साहित्य का सर्कस - 1 rakshita pal द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

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साहित्य का सर्कस - 1

Episode:-1

: फेसबुक के लिए पोस्ट ढूंढने आए थे


सुबह-सुबह मैं कवि सम्मेलन में गई थी। मन में था कविता सुनूंगी, कुछ नया सीखूंगी। शहर में बड़ा नाम सुना था, बड़े-बड़े कवि आने वाले थे।

पर वहां तो दूसरा ही मेला लगा था। एक तरफ गरम-गरम समोसे बंट रहे थे, दूसरी तरफ सब मोबाईल में फोटो खींच रहे थे। कवि बेचारा मंच पर पूरी आबाज के साथ केह रहा था "आसली कबिता तो हेस्टेग मे है पुस्तक में कहा "नीचे कोई सुन ही नहीं रहा था। सबके हाथ में चाय थी, मुंह में समोसा था, और आंखें मोबाईल में थीं।

मैं एक कोने में बैठ गई। बगल में एक काका आकर बैठे, हाथ में दो समोसे, पुरानी सी धोती पहने हुए।

मैंने पूछा - काका, समोसा खाने आए हो कि कविता सुनने?

काका हंस के बोले - बेटा, मैं तो फेसबुक वास्ते पोस्ट ढूंढने आया हूं। घर पे पोता बोला था दादाजी कोई फोटो लाना, स्टेटस लगाना है।

मैं हंस पड़ी। मैंने कहा काका ये तो कवि सम्मेलन है, फोटो स्टूडियो नहीं।

काका बोले - अरे बेटा अब कवि सम्मेलन कहां रहे। अब तो सब सर्कस हो गया है। देखो तो, कवि मंच पर नाच रहा है, और हम लोग नीचे ताली बजाने के लिए नहीं, वीडियो बनाने के लिए आए हैं।

उसकी बात में सच्चाई थी। मैंने देखा, एक कवि अपनी पूरी जान लगा कर कविता सुना रहा था - गांव की#, मिट्टी की
# की। पर आगे बैठी दो मैडम आपस में बोल रही थीं - अरे ये वाला फिल्टर लगा, इसमें चेहरा गोरा आएगा।

पीछे एक लड़का लाइव आया हुआ था - हेलो गाइज, देखो मैं कवि सम्मेलन में हूं।

किसी को कविता से मतलब ही नहीं था। सबको बस एक पोस्ट चाहिए थी।

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समोसा थाली में था, कविता फेसबुक पे थी।

हम खाने आए थे समोसा, कविता तो फोकट में मिल गई।

मंच पे कविता थी, खिस्से में कैप्शन था।

कवि रो रहा था मंच पे, हम फिल्टर ढूंढ रहे थे।

वाह-वाह नहीं, अब तो लाइक चाहिए।

पहले लोग कविता याद करते थे, अब तो पोस्ट करते हैं।

गांव में पहले लोग कान से सुनते थे, अब तो कैमरे से सुनते हैं।

साहित्य का सर्कस लग गया है बेटा, टिकट फ्री है, पर इज्जत कोई नहीं करता।

काका की बात सुनके मैं चुप हो गई। काका सही कह रहे थे। हम कविता सुनने नहीं, कविता को दिखाने आए हैं।

कविता अब किताब में नहीं, स्टोरी में 24 घंटे में खत्म हो जाती है।


समोसा खत्म हो गया, चाय ठंडी हो गई, पर कवि अभी भी बोले जा रहा था - "लाइक कीजिये, सब्सक्राइब कीजिये, फॉलो कीजिये और शेयर कीजिये!"

पहले कवि कहता था - वाह-वाह कीजिये, अब कहता है - लाइक कीजिये। पहले लोग कविता दिल में रखते थे, अब हैशटैग में रखते हैं। 

मेरे मन में सवाल नहीं, कीड़ा घोंघ रहा था - ये कवि का मेला है या फेसबुक का मीटअप? मंच पे कवि मर रहा है कविता के लिए, नीचे जनता मरी जा रही है फोटो के लिए। वाह-वाह तो कब की मर गई, अब तो सिर्फ लाइक जिंदा है। समोसे में दम है, कविता में दम नहीं। ये सम्मेलन नहीं है, ये रील का सम्मेलन है।

क्रमशः...



- साहित्य का सर्कस
  लेखिका :- रक्षिता पाल