उधर— सराय जल चुकी थी।
आग की लपटें आसमान को छू रही थीं।
अनीश बुलेटप्रूफ बस को लिए छेदीपुरा की आख़िरी गलियों से निकलकर अँधेरी सड़क पर दौड़ा जा रहा था।
बस के अंदर
डरी हुई लड़कियाँ सिमटी बैठी थीं।
ऊपर आसमान में चारों ड्रोन उनके साथ उड़ रहे थे।
—
उसी समय… छेदीपुरा गाँव की दूसरी तरफ अँधेरी गलियों में डॉक्टर दीदी बाकी पाँच लड़कियों को लेकर भाग रही थी।
साँसें तेज़।
सबके कदम हड़बड़ाए हुए।
पीछे कहीं दूर अभी भी गोलियों की आवाज़ गूँज रही थी।
एक छोटी लड़की हाँफते हुए बोली—
“दीदी… हमें कहाँ ले जा रही हो?”
डॉक्टर ने पीछे मुड़कर देखा।
उसकी साँस तेज़ चल रही थी।
“बेटा… मैंने गोलियों की आवाज़ सुनी तो तुम्हें निकाल लाई।
सबको तो नहीं बचा सकी…”
उसकी आवाज़ काँप गई।
“पर अगर तुम पाँच को भी बचा लूँ तो…”
वह आगे बढ़ती रही।
कुछ देर बाद वे गाँव के पीछे वाले कच्चे रास्ते से होते हुए
जंगल की तरफ निकल आए।
पेड़ों के बीच से हल्की भोर की लालिमा झाँकने लगी थी।
एक लड़की डरते हुए बोली—
“दीदी… यहाँ जंगल में कोई जानवर हुआ तो?”
डॉक्टर रुकी नहीं।
हल्का सा मुस्कुराई।
“अरे पगली… असली जानवर तो उस गाँव में भरे पड़े हैं।
जंगल का ये रास्ता मुझे पता है।
दो घंटे चलेंगे… फिर सड़क मिलेगी…
वहाँ से कोई—”
उसकी आवाज़ अचानक गले में अटक गई।
सामने—
एक पेड़ के नीचे
एक साया खड़ा था।
हाथ में टॉर्च।
टॉर्च की रोशनी जली।
प्रभु।
वह मुस्कुराया।
“कहाँ भाग रही हो तुम सब?”
वह धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ा।
डॉक्टर तुरंत आगे आ गई।
पाँचों लड़कियों को अपने पीछे कर लिया।
प्रभु ने कमर से बंदूक निकाली।
“सब मरोगी।”
अचानक—
पीछे झाड़ियों में सरसराहट हुई।
प्रभु पलटा भी नहीं था कि—
धड़ाऽऽक!
एक बड़ा पत्थर उसके सिर के पीछे आकर लगा।
प्रभु की आँखें फैल गईं।
बंदूक उसके हाथ से छूट गई।
वह दो कदम लड़खड़ाया।
फिर सीधे ज़मीन पर मुँह के बल गिर पड़ा।
हिला भी नहीं।
खून मिट्टी में फैलने लगा।
डॉक्टर और लड़कियाँ स्तब्ध खड़ी थीं।
पीछे चिंटू खड़ा था।
हाथ में वही बड़ा पत्थर।
उसका चेहरा बिल्कुल ठंडा था।
उसने प्रभु की तरफ देखा।
फिर पत्थर धीरे से जमीन पर रख दिया।
कुछ नहीं बोला।
डॉक्टर ने लड़कियों के कंधे पकड़े।
“चलो।”
वे जल्दी-जल्दी जंगल के रास्ते में आगे बढ़ गए।
पीछे— प्रभु की लाश पेड़ के नीचे पड़ी रही।
और आसमान में भोर की पहली लालिमा फैलने लगी।
—
सुबह के साढ़े आठ बज चुके थे।
सूर्य चमचमा रहा था।
शनिवार की सुबह थी और हाईवे पर ज़्यादा ट्रैफिक नहीं था।
तेज़ी से बढ़ती बस चलाते हुए जोगी बार-बार पेट्रोल पम्प के साइन खोज रहा था।
ईंधन ज़्यादा नहीं बचा था।
एक ओर अनीश ऊँघ रहा था।
गन उसके पास ही रखी थी।
जोगी ने रियरव्यू मिरर में देखा—
लड़कियाँ सीटों पर सोई पड़ी थीं।
निश्चिंत… जैसे कई रातों से नहीं सोई थीं।
जोगी के चेहरे पर हल्की मुस्कान तैर गई।
फिर अचानक उन पाँच बच्चियों का ख्याल आया।
माथे पर शिकन पड़ गई।
पर अब वो उसके हाथ में नहीं था।
दूर उसे एक बड़ा डीज़ल स्टेशन दिखाई दिया।
जोगी ने एक नज़र पीछे के खाली हाईवे पर डाली।
पीछा करने वाला कोई नहीं।
उसने बस एग्ज़िट की तरफ मोड़ दी।
अनीश की भी एकदम नींद खुली।
हाथ तुरंत गन पर गया।
फिर उसने बाहर देखा और थोड़ा शांत हुआ।
पेट्रोल पम्प पर बस रुक गई।
दोनों नीचे उतरे।
अनीश ने हाथ में क्रेडिट कार्ड मशीन घुमाते लड़के को बुलाया—
“चल बेटे, टैंक फुल कर दे।”
लड़के ने एक पल घूरा।
फिर तीखा जवाब दिया—
“सेल्फ सर्विस है सर।”
अनीश भड़क गया—
“अबे?”
लड़का बस की छत पर रखे तीन ड्रोन भी घूर रहा था।
जोगी ने देर न करते हुए फ्यूल करना शुरू कर दिया।
उधर अनीश अंदर की शॉप में घुसा।
दो क्रेट पानी की बोतलें उठाईं।
फिर चिप्स, चॉकलेट्स और बिस्किट के कई पैकेट ट्रॉली में भर लिए।
उधर जोगी अपनी टैबलेट में चौथे ड्रोन की फीड देखता जा रहा था।
अनीश जल्दी से बिलिंग करा कर बाहर आया।
बस के अंदर चढ़कर लड़कियों को बोतलें और चिप्स बाँटने लगा।
“लो… आराम से खाओ।”
कुछ लड़कियाँ अभी भी उनींदी थीं।
जोगी फिर स्क्रीन पर झुका।
तभी—
टैबलेट की स्क्रीन पर
दूर… क्षितिज की तरफ
छोटी-छोटी टिमटिमाती लाइटें दिखाई दीं।
जोगी का गला सूख गया।
उसने स्क्रीन ज़ूम की।
रोशनियाँ तेज़ी से हिल रही थीं।
एक नहीं।
दो नहीं।
करीब बीस मोटरसाइकिलें।
सीधे उसी हाईवे पर।
और उनकी दिशा—
यही थी।
जोगी चीखा—
“अनीश सर!
फ्यूल कितना हुआ?”
अनीश भागकर बाहर आया।
मीटर देखा।
“बस हो गया जोगी!”
उसने नोज़ल खींचकर बाहर फेंका और भागकर ड्राइवर सीट की तरफ आया।
जोगी की नज़र अभी भी टैबलेट पर जमी थी।
स्क्रीन पर अब मोटरसाइकिलों की आकृतियाँ साफ़ हो रही थीं।
सब तेज़ी से बढ़ रही थीं।
और हर बाइक पर—
दो आदमी।
कुछ के कंधों पर
लंबी बंदूकें लटक रही थीं।
अनीश सीट पर बैठते ही समझ गया।
उसने धीरे से कहा—
“लगता है बारात आ गई।”
फिर जोर से चिल्लाया—
“सब पकड़ कर बैठो!”
बस का इंजन गरजा।
और अगले ही पल—
वह पेट्रोल पम्प से
तेज़ी से हाईवे पर कूद गई।
पीछे—
मोटरसाइकिलों की वह पूरी फौज
धूल उड़ाती हुई
उनकी तरफ बढ़ रही थी।
मोटरबाइक युद्ध शुरू होने वाला था।
—
उधर शहर के बाहर एक बड़े रिसॉर्ट में।
एक शानदार सुइट के कमरे में हल्की धूप परदों से छनकर अंदर आ रही थी।
टेबल पर खुला लैपटॉप।
स्क्रीन पर लाइव फुटेज चल रहा था।
एक मोटरसाइकिल सवार के हेलमेट में लगा कैमरा।
फीड हिलती हुई आगे भागती बस दिखा रही थी।
आस-पास मोटरसाइकिलें तेज़ी से निकल रही थीं।
लैपटॉप के सामने खड़ी थी—
त्रिशा जैकब्स।
सिर्फ़ एक सफेद बाथरोब पहने।
उसकी आँखें स्क्रीन पर जमी थीं।
“पकड़ो सालों को…”
उसके मुँह से धीमे से निकला।
तभी पीछे से एक मीठी आवाज़ आई—
“ओहो…”
एक और स्त्री का साया पीछे से आया
और हल्के से त्रिशा को थाम लिया।
त्रिशा के चेहरे पर तनाव था।
फिर भी होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
“अभी नहीं,” उसने धीमे से कहा।
पीछे खड़ी औरत ने उसके गाउन का स्ट्रैप ढीला कर दिया।
त्रिशा ने लैपटॉप टेबल पर रख दिया।
धीरे से मुड़ी।
सामने—
नवीना जांगिड़।
सीने पर कसकर बँधा सफेद टॉवल।
गीले बाल।
दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखती रहीं।
फिर जैसे अनायास—
उनके होंठ मिल गए।
लैपटॉप में मोटरसाइकिलों की घरघराहट सुनाई दे रही थी।
दोनों कुछ सेकंड तक होंठों से जुड़ी रहीं।
फिर त्रिशा एक पल अलग हुई।
पर नवीना ने उसका चेहरा पकड़कर उसे फिर अपनी ओर खींच लिया।
नवीना हल्के से हँसी—
“सिविलियन मैं हूँ।
तुम पुलिस वाली।
डरना तो मुझे चाहिए।”
त्रिशा ने गहरी साँस ली।
“ये केस मीडिया अटेंशन पा चुका है।
लगा था ठंडा पड़ जाएगा… पर ये दोनों हरामखोर यहाँ भी आ पहुँचे।
एकदम नासूर बन गए हैं।”
नवीना ने उसके गाल थाम लिए।
“जॉन प्रोफेशनल है। देख लेगा। Don’t worry.”
उसने अपने टॉवल की गाँठ ढीली कर दी।
त्रिशा ने भी बाथरोब कंधे से गिरने दिया।
दोनों एक-दूसरे से लिपटकर बिस्तर पर गिर पड़ीं।
कमरे में हल्की धूप, लैपटॉप की स्क्रीन पर भागती बस, और मोटरसाइकिलों की गूँज।
—
कुछ मिनट बाद।
त्रिशा पीठ के बल लेटी थी।
चेहरे पर वही तनाव अब भी बाकी था।
नवीना धीरे-धीरे नीचे सरकी।
त्रिशा की साँस अटक गई।
उसकी उँगलियाँ चादर पर कस गईं।
“अब किस सोच में डूबी हो, मैडम कमिश्नर?”
नवीना की आवाज़ में वही आधी हँसी, आधा हुक्म था।
त्रिशा ने आँखें मूँद लीं।
“सोच रही हूँ… कहाँ से कहाँ आ गए हम लोग।
बस फँसते चले जा रहे हैं।”
नवीना ने जवाब नहीं दिया।
नीचे ही लगी रही—जैसे हर बार की तरह उसकी घबराहट का इलाज भी वही हो।
कुछ क्षण बाद त्रिशा के होंठों से दबा हुआ-सा स्वर निकला।
उसकी पकड़ चादर पर और कस गई।
लैपटॉप में अब भी भागती बस की घरघराहट सुनाई दे रही थी।
फिर नवीना उठी।
होंठों के कोने पर हल्की, संतुष्ट मुस्कान थी।
टेबल पर रखा ग्लास उठाया, एक घूँट लिया, और घड़ी की तरफ देखा।
“चलने का टाइम हो गया है,” उसने जैसे किसी मीटिंग का समय याद दिलाते हुए कहा।
त्रिशा ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
चेहरे पर तनाव पूरी तरह गया नहीं था—
बस कुछ देर के लिए दब गया था।
अब दोनों के चेहरों पर कोई मुस्कान नहीं थी।
नवीना ने पास की महंगी लकड़ी की अलमारी की तरफ हाथ बढ़ाया।
वहाँ दो काले चोगे पड़े थे।
उसने एक उठाकर त्रिशा की तरफ बढ़ाया।
दोनों ने चोगे पहन लिए।
काले कपड़े पर संतरी धारियों जैसी अजीब डिज़ाइन बनी थीं—
मानो कोई प्राचीन चिन्ह।
फिर नवीना ने टेबल से दो बड़े लाल मुखौटे उठाए।
दैत्य जैसे चेहरे।
लंबे दाँत।
खाली आँखों के गड्ढे।
दोनों ने अपने-अपने मुखौटे पहन लिए।
चोगे की हुड सिर पर चढ़ाई।
अब वे पहचान में नहीं आ सकती थीं।
कुछ सेकंड बाद—
कमरे का दरवाज़ा खुला।
दोनों बाहर निकल गईं।
—
होटल की लंबी गलियाँ।
मोटी कालीन।
दीवारों पर हल्की पीली रोशनी।
दोनों चुपचाप आगे बढ़ती रहीं।
कुछ मोड़ पार करने के बाद—
वे एक बड़े हॉल के दरवाज़े तक पहुँचीं।
दरवाज़ा खुला।
अंदर—
हल्का भाप सा धुआँ।
पीछे बजती एक धीमी घंटी जैसी आवाज़
वातावरण में घुल रही थी।
पहले से बहुत लोग मौजूद थे।
सबके शरीर पर वही काले चोगे।
सिर पर हुड।
चेहरों पर सफेद सपाट मुखौटे।
अलग-अलग दरवाज़ों से चोगे-मुखौटे पहने साये अंदर आते जा रहे थे।
हॉल में धीमी फुसफुसाहट गूँज रही थी—
जैसे कोई गुप्त सभा हो।
नवीना और त्रिशा अंदर दाखिल हुईं।
भीड़ के बीच से गुजरती हुईं।
जैसे ही वे आगे बढ़ीं—
लोग हल्के से किनारे हटते गए।
उन्हें रास्ता देते हुए।
हॉल के सामने एक ऊँचा मंच बना था।
उसके बीचों-बीच एक और स्त्री खड़ी थी।
वह भी काले चोगे में थी।
उसके चेहरे पर भी वैसा ही दैत्य मुखौटा था—बस सुनहरा।
वही थी स्वामिनी।
स्वामिनी—नाम नहीं, एक पद।
और उस पद तक पहुँचने का रास्ता लाशों के ऊपर से होकर जाता था।
वह स्थिर खड़ी थी—
मानो सबकी प्रतीक्षा कर रही हो।
नवीना और त्रिशा मंच तक पहुँचीं।
सीढ़ियाँ चढ़ीं।
और उस स्त्री के दोनों तरफ आकर खड़ी हो गईं।
हॉल में सन्नाटा छा गया।
तीनों ने एक साथ अपने हाथ ऊपर उठाए।
उसी पल—
मंच पर तेज़ रोशनी पड़ी।
और उनके पीछे दीवार पर उभरा—
एक विशाल काला उल्टा त्रिकोण।
त्रिकोण।
कमरे में मौजूद सभी सफेद मुखौटे
एक साथ धीरे-धीरे घुटनों पर झुक गए।
— जारी —