अनकहा रिश्ता: दिल से दिल तक - भाग 1 mahendr Kachariya द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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अनकहा रिश्ता: दिल से दिल तक - भाग 1

कॉलेज के पहले दिन की वह सुबह हर साल की तरह आम थी, लेकिन रोहन के लिए यह दिन उसकी जिंदगी का सबसे खास मोड़ बनने वाला था। रोहन शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में बी.टेक के पहले वर्ष में दाखिला लेने आया था। वह स्वभाव से शांत, थोड़ा शर्मीला और अपने सपनों की दुनिया में खो रहने वाला लड़का था। उसे भीड़भाड़ से ज्यादा किताबों का साथ पसंद था।

कॉलेज का विशाल परिसर छात्रों की आवाजाही से गुलजार था। नए चेहरों की उत्सुकता और सीनियर रैगिंग के डर का मिला-जुला माहौल हर तरफ छाया हुआ था। रोहन अपने हाथ में एडमिशन के कागजात और अपनी पसंद की एक नोवेल संभाले हुए एडमिशन ब्लॉक की ओर बढ़ रहा था। तभी अचानक तेज हवा का एक झोंका आया। हवा इतनी तेज थी कि रोहन के हाथ में पकड़े कागजात और फाइल हवा में बिखर गए। कुछ पन्ने उड़कर दूर घास के मैदान की तरफ जाने लगे।
रोहन हचकिचाया और तुरंत उन्हें पकड़ने के लिए दौड़ा। तभी एक और हाथ आगे बढ़ा और हवा में उड़ते हुए दो पन्नों को हवा में ही लपक लिया।

"ये लीजिए, आपके कागजात शायद बहुत जरूरी हैं।" एक बेहद मीठी और संगीत जैसी आवाज़ उसके कानों में गूंजी।
रोहन ने सिर उठाकर देखा। उसके सामने एक लड़की खड़ी थी। उसके बाल हल्के से हवा में लहरा रहे थे, आँखों में एक अजीब सी चमक थी और चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी। उसने पहनावे में सिंपल सा कॉटन का सूट पहना हुआ था, जो उसकी सादगी को चार चांद लगा रहा था। रोहन कुछ पलों के लिए जैसे सुन्न हो गया। उसके मुँह से शब्द ही नहीं निकल रहे थे। वह बस उस लड़की की आँखों में देखता रह गया।

"अरे! सुन रहे हैं आप?" लड़की ने मुस्कुराते हुए फाइल रोहन की तरफ बढ़ाते हुए पूछा।
रोहन ने हड़बड़ाते हुए फाइल थामी और किसी तरह खुद को संभालते हुए कहा, "ओह... थैंक यू सो मच! अगर आप वक्त पर न पकड़तीं, तो मेरे सारे डाक्यूमेंट्स इधर-उधर बिखर जाते।"

"कोई बात नहीं, मदद करना तो इंसानी फितरत है। मेरा नाम अनन्या है, और मैं इसी कॉलेज में लिटरेचर सेकंड ईयर की स्टूडेंट हूँ।" लड़की ने अपना परिचय देते हुए हाथ आगे बढ़ाया
रोहन ने झिझकते हुए अपना हाथ बढ़ाया और कहा, "मैं रोहन हूँ, आज मेरा पहला दिन है।"

अनन्या ने मुस्कुराकर कहा, "ओह! फ्रेशर्स हो? तब तो डरना लाजिमी है। चलो, अगर कोई मदद चाहिए हो, तो कैंपस के लिटरेचर क्लब के पास आ जाना।" इतना कहकर अनन्‍या अपनी सहेलियों की तरफ मुड़ गई और भीड़ में ओझल हो गई।

लेकिन उस कुछ मिनट की मुलाकात ने रोहन के दिल की धड़कनों को हमेशा के लिए बदल दिया था। वह अपनी जगह पर खड़ा बस उस रास्ते को देखता रहा जहाँ से अनन्‍या गई थी। उसके मन में एक अजीब सी कसक और खुशी महसूस हो रही थी। क्या यह महज़ एक इत्तेफाक था या फिर किस्मत का कोई इशारा? रोहन को नहीं पता था, लेकिन इतना तय था कि कॉलेज के ये चार साल अब पहले जैसे साधारण नहीं रहने वाले थे। जानने के लिए पढ़ते रहिए भाग_2