पाताल की देवी और ऋषि prem chand hembram द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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पाताल की देवी और ऋषि


पाताल की देवी और पतित ऋषि — रहस्य का लोक
पाताल की देवी और पतित ऋषि
पाताललोक की वह रात पृथ्वी की रात जैसी नहीं थी।
वहाँ सूर्य नहीं था, फिर भी अंधकार पूर्ण नहीं था। विशाल गुफाओं की छत से नीली और बैंगनी रोशनी की महीन धाराएँ टपकती थीं। कहीं दीवारों पर चमकते मणि-जैसे पत्थर थे, तो कहीं काले नागों के आकार की शिलाएँ, जिनसे मंद प्रकाश निकलता था। हवा में अनजाने पुष्पों की गहरी सुगंध तैर रही थी।
दूर कहीं जल की धारा बह रही थी।
उसकी आवाज कभी मधुर लगती, कभी ऐसी प्रतीत होती जैसे कोई बहुत दूर बैठा हुआ व्यक्ति धीमे स्वर में रो रहा हो।
उस अद्भुत लोक में जहाँ भी दृष्टि जाती, वहाँ यौवन से भरे चेहरे दिखाई देते। कोई वृद्ध नहीं था, कोई रोगी नहीं था, कोई दुर्बल नहीं था।
ऋषि ने चारों ओर देखा।
उसके चेहरे पर अभी भी आत्मविश्वास था।
देवी धीमे-धीमे उसके सामने आई और बोली—
“मूर्ख ऋषि! तू देखता नहीं? जिधर भी देखेगा, उधर तुझे इस लोक का आकर्षण दिखाई देगा। यही इस लोक की सबसे बड़ी शक्ति है।”
ऋषि चुप रहा।
देवी की आँखों में अचानक कठोर चमक आ गई।
“क्या तू विश्वामित्र की कथा भूल गया? वर्षों की तपस्या, संयम और साधना के बाद भी नारी-सौंदर्य के आकर्षण ने उनके मन को विचलित कर दिया था। और तू सोचता है कि तू अकेला इस पूरे लोक पर शासन करेगा?”
ऋषि के चेहरे का तेज कुछ क्षण के लिए मंद पड़ गया।
देवी आगे बढ़ी।
“यहाँ तेरा सामना किसी एक स्त्री से नहीं होगा, ऋषि। यहाँ तेरा सामना तेरी अपनी इच्छाओं से होगा।”
उसने चारों ओर संकेत किया।
“याद रख—इस लोक में कोई पुरुष नहीं है।”
कुछ क्षण मौन छाया रहा।
फिर देवी ने धीमे स्वर में कहा—
“तू अकेला है... बिल्कुल अकेला।”
ये शब्द पाताल की विशाल गुफाओं में गूँजते चले गए।
ऋषि ने पहली बार महसूस किया कि जिस सौंदर्य को वह अब तक वरदान समझ रहा था, वही शायद उसके लिए सबसे बड़ा बंधन बनने वाला था।
उसकी स्मृति अचानक बहुत पीछे चली गई।
लगभग आठ सौ वर्ष पहले की बात थी।
तब वह स्वयं युवा नहीं था, बल्कि एक साधारण तपस्वी था। उसके पिता भी महान साधक थे। एक दिन कुछ रहस्यमयी स्त्रियाँ उसके पिता को अपने साथ एक ऐसे लोक में ले गई थीं, जिसके बारे में उस समय किसी ने सुना तक नहीं था।
वे लौटकर कभी नहीं आए।
किसी को पता नहीं चला कि वे कहाँ गए।
ऋषि ने वर्षों तक अपने पिता की खोज की।
फिर एक दिन उसने संकल्प लिया—
वह कामदेव की उपासना करेगा।
उसे धन नहीं चाहिए था।
उसे राज्य नहीं चाहिए था।
वह केवल ऐसा शरीर चाहता था जिस पर समय का प्रभाव न पड़े—ऐसा स्वास्थ्य, ऐसा यौवन और ऐसा रूप, जो उसकी साधना को लंबी आयु तक बनाए रख सके।
वर्षों की कठोर तपस्या के बाद उसे वरदान मिला।
लेकिन वरदान मिलने के बाद उसके जीवन में एक प्रश्न हमेशा जीवित रहा—
उसके पिता कहाँ गए थे?
आज पाताललोक में खड़े होकर उसे अचानक लगा कि शायद उसके पिता की कहानी और उसके अपने वरदान के बीच कोई अदृश्य संबंध था।
उसने देवी की ओर देखा।
“मेरे पिता को तुम जानती हो?”
देवी ने कोई उत्तर नहीं दिया।
शालिनी भी मौन रही।
ऋषि ने फिर पूछा—
“क्या मेरे पिता इसी लोक में आए थे?”
देवी के चेहरे पर एक क्षण के लिए ऐसी छाया आई, जिसे ऋषि पढ़ नहीं सका।
फिर उसने कहा—
“कुछ प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए मनुष्य को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।”
ऋषि आगे बढ़ा।
“और वह कीमत क्या है?”
देवी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“तुम्हारा यौवन।”
ऋषि ठिठक गया।
उसी क्षण दूर किसी अज्ञात कक्ष से घंटी की आवाज आई।
एक बार...
फिर दूसरी बार...
फिर तीसरी बार।
पाताललोक की सभी दीप-ज्योतियाँ एक साथ काँप उठीं।
हवा अचानक ठंडी हो गई।
और जिस दीवार के सामने ऋषि खड़ा था, उस पर धीरे-धीरे एक आकृति उभरने लगी।
वह किसी पुरुष की आकृति थी।
ऋषि उस छाया को देखता रह गया।
उसकी धड़कन तेज हो गई।
क्योंकि उस चेहरे की आकृति...
उसके पिता से मिलती थी।
देवी ने तुरंत अपनी दृष्टि फेर ली।
शालिनी के चेहरे से भी मुस्कान गायब हो चुकी थी।
ऋषि ने काँपते स्वर में पूछा—
“वह कौन है?”
कोई उत्तर नहीं मिला।
सिर्फ दूर से एक धीमी आवाज आई—
“जिसे तू आठ सौ वर्षों से खोज रहा है...”
ऋषि ने पीछे मुड़कर देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
और जब उसने दोबारा दीवार की ओर देखा...
वह छाया भी गायब हो चुकी थी।

क्रमशः