टाम ज़िंदा हैं - 18 Neeraj Sharma द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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टाम ज़िंदा हैं - 18

" टाम जिंदा है ------ 18 वा धारावाहिक  --------------"

मतलब की आग से जल जाना, हर किसी को आता है.... राणा कोई नया पात्र नहीं है... मेरे हर उपन्यास का खरीददार यही तो होता है। अमरीश को एक नया झटका लगा... अचानक। अचानक भी कया बला है। जो अचानक ही होता है।

"भवानी सिंह तेरी ये कैसी करगुज़ारी है, एक mlA के जवाई ओर रिश्तेदार को भी बचा नहीं सके। " ssp की गुज जबरदस्त थी। "कया सोचते हो वो ऊगल नहीं उठाएगा... तुम पर " ssp एक दम चुप। सीधा शक उसका तुम पर हमारी केटागिरी की तरफ ही जायेगा। " "---अब ऑफिस मे कम से कम शांति बना छोड़ना।" Ssp ने एक दम से कहा।

                    राणा को बात पता चली " भवानी सिंह मेरे शेर, कैसे हो.... सुना है कुछ। " 

भवानी ने मुस्कान बिखेर ते कहा " उजड़े बाग मे पतझड़ आये न आये कोई फर्क नहीं पड़ता। " 

"बड़ी बड़ी बाते करने लग गया मेरा बच्चा। " राणा ने देहकते पथर को छेड़ा।

" बड़े शहर मे बड़ी बाते... छोटे मे छोटी... आपका हाथ रहा राणा जी सब अखबारों मे खबर छपा दुगा, अमरीश एक नबर का वो कया गांडू भी है। " दोनों जोर से हसे। त्रिपाठी ने सुन लिया था, वो मुँह लटकाये बैठा था। आँखे भरी हुई थी। भवानी ने फोन रखा ओर मुँह घूमया तो एक दम से काप गया... " कया हुआ त्रिपाठी। " वो गहरा रो रहा था... सिसकी थी। "मै लूट गया यार " वो सुन कर फिर उछल पड़ा।

"हुआ कया -----"

"गुंडों ने मेरा लड़का मार दिया.... " फिर बिलख पड़ा।

"बड़े नाले से उसकी लाश मिली... कल से लापता था... उसके चेहरे पर पीठ पर अमरीश लिखा था। " दोहराहे पे आज फिर भवानी खड़ा था। कौन था उसका हथेयारा ---?   ........?

"  बहुत अफ़सोस हुआ... यार " भवानी की आँखे नम थी। "तुम यहां कयो आये..." भवानी बोला ----" चल मुझे लाश तो दिखा... " 

"पोस्टमाटम के लिए भेज दी..." भावनी को गुस्सा आया। " मै यहां हूँ, किसने ऑडर किये।... " 

"Ssp ने " भवानी चुप था। मन मे बोला.... " साला अमरीश का ट्टू है... कमबख्त। " तभी मोबाईल की स्क्रीन पर राणा अंगूठा से लाया.... " राणा जी बुरी खबर... त्रिपाठी का son गंदे नाले से मिला, कौन है इसके पीछे... पता लाये। " भावनी ने फोन रखा ही था।

अमरीश की ब्लू कार खड़ी हुई गेट के बाहर। भवानी ने देखा था पर उसने नहीं.... त्रिपाठी को आगे कर रिकॉडिंग पर फोन लगा के भवानी खिसक गया था। अमरीश ही था। चल रहा था जैसे धरती पे पैर रगड़ कर चल रहा हो। " बहुत अफ़सोस हुआ --- कमीने ने कैसे मारा बच्चे को। " त्रिपाठी ढंग से रोया ही कहा था। चुप पसर गयी। " सर आप के साथ कौन सा अच्छा हुआ।" त्रिपाठी ने अफ़सोस से कहा। " कर्मो का लेना देना होता है, अफ़सोस तो हमेशा रहता है.... " तभी अमरीश उठा और पीछे मुड़ कर देखा ----" भावनी साहब कही नजर नहीं आये.... पर बूल्ट तो यही है। तभी एक इतना जोर से बम्ब धमाका हुआ... पता ही नहीं चला... धुआँ ही आग ही... आग थी... धुक धुक करती इमारत जल रही थी... उसकी रेज इतनी थी बूल्ट तक़ टूट गया था.. दूसरी और केदियो की इमारत वो भी ढेर हो गयी थी... सायरन बज पड़े थे। ( चलदा )

नीरज शर्मा 🚩🙏🏻❤️