराज को साइकिल चलाते देख लिया हो।

"दा-दाऊ! गजब हो गया!" शैलेंद्र काउंटर पर हाथ रखकर जोर-जोर से सांस लेने लगा।

दाऊ ने करछुल रोककर घूरा, "क्या है बे? समोसे अभी पके नहीं हैं, और उधार तुझे दूंगा नहीं। भाग यहां से!"

"अरे समोसा किसे चाहिए! आपके पीछे... पीपल वाले कुएं के पास... कोई जमीन खोद रहा था और कह रहा था कि दाऊ की दुकान के नीचे अंग्रेजों के जमाने की सोने की अशर्फियां दबी हैं!" शैलेंद्र ने फुसफुसाते हुए, पूरी दुनिया का राज़ खोलने वाले अंदाज में कहा।

दाऊ के हाथ से करछुल छूटते-छूटते बचा। "क्या बकवास कर रहा है?"

तभी भीड़ में से शिव और दिनेश अनजान बनकर प्रकट हुए। शिव के हाथ में एक पुराना, मिट्टी से सना हुआ पीतल का सिक्का था—जो असल में उसने सुबह ही कबाड़ी वाले से पांच रुपये में खरीदा था।

"अरे शैलेंद्र, तू यहां क्या कर रहा है? देख मुझे क्या मिला!" शिव ने जोर से कहा और सिक्का अपनी हथेली पर चमकाया। "कुएं की दीवार के पास मिट्टी धंस गई थी, वहां ऐसे न जाने कितने सिक्के चमक रहे हैं! दिनेश, चल फावड़ा लाते हैं, आज तो अपनी लॉटरी लग गई!"

दाऊ की आंखें फटी की फटी रह गईं। उनका लालच उनके गुस्से पर भारी पड़ गया। जिस जमीन पर उनकी दुकान थी, वह उनके पुरखों के जमाने की थी। उन्होंने हमेशा सोचा था कि इस बंजर जमीन पर उनके बुजुर्गों ने हलवाई की दुकान क्यों खोली। क्या सच में नीचे कोई खजाना था?

"रुको! ठहरो तुम सब!" दाऊ ने अपनी लुंगी संभाली और काउंटर से बाहर कूद पड़े। "मेरी दुकान के पीछे की जमीन मेरी है! वहां की मिट्टी भी मेरी है और जो गड़ा है वो भी मेरा है! तुम लौंडे वहां से एक कंकड़ भी नहीं उठाओगे!"

"अरे दाऊ, सरकारी जमीन है वो, हम तो खुदाई करेंगे," दिनेश ने आग में घी डाला।

"खबरदार! दुकान बंद कर रहा हूं अभी, देखता हूं कौन हाथ लगाता है," दाऊ ने आव देखा न ताव, गरमा-गरम समोसों की कड़ाही की आंच धीमी की, शटर आधा गिराया और हाथ में एक लोहे की रॉड लेकर कुएं की तरफ दौड़ पड़े।

योजना का दूसरा चरण शुरू हो चुका था।

जैसे ही दाऊ कुएं के पास पहुंचे, वहां सचमुच ताजी खुदी हुई मिट्टी पड़ी थी। शिव ने पहले ही वहां गड्ढा बनाकर उसमें लाल रंग का एक सूखा नारियल और दो अगरबत्तियां गाड़ दी थीं, ताकि मामला थोड़ा तांत्रिक और रहस्यमयी लगे।

दाऊ घुटनों के बल बैठ गए और पागलों की तरह मिट्टी हटाने लगे। "कहां है? कहां है अशर्फी?"

पीछे झाड़ियों में छिपे शिव ने धीरे से आवाज निकाली, "जो छुएगा इस धन को... वो सात जन्मों तक बिना आलू के समोसा खाएगा!"

दाऊ चौंके, इधर-उधर देखा, लेकिन लालच का भूत सवार था। उन्होंने और तेजी से गड्ढा खोदा। तभी उनके हाथ में एक गोल, सख्त चीज आई। उनकी सांसें थम गईं। उन्होंने कांपते हाथों से मिट्टी झाड़ी।

वह कोई सोने का संदूक नहीं था। वह एक पुराना, जंग लगा हुआ लोहे का डिब्बा था। दाऊ ने झटके से ढक्कन खोला।

डिब्बे के अंदर से एक जोर का स्प्रिंग उछला और सीधे दाऊ की नाक पर एक नकली प्लास्टिक का मेंढक चिपक गया! साथ ही डिब्बे के अंदर रखे सूखे गुलाल का एक जोरदार फव्वारा छूटा, जिसने दाऊ के पूरे चेहरे, मूंछों और गंजे सिर को एकदम चटक गुलाबी कर दिया।

"भूत! तांत्रिक! बचाओ!" दाऊ चीखते हुए पीछे गिरे।

उसी वक्त झाड़ियों के पीछे से ठहाकों का ऐसा सैलाब फूटा कि आसपास के कबूतर फड़फड़ा कर उड़ गए। शिव, दिनेश और शैलेंद्र पेट पकड़कर जमीन पर लोटपोट हो रहे थे।

दाऊ को बात समझने में तीन सेकंड लगे। गुलाबी चेहरे के बीच उनकी सफेद आंखें अंगारे की तरह चमकने लगीं। उन्होंने हाथ की रॉड फेंकी और जमीन से एक मजबूत डंडा उठा लिया।

"अरे नालायकों! तुम्हारी यह मजाल! आज तुम्हें इसी कुएं में न गाड़ दिया तो मेरा नाम भी दाऊ नहीं!" दाऊ एक गुलाबी दैत्य की तरह दहाड़ते हुए उनकी तरफ लपके।

"भागो!" शैलेंद्र की चीख सबसे पहले निकली।

इसके बाद कस्बे की संकरी गलियों में वह ऐतिहासिक दौड़ शुरू हुई जो उस दिन के इतिहास में दर्ज हो गई। आगे-आगे तीन पतले-दुबले लड़के हवा से बातें कर रहे थे, और उनके पीछे गुलाबी रंग में रंगे, हाथ में डंडा लहराते, सौ किलो के दाऊ अपनी पूरी ताकत से दौड़ रहे थे।

"शिव के बच्चे, तूने कहा था वो बूढ़े हैं, तेज नहीं दौड़ सकते!" दिनेश हांफते हुए चिल्लाया।

"मुझे क्या पता था कि हलवाई में ओलंपिक का एथलीट छुपा है!" शिव ने पीछे मुड़कर देखा तो दाऊ महज दस कदम दूर थे।

शैलेंद्र आगे दौड़ते हुए रोने जैसी आवाज में बोला, "मैं कह रहा था समोसे खरीद लेते हैं, तुम लोगों को खजाना ढूंढना था!"

रास्ते में जो भी उन्हें देखता, दंग रह जाता। मोहल्ले के लोगों ने अपनी बालकनी से चाय का कप रोककर देखा—एक गुलाबी तूफान तीन लड़कों का पीछा कर रहा था।

गलियों के तीन चक्कर काटने के बाद, तीनों दोस्त एक संकरी नाली के ऊपर से कूदकर दूसरे मोहल्ले के मंदिर के अहाते में घुस गए और दीवार फांदकर छुप गए। दाऊ भारी शरीर की वजह से वह दीवार नहीं फांद सके। वह बाहर ही डंडा पटकते हुए, हांफते-हांफते गालियां बकते रहे और आखिरकार पसीना पोंछते हुए वापस लौट गए।

करीब आधे घंटे बाद, जब सन्नाटा छा गया, तीनों मंदिर की सीढ़ियों पर धड़ाम से गिर पड़े। तीनों की सांसें उखड़ रही थीं, टी-शर्ट पसीने से भीगी हुई थीं और पैर कांप रहे थे।

कुछ देर तक सिर्फ उनके हांफने की आवाज आती रही। फिर दिनेश ने शिव की तरफ देखा, शिव ने शैलेंद्र की तरफ देखा, और फिर तीनों एक साथ इस कदर हंसे कि मंदिर का पुजारी भी बाहर आकर देखने लगा।

"भाई, दाऊ का चेहरा देखा था? एकदम गुलाबी रसगुल्ला लग रहे थे!" दिनेश ने हंसते हुए ताली मारी।

"और वो मेंढक! भगवान कसम, जब उनकी नाक पर लगा, मुझे लगा मेरी जान हंसी के मारे ही निकल जाएगी," शिव ने सीने पर हाथ फेरते हुए कहा।

शैलेंद्र ने जेब से अपना रूमाल निकाला और धूल पोंछते हुए मुस्कुराया, "जो भी कहो, जिंदगी में इतनी तेज मैं कभी नहीं भागा। सारा डर निकल गया।"

शाम ढल चुकी थी, कस्बे की बत्तियां जलने लगी थीं। जेब में अब भी वही पैंतालीस रुपये बचे थे और पेट में चूहे कूद रहे थे।

"अब क्या करें? भूख तो बहुत लगी है," दिनेश ने पेट सहलाया।

"सामने वाले नुक्कड़ पर चलो, वहां एक नया चाट वाला बैठा है," शिव उठा और धूल झाड़ते हुए बोला, "सुना है वो भी बड़ा कंजूस है... देखते हैं उसकी दुकान के नीचे कोई खजाना है या नहीं।"

"बिलकुल नहीं!" शैलेंद्र और दिनेश ने एक साथ चिल्लाकर शिव की पीठ पर धौल जमाई, और तीनों एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर ठहाके लगाते हुए आगे बढ़ गए।