त्रिवेणी: एक आदर्श बहू से बेकार बहू बनने तक का सफर - 1 Triveni chakrdhari द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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त्रिवेणी: एक आदर्श बहू से बेकार बहू बनने तक का सफर - 1

अध्याय 1

     दरपन मा दिखत ओ सूजन अउ नील के चिंहा मन जनो मोर धरम अउ मोर त्याग के खिल्ली उड़ावत रहिन। मैं सोचत रहेंव कि आखिर मोर अच्छाई ही मोर सबले बड़े कमजोरी कइसन बन गे? जेला मैं अपन 'सिंघार' समझेंव, आज ओही मोर गुनहगार बन गे।

डेहरी के भीतर के नरक (2008)
    लोगन मन कहिथें कि बेटी ह बिहा के बाद अपन असली घर जाथे, फेर मोला का पता रहिस कि जउन घर ला मैं अपन सोंचत रहेंव, वो ह मोर बर एक नरक साबित होही। डेहरी ला लांघते साथ मोर आजादी अउ मोर मुस्कान, दोंनो हा ओ पार छुट गे रिहिस। ससराल म मोर सास के काम अइसन रहिस, मानो ओहा कोनो जेलर होवय। ओकर कड़ा-कड़ा शब्द मन मोर कान में जाय ता अइसे लगे जैसे जहर हरे। बिहनिया ले रात तक ओकर ताना अउ कड़वा बोली, वो ह मोर मानसिक शांति ला भंग करे के एको मौका नई छोड़य।फेर सबले ज्यादा दरद तब होय, जब मैं अपन पति डहर आस लगा के देखंव। मैं सोंचेंव कि वो मोला समझही, मोला सहारा दिही। फेर ओकर चुप्पी ह सास के ताना ले जादा जानलेवा रहय।जब वो ह अपन दाई के गलत बात मन ला घलो चुपचाप सुनय, त मोर कलेजा फट जाय। मोला अहसास होय कि ए घर के भीतर मैं एकदम अकेल्ला हंव अउ ये चार दिवार मोर बर एक अइसन जेल बनगे हे, जहाँ ले कोनो रिहाई नई हे।
     जब मैं पहली बार ससराल आयेंव, त वो पहिली दिन ले ही मोर पति ह मोर ले दुरिहा-दुरिहा रहे बर धर लीस। जेकर ले मैं मया अउ साथ के उम्मीद करे रहेंव, ओकर अइसन रूखा व्यवहार ह मोर कलेजा ला छलनी करे ला धर दीस। मोला अइसन लागे कि मैं ओ घर बर कोनो पराया हंव। वो मोर साथ चार पल बइठ के गोठियाना त दुर, मोर कोति मया लगा के देखना घलो ओला पसंद नई रहिस। सब ला आस रहिथे कि बिहा के बाद ओकर पति ओकर आघू-पाछू घूमय, ओला मया ले दुई शब्द कहाय अउ अपन सँग मा घुमाय-फिराय बर ले जाही। मैं घलो अइसने सपना सजा के अपन माइके के वो मयारू गली ला छोड़ के आय रहेंव। मोर पति ला मोर में कोनो रुचि नई रहिस.।
मैं रायपुर सहर के लइका रहेंव।मोर भौजी मन बड़े -बड़े लोग लइका वाली होगे रिहिन फेर ओ मन अभी तक बाहिर कमाए बर नई गे रिहिन। फेर मय घलो मइके म कभू बाहिर मजूरी करे बर नइ गे रहेंव। मोर दाई-ददा गरीब जरूर रहिन, फेर मोला कभू कमाय बर कोनो के दुआर मा नइ भेजिन। मन मा एक अगाध भरोसा राहय कि ससुरार जाहूँ त उहां राज करहूँ, फेर मोला का पता राहय कि "करम के लिखे ला कोनो नइ मेट सके"। मोला ससरार आय अभी आठ दिन घलो नई होये रिहिस अऊ लुवाई (कटाई) के काम करे ला पड़ीस। मोर बर ये नवा अनुभव राहय। मैं अइसन नई रहेंव कि नवा दुलहिन बन के आहो अउ सीधा मजूरी करे बर निकल गेंव। मोर ले बड़े दू झन जेठानी मन घलो रहिन। 
बड़े जेठानी के बिहाव ला दस बछर हो गे राहय, फेर मंझली जेठानी अउ मोर बिहाव एके संग होय राहय। हम दूनों संगवारी कस रहेंन। जब हम दूनों संग-संग खेत जावन, त मन मा एक अजब के पीरा घलो होवय अउ हिम्मत घलो। खेत ले आये के बाद हम दूनो झन थक जान, फेर मोर पीरा ह ओकर ले कतको जादा रिहिस। दिन भर बुता करे के थकान ह ओतका नई राहाय, जतका ये सोच के होवय कि मोर बर मोर घरवाला (पति) करा टेम (समय) च नई हे। मँझली जेठानी के करम ह त अइसे लागे जइसे 'अँगना मा चंदा उगे हे'। ओकर घरवाला दिन भर खेत में रहय, ओकर साथ दिन भर मीठ-मीठ गोठियाय, हंसी-ठिठोली करे। फेर मोर करम... मोर पति त बाहिर काम करे बर जाय। बिहनिया नौ बजे के निकले रात के नौ बजे घर आवय। मोर मन मा अइसे लागय कि "दिया तरी अँधियारी" छा गे हे। मोरो मन होतिस कि मोर घरवाला दिन भर मोर साथ हंसी-ठिठोली करे, दिन भर संगे में बुते करे... फेर का करबे, "लिखे करम के रेखा, कोनो नई मेटे सकय।”