उधर दानव के जादू का असर हो चुका था।कुछ ही देर में सेठ के बेटे के शरीर में हलचल हुई। उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं। चारों ओर नज़र दौड़ाई, फिर देखा कि एक आदमी उसे अपनी कमर से बाँधे गहरी नींद में खर्राटे भर रहा है।वह कुछ पल तक हैरानी से उसे देखता रहा।फिर मुस्कुराकर धीरे से बोला,"भइया... सुनो..."रांड का संड खर्राटे मारता रहा।उसने फिर आवाज़ लगाई,"भइया, उठो। मैं आज बहुत सो लिया हूँ... क्या अब तुम्हें नींद आ रही है?।सेठ के बेटे की आवाज़ सुनकर रांड का संड की नींद खुल गई।वह झट से उठ बैठा। जैसे ही उसने देखा कि सेठ का बेटा ज़िंदा होकर उससे बातें कर रहा है, उसकी आँखें फैल गईं।लेकिन अगले ही पल उसने कुछ और ही समझ लिया।वह कमर से बँधी गाँठ खोलते हुए बड़बड़ाने लगा,"अरे! यह तो ज़िंदा है!"फिर उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया।वह खड़ा होकर सेठ और उसके पूरे परिवार को कोसने लगा।"अरे ओ सेठ! तुम्हारा दिमाग घास चरने गया था क्या? ज़िंदा आदमी को मरा समझकर मेरे हवाले कर दिया! रातभर मुझे ठंड में श्मशान में सुला दिया। तुम्हें ज़रा भी अकल नहीं है!"वह गुस्से में लगातार बड़बड़ाता रहा और सेठ के परिवार को खरी-खोटी सुनाने लगा, जबकि सेठ का बेटा आश्चर्य से उसकी ओर देखे जा रहा था रांड का संड अभी भी गुस्से में बड़बड़ा रहा था। फिर उसने सेठ के बेटे की ओर देखा और बोला,"अरे ओ भैया! तेरा बाप तो तुझे जीते-जी मारना चाहता है। ज़िंदा आदमी को मरा समझकर श्मशान पहुँचा दिया!"सेठ का बेटा हैरानी से उसकी बातें सुनता रहा।रांड का संड ने उसका कंधा थपथपाया और बड़े अपनापे से बोला,"सुन, कल से तू मेरे संग रहना। वहाँ तेरे घर नहीं जाना। हम दोनों पूरे दिन पुलिया पर बैठेंगे, चौपाल जमाएँगे, गप्पें मारेंगे और मज़े करेंगे।"इतना कहकर वह ऐसे मुस्कुराया, मानो उसने दुनिया का सबसे अच्छा उपाय बता दिया हो।सेठ के बेटे ने मुस्कुराकर कहा,"भइया, मैंने आज एक नई चौपड़ बनाई थी... लेकिन खेल ही नहीं पाया। मैं तो यहाँ आकर पड़ा हुआ था।"फिर उसने धीरे से कहा,"क्या तुम मेरी चौपड़ ले आओगे? तभी तो हम दोनों पुलिया पर बैठकर साथ खेलेंगे।"उसने अपने घर की ओर इशारा करते हुए कहा,"वो मेरे घर के पहरै में रखी है। बस उसे ले आओ, फिर हम रोज़ साथ खेलेंगे।"रांड का संड तुरंत उठ खड़ा हुआ।उसने दानव से मिली दोनों जादुई चूड़ियाँ अपनी जेब में रख लीं। फिर अपना तेल पिलाया हुआ ढो का लट्ठ कंधे पर रखा और बड़े आराम से सेठ के घर की ओर चल पड़ा।लेकिन इस बार उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं, बल्कि खुशी थी।वह रास्ते भर मन ही मन मुस्कुराता रहा और बड़बड़ाता जाता,"वाह रे किस्मत! अब मेरा भी एक दोस्त होगा। अब अकेले पुलिया पर नहीं बैठना पड़ेगा। हम दोनों साथ बैठकर चौपड़ खेलेंगे, गप्पें मारेंगे और पूरा दिन मज़े करेंगे।"यही सोचकर वह तेज़-तेज़ कदमों से सेठ के घर की ओर बढ़ने लगा। उसे चौपड़ लाने की इतनी खुशी थी कि वह रातभर की ठंड, दानव से हुई लड़ाई और सारी थकान तक भूल चुका था।रांड का संड चौपड़ लेकर वापस श्मशान आ गया।उसने चौपड़ को बड़े संभालकर एक तरफ़ रखा और फिर से सेठ के बेटे की अर्थी के पास बैठ गया।हालाँकि अब उसे मालूम हो चुका था कि सेठ का बेटा ज़िंदा है, फिर भी उसने उसकी कमर से बँधी गाँठ नहीं खोली।वह मन ही मन सोचने लगा,"न... अभी नहीं। कहीं यह भाग गया तो सुबह लोग किसे जलाने आएँगे? फिर सब मुझी पर इलज़ाम लगाएंगे कि रांड का संड रखवाली नहीं कर पाया।"यह सोचकर उसने गाँठ और कसकर बाँध दी।फिर चौपड़ अपनी गोद में रखकर बोला,"बस थोड़ी देर और रुक जा भैया। सुबह होने दे, फिर दोनों पुलिया पर बैठकर आराम से खेलेंगे।"सेठ के बेटे ने मुस्कुराते हुए रांड के संड की ओर देखा और बोला,"भइया, अब तो मुझे खोल दो। मेरे हाथ-पैर दर्द करने लगे हैं। मैं कहीं नहीं भागूँगा।"फिर उसने भरोसा दिलाते हुए कहा,"अगर तुम्हें डर है कि मैं भाग जाऊँगा, तो मुझे अपनी कमर से ही बाँध लेना। मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगा।"रांड का संड कुछ देर तक उसे घूरता रहा। वह मन ही मन सोचने लगा,"बात तो ठीक कह रहा है... अगर इसे अपनी कमर से बाँध लूँगा, तो भागेगा भी नहीं और सुबह तक मेरे पास ही रहेगा।"उसने अपनी मूँछों पर हाथ फेरा और बड़े गंभीर चेहरे से उसकी बात पर विचार करने लगा।रांड के संड ने कुछ देर तक सिर खुजलाया। फिर बोला,"ठीक ही तो कह रहा है।"उसने अर्थी की ओर देखा, फिर अपनी कमर सहलाई और बड़बड़ाया,"इतनी भारी अर्थी को घसीटते-घसीटते मेरी भी कमर दुखने लगी है।"यह सोचकर उसने सेठ के बेटे के हाथ-पैर खोल दिए। फिर अपनी ही कमर से उसे मज़बूती से बाँध लिया और संतोष की साँस लेकर बोला,"लो, अब तो तुम भाग भी नहीं सकते। अब आराम से चौपड़ खेलते हैं।"इधर भोर होने लगी। लगभग चार बजे गाँव के लोग अपने-अपने घरों से लकड़ियाँ और कांडे लेकर श्मशान की ओर चल पड़े, ताकि सेठ के बेटे का अंतिम संस्कार कर सकें।अभी चारों ओर हल्का अँधेरा ही था। जैसे-जैसे वे श्मशान के पास पहुँचे, उन्होंने देखा कि चिता के पास दो आदमी आराम से बैठकर चौपड़ खेल रहे हैं।एक ने घबराकर फुसफुसाते हुए कहा, "अरे... एक तो रांड का संड है, लेकिन दूसरा कौन है?"दूसरा काँपती आवाज़ में बोला, "कहीं कोई चुड़ैल तो नहीं! सुना है श्मशान में रहती है। लगता है रांड के संड को खाने आई होगी।"इतना सुनते ही कई लोग उल्टे पाँव भागने लगे।तभी उनमें से एक साहसी आदमी आगे आया। उसने सबको रोकते हुए कहा, "डरो मत। पहले पास जाकर देखते हैं। हम सब छिपकर नज़र रखेंगे। अगर चुड़ैल हुई तो हम भाग जाएँगे, फिर वह उसी को खा जाएगी।"सबने उसकी बात मान ली। वे धीरे-धीरे दबे पाँव आगे बढ़े और झाड़ियों की ओट से देखने लगे।पास पहुँचकर जो दृश्य उन्होंने देखा, उसे देखकर सबकी आँखें फटी रह गईं।वहाँ कोई चुड़ैल नहीं थी।रांड का संड और सेठ का बेटा हँसते हुए चौपड़ खेल रहे थे।अगले ही पल पूरे श्मशान में शोर मच गया।"अरे! सेठ का बेटा ज़िंदा है!""रांड के संड ने उसे जिंदा कर दिया!"यह खबर देखते ही देखते पूरे गाँव में फैल गई और आखिरकार सेठ के कानों तक भी पहुँच गई।सेठ ने अविश्वास से कहा, "अगर यह बात सच है, तो मैं अपनी आधी संपत्ति रांड के संड को दे दूँगा।"तभी गाँव के बुज़ुर्गों ने कहा, "उसने तुम्हारे इकलौते बेटे की जान बचाई है। आधी संपत्ति से भी बड़ा इनाम दो। अपनी बेटी का विवाह उसी से कर दो।"सेठ को भी यही उचित लगा।उसी शुभ घड़ी में हरे-पीले बाँस गाड़कर विवाह की तैयारी की गई और पूरे रीति-रिवाज से रांड के संड का विवाह सेठ की बेटी से कर दिया गया। विदा के समय सेठ ने अपनी बेटी को खूब सारा दान-दहेज और धन-दौलत देकर विदा किया।रांड का संड ने दहेज का ढेर देखा तो बोला,"देख, मैं यह सब सामान नहीं उठाऊँगा। तू ही इसे उठाकर ले चल।"सेठ की बेटी बिना कुछ कहे मुस्कुराई। उसने जितना दहेज मिला था, उसे अच्छी तरह बाँधकर अपने सिर पर रखा और अपने पति के साथ ससुराल की ओर चल पड़ी।घर पहुँचते ही रांड का संड दरवाज़े पर खड़ा होकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा,"अम्मा! बहू-बेटा ले लो!"अंदर से उसकी बूढ़ी माँ गालियाँ देती हुई हाथ में पत्थर लेकर बाहर निकली।"अरे निकम्मे! न कमाया, न धंधा किया, और अब बहू ले आया! इसे खिलाएगा क्या?"लेकिन जैसे ही उसकी नज़र दान-दहेज के ढेर पर पड़ी, उसका चेहरा खिल उठा।वह खुशी से फूली न समाई।उसने तुरंत अपनी बहू को गले लगाया, फिर गाँव की औरतों को बुलाया। ढोलक बजी, मंगलगीत गाए गए और पूरे रीति-रिवाज से बहू का गृहप्रवेश कराया गया।लेकिन रांड के संड की आदतें कहाँ बदलने वाली थीं।अगले ही दिन से उसकी वही पुरानी दिनचर्या शुरू हो गई। सुबह घर से निकलता, अपनी लाठी उठाता और जाकर पुलिया पर बैठ जाता। दिन भर आवारागर्दी करता, लोगों से बातें बनाता और शाम ढलने पर ही वापस घर लौटता।दिन बीतते गए। दिन हफ़्तों में बदले, हफ़्ते महीनों में, और महीने भी यूँ ही गुजरने लगे।रांड का संड तो पहले जैसा ही था। सुबह होते ही अपनी तेल पिलाई लाठी कंधे पर रखता, घर से निकल जाता और दिन भर कभी पुलिया पर, कभी चौपाल पर, तो कभी गाँव की गलियों में आवारागर्दी करता फिरता। उसे न खेत की चिंता थी, न घर-गृहस्थी की।उधर घर में तीन-तीन पेट थे—बूढ़ी माँ, नई-नवेली बहू और स्वयं रांड का संड। लेकिन कमाने वाला एक भी नहीं था।शादी के समय जो दान-दहेज और धन-दौलत आई थी, उसी के सहारे किसी तरह चूल्हा जलता रहा। पर धन चाहे कितना भी हो, खर्च होते-होते एक दिन घटने ही लगता है।धीरे-धीरे घर का अनाज कम होने लगा। घड़े खाली होने लगे। संदूक में रखे रुपए भी मुट्ठी-मुट्ठी निकलते-निकलते गिनती के रह गए।फिर भी रांड का संड बेफ़िक्र था। उसे तो जैसे दुनिया की कोई चिंता ही नहीं थी। वही मस्त चाल, वही हँसी-मज़ाक और वही दिन भर की आवारागर्दी।लेकिन उसकी बूढ़ी माँ और उसकी पत्नी समझ रही थीं कि अगर यही हाल रहा, तो वह दिन भी दूर नहीं जब घर का चूल्हा ठंडा पड़ जाएगा।दिन बीतते गए। हफ़्ते महीनों में बदल गए और महीने भी यूँ ही गुजरते रहे।रांड का संड अपनी पुरानी आदतों से ज़रा भी नहीं बदला। सुबह होते ही तेल पिलाई लाठी कंधे पर रखता और घर से निकल जाता। दिन भर कभी पुलिया पर, कभी चौपाल पर, तो कभी गाँव की गलियों में घूमता रहता। उसे न कमाई की चिंता थी, न घर-गृहस्थी की।
नमस्कार पाठकों और कहानी प्रेमियों। 🙏
आज मैं आपके लिए एक ऐसी पुरानी लोककहानी लेकर आई हूँ, जो मेरे लिए सिर्फ़ एक कहानी नहीं, बल्कि बचपन की एक प्यारी-सी याद है।
ये वही कहानियाँ हैं, जिन्हें मेरी माँ हमें बचन में सुनाया करती थीं। और मेरी माँ के बचपन में, मेरे नानाजी उन्हें यही कहानियाँ सुनाया करते थे।
इस तरह ये लोककहानियाँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती रहीं। इनमें गाँव की मिट्टी की खुशबू है, पुराने समय की सादगी है, हँसी-मज़ाक है और जीवन से जुड़ी छोटी-बड़ी सीख भी है।
आज उन्हीं यादों को आपके साथ बाँटने की एक छोटी-सी कोशिश कर रही हूँ।
तो चलिए, सुनते हैं आज की यह मज़ेदार पुरानी लोककहानी...