बिसात का आखिरी मोहरा - 4 Aarti Garval द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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बिसात का आखिरी मोहरा - 4

पुस्तकालय के शीशों पर रात भर से हो रही मौत की दस्तक अब थमती हुई महसूस हो रही थी। बाहर बादलों का गरजना बंद हो चुका था और रुद्रपुर की पहाड़ियों के पीछे से भोर की पहली धुंधली रोशनी फूटने लगी थी। काली, खौफनाक रात का अंत हो रहा था और धीरे-धीरे सुबह की रोशनी विक्टोरिया पुस्तकालय के मुख्य हॉल में दाखिल हो रही थी।

​"सुबह हो गई..." तारा ने अपनी सूजी हुई आँखों से खिड़की की तरफ देखते हुए राहत की सांस ली। उसकी आवाज में रात भर के खौफ के बाद जिंदगी की एक उम्मीद तैर रही थी।

​शर्मा जी ने भी अपने हाथ जोड़कर भगवान को धन्यवाद दिया। इंस्पेक्टर समीर ने अपनी पिस्तौल मेज से उठाई और उसे वापस अपनी बेल्ट में खोंस लिया। रात भर जागने की वजह से उनकी आँखों में लालिमा उतर आई थी, लेकिन उनका दिमाग अभी भी शतरंज की उस अधूरी बिसात पर अटका हुआ था। 'सफेद वजीर' का कोई नया संदेश दोबारा नहीं आया था, और राहत की बात यह थी कि रात में कोई दूसरा कत्ल नहीं हुआ।

​"शर्मा जी, चलिए बाहर चलकर देखते हैं कि क्या रास्ता साफ हुआ है?" समीर ने भारी आवाज में कहा।

​शर्मा जी ने कांपते हाथों से पुस्तकालय का वह भारी मुख्य दरवाजा खोला, जो रात भर से बंद था। जैसे ही दरवाजा खुला, पहाड़ों की ठंडी और ताजी हवा का एक झोंका कमरे के भीतर आया, जिसने रात भर की उस घुटन और खून की बू को थोड़ा कम कर दिया।
​अद्वैत, डॉक्टर मीरा, प्रोफेसर अय्यर और रसोइया आर्यन—एक-एक करके सब पुस्तकालय की उस डरावनी इमारत से बाहर निकलने लगे। बाहर का नजारा तबाही बयां कर रहा था। चारों तरफ पेड़ गिरे हुए थे, और सड़क पर कीचड़ और मलबे का ढेर लगा था। लेकिन खुली हवा में आते ही सबके चेहरों पर एक अजीब सी तसल्ली थी कि वे इस 'बंद कमरे' की कैद से आज़ाद हो चुके थे।

​प्रोफेसर अय्यर ने गहरी सांस लेते हुए पहाड़ों की तरफ देखा, "तो आखिरकार, हम सब बच गए। कातिल की चाल नाकाम रही।"

​समीर सब पर कड़ी नजर रखे हुए थे। वे सब पुस्तकालय के अहाते से निकलकर उस ढलान वाली मुख्य सड़क की तरफ बढ़ने लगे, जहाँ रात को लैंडस्लाइड हुआ था। सब आगे बढ़ रहे थे, लेकिन समीर के मन में एक बात खटक रही थी। उन्हें लग रहा था कि यह आज़ादी इतनी आसान नहीं हो सकती।
​जैसे ही सब लोग सड़क के उस मोड़ पर पहुँचे जहाँ मुख्य रास्ता धंसा हुआ था, समीर अचानक रुक गए। उनकी नजरें कीचड़ में सने उन कदमों के निशानों पर पड़ीं, जो पुस्तकालय के बाहर से आ रहे थे।
​समीर ने चिल्लाकर कहा, "रुकिए! कोई आगे नहीं बढ़ेगा!"

​सब चौंककर रुक गए। अद्वैत ने मुड़कर कहा, "अब क्या हुआ इंस्पेक्टर? अब तो सुबह हो गई है, हम सब बाहर आ चुके हैं!"

​समीर ने जमीन की तरफ इशारा करते हुए कहा, "कातिल ने हमें आज़ाद नहीं किया है, अद्वैत। ध्यान से देखो... ये पैर के निशान बाहर जाने के नहीं, बल्कि सुबह-सुबह किसी के चुपके से पुस्तकालय के अंदर वापस आने के हैं। कातिल रात भर हमारे बीच होने का नाटक कर रहा था, पर वो सुबह होने से ठीक पहले बाहर गया था और फिर वापस आया।"