सच्चाई का रक्षक - 2 Veena द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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सच्चाई का रक्षक - 2

सौम्या व्यास!

तन्वी का नाम जहाँ ललित यादव (लकी) के दिल में एक हल्की सी चुभन पैदा करता था, वहीं सौम्या का नाम आते ही उसकी छाती में जैसे कोई भारी पत्थर आ टिकता था.

सौम्या, ललित और जितेन्द्र (जीतू) तीनों लखनऊ विश्वविद्यालय में एक साथ पढे थे. ललित और सौम्या का Collage के दिनों में पूरे तीन साल तक गहरा रिश्ता रहा. लेकिन उनके ब्रेकअप की वजह कोई गलतफहमी नहीं, बल्कि सौम्या की माँ की जिद और उनका अडियल रवैया था. सौम्या के परिवार को ललित का साधारण बैकग्राउंड जरा भी पसंद नहीं था—न जेब में ज्यादा पैसे थे, न ही खानदान में कोई राजनीतिक रसूख. सौम्या की माँ ने साम- दाम- दंड- भेद लगाकर दोनों को अलग करवा दिया.

इसी टूटन और कडवाहट के बाद ललित वापस अपने गृह जिले गंगापुर लौट आए, यूपीपीएससी (UPPSC) की तैयारी की और राज्य प्रशासनिक सेवा में आ गए. इसके बाद उनका सौम्या से सारा संपर्क टूट गया.

जितेन्द्र के मुताबिक, बाद में सौम्या की सगाई दिल्ली के किसी बडे उद्योगपति के बेटे से हुई थी. लेकिन साल भर के भीतर ही न जाने किन कारणों से सौम्या ने खुद वह रिश्ता तोड दिया. तब से वह अकेली ही थी—बिना शादी किए, अपने करियर में मशगूल.

लेकिन यह तो सिर्फ भूमिका थी. असली खिलाडी तो सौम्या के पिता शिवप्रताप व्यास थे!

शिवप्रताप व्यास का आजकल प्रदेश की नौकरशाही में जबरदस्त तहलका था. वे फिलहाल शासन में मुख्य सचिव (पॉलिसी रिसर्च) के पद पर तैनात थे और खबरें थीं कि वे बहुत जल्द गौतम बुद्ध नगर / वाराणसी मंडल के नए मंडलायुक्त (कमिशनर) या जिला प्रभारी बनकर आने वाले थे.

कायदे से, गंगापुर जिले में हुए इतने बडे हादसे के बाद खाली पदों को भरने के लिए शासन में चर्चा शुरू हो जानी चाहिए थी. लेकिन मामला इसीलिए रुका हुआ था क्योंकि राज्य सरकार चाहती थी कि नए कमिशनर शिवप्रताप व्यास साहब के पदभार संभालते ही उनकी सहमति से अफसरों की तैनाती की जाए.

यह अंदर की खबर एसडीएम जितेश शर्मा के हाथ किसी VIP डिनर पार्टी में लग गई थी. जितेश को पता था कि ललित और सौम्या कभी एक- दूसरे से प्यार करते थे. इसीलिए वे चाहते थे कि ललित के जरिए सौम्या तक और सौम्या के जरिए कमिशनर साहब (शिवप्रताप व्यास) तक पहुँच बनाई जाए, ताकि नए साहब के आने से पहले ही अपनी' हाजिरी' लगाई जा सके और अपने प्रशासनिक भविष्य का रास्ता साफ किया जा सके.

नौकरशाही में सारा खेल' साहब की कृपा' का होता है. भले ही डीएम की कुर्सी न मिले, लेकिन नए कमिशनर की गुड- बुक में नाम आ जाए तो आगे के प्रमोशन का रास्ता साफ हो जाता है. जितेश शर्मा ऐसा सुनहरी मौका हाथ से नहीं गँवाना चाहते थे.

यह सब सुनने के बाद ललित को समझ आया कि जितेन्द्र आखिर क्यों इतने पापड बेल रहा था—वह सीधे तौर पर जितेश शर्मा का' बिचौलिया' बनकर आया था.

ललित ने तुरंत कोई हाँ नहीं भरी. उसे नफा- नुकसान तौलना था. और सबसे बडी बात—क्या सौम्या अपने एक्स- बॉयफ्रेंड (पूर्व प्रेमी) की बात सुनेगी भी? जब उनका ब्रेकअप हुआ था, तब गुस्से में ललित ने कुछ ऐसे कडवे शब्द कहे थे जिसने सौम्या का दिल छलनी कर दिया था.

अपने सूने और अकेले मकान में लौटकर ललित बिस्तर पर लेटे- लेटे सिगरेट के कई कश खींचते रहे. काफी उधेडबुन के बाद उन्होंने फैसला किया कि वे जितेश शर्मा का यह काम कर देंगे. दिल, दिमाग, फायदे और नुकसान—हर तरह से सोचने पर इसमें उनका कोई घाटा नहीं था, बल्कि भविष्य में फायदा ही हो सकता था.

उन्होंने फोन उठाया और जितेन्द्र का दिया हुआ नंबर मिलाया.

दूसरी तरफ घंटी बजती रही. बजती रही. जब ललित हताश होकर फोन काटने ही वाले थे कि तभी एक सुरीली और जानी- पहचानी आवाज गूँजी, हेलो, कौन?

यह सौम्या ही थी! पूरे छह- सात साल बीत जाने के बाद भी उसकी आवाज में वही मिठास और ठहराव था.

सौम्या. मैं बोल रहा हूँ। ललित ने सिगरेट से बैठी अपनी भारी आवाज को थोडा संभालने की कोशिश की.

आप? कौन बोल रहा है? सौम्या उनकी आवाज पहचान नहीं पाई.

ललित का दिल थोडा बैठा, उन्होंने सच बता दिया, मैं ललित. ललित यादव. कैसी हो तुम?

सन्नाटा. फोन के दूसरी तरफ से एक खामोशी छा गई. समझ नहीं आ रहा था कि सौम्या हैरान थी, खुश थी, या उसकी आँखों में आँसू थे.

सौम्या, सुन रही हो?

काफी देर बाद सौम्या की ठंडी और सख्त आवाज आई, ललित, अगर तुमने मुझे अपनी किसी निजी बात के लिए फोन किया है, तो मेरे पास फालतू वक्त नहीं है. और अगर तुम मेरे पापा के काम से फोन कर रहे हो, तो मैं तुम्हारा यह नंबर सीधे विजिलेंस डिपार्टमेंट (सतर्कता विभाग) के एसपी साहब को भेज रही हूँ. पापा ने साफ कह रखा है कि चार्ज संभालने से पहले गंगापुर या लखनऊ से जिसका भी फोन आए, उसकी बात सीधे विजिलेंस अफसर से कराई जाए!

इसके पहले कि ललित कुछ सफाई दे पाते, सौम्या ने फोन cut कर दिया. ललित कई मिनट तक हाथ में फोन लिए सुन्न पडे रहे. बेइज्जती भी ऐसी कि मुँह छुपाने की जगह न मिले! ललित का दिमाग खराब हो गया. उन्हें खुद पर गुस्सा आ रहा था कि उन्होंने फोन किया ही क्यों!

ऐन उसी वक्त जितेन्द्र का फोन आ गया. ललित का पारा चढा हुआ था, उन्होंने अपना सारा भडास अपने दोस्त पर ही निकाल दिया. लेकिन जितेन्द्र बुरा मानने के बजाय हँसने लगा और कान पकडकर माफी माँगने लगा. उसने ललित का मूड ठीक करने के लिए शहर के नामी' ग्रैंड रेजीडेंसी होटल' में शाम को पीने- खाने का न्योता दे दिया.

ललित ने ज्यादा नहीं सोचा, गाडी की चाबी उठाई और सीधे ग्रैंड रेजीडेंसी पहुँच गए.

हॉटेल के कमरा नंबर दो सौ अठारह के बाहर पहुँचते ही उन्हें जितेन्द्र की होटल मैनेजर से तीखी बहस सुनाई दी.

असल में, कमरा नंबर दो सौ अठारह जितेन्द्र ने पहले से बुक करा रखा था, लेकिन किसी दूसरे वीआईपी मेहमान को वही कमरा पसंद आ गया था. होटल मैनेजर अब जितेन्द्र पर कमरा खाली करने का दबाव बना रहा था. मामला सिर्फ कमरा बदलने का नहीं था, मैनेजर का लहजा बहुत बदतमीजी भरा था. वह जितेन्द्र का सरकारी आई- कार्ड देखकर भी अकड दिखा रहा था:

अरे साहब! कलेक्ट्रेट में उप- सचिव होंगे आप अपने दफ्तर में! सच बताऊँ तो अंदर जो सेठ जी बैठे हैं, वे लखनऊ में बैठे सत्ताधारी पार्टी के बडे नेताओं के खास हैं. आप उनसे पंगा नहीं ले सकते. मैं तो फिर भी इज्जत से कह रहा हूँ कि दूसरा कमरा ले लीजिए, अगर वो' मंत्री जी के खास' खुद आ गए न, तो धक्के मारकर बाहर निकाल देंगे!

ललित पहले से ही सौम्या वाली बात से चिढे हुए थे. दोस्त के साथ ऐसी बदतमीजी होती देख उनका खून खौल उठा. वे आगे बढे और सीधे मैनेजर की कॉलर के पास पहुँचकर कडे लहजे में बोले.

मैनेजर ने ललित के साधारण कपडों को देखा, उसे लगा कोई ऐरा- गैरा है. वह मुँह बनाकर बोला, तुम कौन हो भाई? तुम्हारी क्या हैसियत है यहाँ बोलने की?

ललित अब उम्र के उस पडाव पर थे जहाँ सडक पर मारपीट शोभा नहीं देती, वरना पाँच साल पहले की बात होती तो मैनेजर का मुँह लाल हो चुका होता. उन्होंने गुस्सा दबाते हुए कहा, मैं कौन हूँ, यह जानने की तुम्हें जरूरत नहीं है. सीधी बात सुनो—आज यह कमरा खाली नहीं होगा, चाहे कोई भी आ जाए!

अभी ललित के शब्द पूरे ही हुए थे कि पीछे से एक भारी और घमंडी आवाज आई, अरे वाह! बडी लंबी- चौडी बातें हो रही हैं! हवा में तीर कौन चला रहा है भाई? जरा हम भी तो देखें. क्यों एडीएम साहब, गंगापुर में किसकी तूती बोलती है? एसडीएम गंगवार साहब की या इन जनाब की?

ललित ने मुडकर देखा. सामने एक पैंतीस- 36 साल का मोटा, गोल- मटोल मुँह वाला आदमी खडा था. आँखों के नीचे काले घेरे साफ बता रहे थे कि शराब और शबाब की अय्याशी में रातें बीतती हैं.

उसके ठीक बगल में जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी एडीएम सूर्यकांत शुक्ला खडे थे, और उनके पीछे जिले के तमाम बडे विभागों के अफसरों और ठेकेदारों की फौज थी.

माहौल देखकर लग रहा था कि यह मोटा आदमी (सेठ/ठेकेदार) जरूर सत्ता के गलियारे से ऊँची पहुँच रखता है.

ललित ने उस मोटे आदमी को नजरअंदाज करते हुए सीधे एडीएम शुक्ला की तरफ देखकर शिष्टाचार निभाया, प्रणाम, एडीएम साहब!

ललित और जितेन्द्र दोनों ने सिर झुकाकर अभिवादन किया. आखिर एडीएम जिले के बडे अफसर थे, उनके सामने अदब दिखाना प्रशासनिक मूक- नियम था.

एडीएम शुक्ला ने अपनी मूँछों पर ताव देते हुए रूखे स्वर में कहा, अच्छा. लकी यादव और जितेन्द्र. देखो भाई, आज मैं राज्य के बडे उद्योगपति हेमंत सेठ (सेठ जी) की खातिरदारी कर रहा हूँ. तुम्हारा कमरा बडा है, तो तुम लोग छोटे कमरे में शिफ्ट हो जाओ. वैसे भी तुम दो ही लोग हो, कहीं भी बैठकर दो घूंट मार लो, क्या फर्क पडता है?

प्रशासन में बडे अफसर का हुक्म किसी पत्थर की लकीर जैसा होता है. एडीएम शुक्ला जैसे वरिष्ठ अधिकारी के लिए ललित और जितेन्द्र जैसे Class- 2 अधिकारियों को दबाना चुटकी बजाने जैसा काम था. ललित का विभाग तो एडीएम के अंडर नहीं आता था, लेकिन जितेन्द्र सीधे उनके प्रशासनिक नियंत्रण में था.

एडीएम की बात भले ही ऊपर से सामान्य लग रही थी, लेकिन उसका संदेश साफ था—चुपचाप खिसक लो, वरना नौकरी भारी पड जाएगी.

ललित का मन बिल्कुल नहीं था हटने का, लेकिन एडीएम के तने हुए तेवर और जितेन्द्र के बार- बार आँख से इशारे करने पर उन्हें झुकना ही पडा. समझदार वही जो ऐन मौके पर पंगा न ले। जितेन्द्र की नौकरी का सवाल था, इसलिए ललित पीछे हटने ही वाले थे कि.

तभी पीछे से एक कडक और रोबीली आवाज गूँजी:

किसने कहा कि यहाँ सिर्फ दो ही लोग हैं? मैं भी इनके साथ हूँ!

सबने मुडकर देखा. कलेक्ट्रेट के गलियारे को नापते हुए, पूरे आत्मविश्वास के साथ एसडीएम जितेश शर्मा लंबे- लंबे कदम बढाते हुए अंदर दाखिल हो रहे थे!