जब रेत ने याद दिलाया Ashin Rishi द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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जब रेत ने याद दिलाया

मैं तीस साल बाद उसी समुद्र तट पर खड़ी थी, और लहरें मेरे पैरों को वैसे ही छू रही थीं जैसे उस गर्मी में छूती थीं जब मैं सत्रह की थी। रेत अब भी उतनी ही सुनहरी थी, लेकिन मैं वह लड़की नहीं रही जो यहाँ से भागकर शहर चली गई थी, अपने दिल के टुकड़े इसी किनारे पर छोड़कर।

मेरे हाथ में वकील का लिफाफा था। "आपकी नानी ने आपके लिए समुद्र के किनारे वाला घर छोड़ा है, सुश्री मीरा। लेकिन एक शर्त है - आपको तीस दिन वहीं रहना होगा। अकेले।"

तीस दिन। उसी गाँव में जहाँ से मैं भाग निकली थी। उसी घर में जहाँ मेरी नानी ने मुझे हर गर्मी प्यार से पाला था। और सबसे डरावनी बात - उसी जगह जहाँ वो शायद अभी भी रहता हो।

आदित्य।

मैंने उसका नाम तीस सालों में कभी जुबान पर नहीं लाया, लेकिन दिल ने कभी भुलाया भी नहीं।

घर वैसा ही था - नीले रंग की खिड़कियाँ, लकड़ी का पुराना दरवाजा, और बरामदे में वह झूला जहाँ हम घंटों बैठकर आसमान में तारे गिनते थे। मैंने चाबी घुमाई और अंदर कदम रखा। धूल की हल्की परत हर चीज पर जमी थी, लेकिन सब कुछ ठीक वैसा ही था जैसा मैंने छोड़ा था।

रसोई की मेज पर एक डायरी रखी थी। नानी की लिखावट में।

"मीरा, मेरी जान, तू जो भागकर गई थी, वो तेरा अधिकार था। लेकिन जो तूने पीछे छोड़ा, उसका जवाब देना तेरी जिम्मेदारी है। तीस दिन। बस तीस दिन इस घर में रह। शायद तुझे वो मिल जाए जो तू शहर में तीस साल से खोज रही है।"

मेरे हाथ काँप रहे थे।

पहली सुबह मैं समुद्र किनारे टहलने निकली। सूरज अभी पूरी तरह उगा नहीं था, और किनारा खाली था। मैं उसी चट्टान की तरफ बढ़ने लगी जहाँ हम बैठा करते थे, और तभी मैंने उसे देखा।

आदित्य।

तीस साल बड़ा, बाल सफेद हो चुके थे, लेकिन वही आँखें। वही जो मेरे सपनों में आती रहती थीं।

वो मुझे देखकर रुक गया। हम दोनों के बीच सिर्फ पचास कदम का फासला था, लेकिन लगा जैसे तीस साल फिर से हमारे बीच खड़े हो गए।

"मीरा।" उसकी आवाज में वही गहराई थी।

मैं कुछ कह नहीं पाई। बस खड़ी रही, जैसे समय थम गया हो।

वो धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ा। "तुम्हारी नानी ने बताया था कि तुम आओगी।"

"क्या?" मेरी आवाज बाहर निकली।

"उन्होंने मुझे छह महीने पहले बुलाया था। कहा था - आदित्य, मीरा आएगी। और तुम्हें यहाँ होना चाहिए।"

मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा। "नानी ने... तुमसे क्यों?"

उसने समुद्र की तरफ देखा। "क्योंकि उन्हें पता था कि मैं हर रोज यहाँ आता हूँ। तीस साल से। हर सुबह। उसी चट्टान पर बैठता हूँ जहाँ हम बैठते थे। और इंतज़ार करता हूँ।"

मेरी साँसें रुक गईं। "किसका इंतज़ार?"

उसने मेरी तरफ देखा, और उन आँखों में मैंने वो सब देखा जो मैं तीस साल से छुपाती आई थी। "तुम्हारा। मैं हर दिन इंतज़ार करता था कि शायद आज तुम लौट आओ।"

"आदित्य..." मेरी आवाज टूट गई। "मुझे जाना पड़ा था।"

"मुझे पता है।" उसने कहा, और उसकी आवाज में कोई शिकायत नहीं थी। "तुम्हारे सपने यहाँ पूरे नहीं हो सकते थे। तुम्हें वास्तुकार बनना था, बड़े शहर में। मैं कभी तुम्हें रोकना नहीं चाहता था।"

"फिर तुमने मुझे जाने से पहले कुछ क्यों नहीं कहा?" आँसू मेरे गालों पर बहने लगे। "तुमने एक भी चिट्ठी का जवाब क्यों नहीं दिया?"

उसने गहरी साँस ली। "क्योंकि मुझे लगा अगर मैंने जवाब दिया, तो तुम वापस आना चाहोगी। और मैं नहीं चाहता था कि तुम अपने सपनों को मेरे लिए छोड़ो। मैं चाहता था कि तुम उड़ो, मीरा। चाहे इसके लिए मुझे खुद को तोड़ना पड़े।"

मैं उसके सामने ढेर हो गई। तीस साल का दर्द, तीस साल की नाराज़गी, तीस साल का प्यार - सब एक साथ बाहर आने लगा।

उसने मुझे सहारा दिया, वैसे ही जैसे सत्रह साल की उम्र में देता था। हम उसी चट्टान पर बैठ गए।

"तुमने शादी की?" मैंने पूछा, हालाँकि डर रही थी जवाब सुनने से।

"नहीं।" उसने सिर हिलाया। "कैसे करता? मेरा दिल तो यहीं समुद्र किनारे पड़ा था, तुम्हारे साथ।"

"मैंने भी नहीं की।" मैंने कहा। "हर रिश्ते में तुम्हें ढूँढती रही। लेकिन कोई तुम नहीं बन सका।"

हम चुपचाप बैठे रहे, लहरों की आवाज़ सुनते हुए।

"तुम्हारी नानी बहुत समझदार थीं।" आदित्य ने आखिरकार कहा। "उन्हें पता था कि हम दोनों ने अपनी ज़िंदगी उस एक गर्मी की यादों में रोक रखी है। उन्होंने तुम्हें यहाँ इसलिए बुलाया ताकि हम या तो आगे बढ़ सकें, या..."

"या?" मैंने पूछा।

"या फिर से शुरू कर सकें।"

मेरा दिल धक से रुक गया।

अगले दिन से, आदित्य रोज सुबह आने लगा। हम साथ चाय पीते, साथ टहलते, और धीरे-धीरे तीस साल का फासला कम होने लगा। मैंने उसे अपने शहरी जीवन के बारे में बताया - बड़ी-बड़ी इमारतें बनाना, पुरस्कार जीतना, लेकिन घर लौटकर खालीपन महसूस करना। उसने मुझे बताया कि कैसे उसने गाँव के स्कूल में पढ़ाना शुरू किया, बच्चों को गणित सिखाया, और हर शाम समुद्र किनारे बैठकर सूरज को ढलते देखा।

"क्या तुम्हें कभी अफसोस हुआ?" मैंने एक दिन पूछा। "कि तुमने शहर नहीं गए, बड़ी ज़िंदगी नहीं जी?"

उसने मुस्कुराते हुए कहा, "बड़ी ज़िंदगी क्या होती है, मीरा? मैंने बच्चों को पढ़ाया, उनकी ज़िंदगी बदली। हर सुबह समुद्र देखा, हर शाम सूरज को डूबते देखा। मेरे पास सब कुछ था, सिवाय तुम्हारे।"

दसवें दिन, मैं नानी की डायरी पढ़ रही थी। पीछे के पन्नों में उनकी अंतिम प्रविष्टि थी:

"मीरा, मैंने तुझे कभी नहीं बताया, लेकिन जिस दिन तू गाँव छोड़कर गई, आदित्य यहाँ आया था। रोता हुआ। उसने कहा - 'नानी जी, मुझे मीरा की सारी चिट्ठियों का जवाब देने का मन करता है, लेकिन अगर मैंने दिया तो वो वापस आ जाएगी। और मैं नहीं चाहता कि वो अपने सपने मेरे लिए तोड़े।'

मैंने उससे कहा - 'बेटा, सच्चा प्यार इंतज़ार करना जानता है।'

और वो लड़का तीस साल इंतज़ार करता रहा। हर दिन। हर पल।

मीरा, मैं तुझे वापस इसलिए नहीं बुला रही कि तू अपनी ज़िंदगी छोड़े। मैं तुझे इसलिए बुला रही हूँ ताकि तू समझ सके कि असली ज़िंदगी क्या है। बड़ी इमारतें बनाना अच्छा है, लेकिन अपने दिल का घर खाली छोड़ना - यही सबसे बड़ी गलती है।"

मैं डायरी लेकर दौड़ती हुई समुद्र किनारे गई। आदित्य वहीं था, चट्टान पर।

"तुमने तीस साल इंतज़ार किया?" मैं रोते हुए बोली।

उसने मुझे देखा। "हर दिन।"

"क्यों?"

"क्योंकि कुछ लोग एक बार मिलते हैं और ज़िंदगी भर के लिए दिल में बस जाते हैं। तुम मेरी वो शख्स थी, मीरा। मैं सौ ज़िंदगी जीता, हर ज़िंदगी में तुम्हारा इंतज़ार करता।"

मैं उसके पास गई और पहली बार तीस साल में, उसका हाथ पकड़ा। "मैं एक बेवकूफ थी। मैंने सोचा कि बड़े शहर में खुशी मिलेगी। लेकिन खुशी तो यहीं थी, तुम्हारे साथ, इस समुद्र किनारे।"

"तो अब?" उसने पूछा।

"अब मैं नहीं भागूँगी।" मैंने कहा। "मैं यहीं रहूँगी। तुम्हारे साथ। अगर तुम चाहो तो।"

उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया, और तीस साल का दर्द एक पल में पिघल गया।

अगले बीस दिन ऐसे गुज़रे जैसे हम फिर से सत्रह के हो गए हों। हम हर सुबह साथ टहलते, हर शाम साथ बैठते। मैंने उसे अपनी इमारतों के डिज़ाइन दिखाए, उसने मुझे अपने बच्चों की कॉपियाँ दिखाईं। हम हँसे, रोए, और धीरे-धीरे वो बन गए जो हमें तीस साल पहले बनना चाहिए था - एक दूसरे के।

तीसवें दिन, मैंने अपने शहर के ऑफिस को फोन किया। "मैं वापस नहीं आऊँगी। मैंने घर ढूँढ लिया है।"

उस शाम, समुद्र किनारे, आदित्य ने मेरे हाथ में एक छोटा सा डिब्बा रखा। "ये तीस साल पहले खरीदा था। सोचा था उस आखिरी शाम को तुम्हें देंगे, तुम अचानक चली गई।"

मैंने डिब्बा खोला। एक सादी सी अंगूठी, जिसपर समुद्र की लहर बनी थी।

"क्या तुम मुझसे शादी करोगी, मीरा? तीस साल देर से ही सही?"

मैंने हँसते-रोते हुए हाँ कहा।

आज, पाँच साल बाद, मैं उसी घर में रहती हूँ। मैंने गाँव के लिए एक सामुदायिक केंद्र डिज़ाइन किया, एक छोटी लाइब्रेरी, और स्कूल के बच्चों के लिए एक खूबसूरत कला कक्ष। आदित्य अभी भी पढ़ाता है, और हम अभी भी हर सुबह साथ समुद्र किनारे टहलते हैं।

कभी-कभी मुझे अपने शहरी दोस्त कहते हैं - "तुमने अपना करियर छोड़ दिया, पछतावा नहीं होता?"

मैं मुस्कुराती हूँ। मैंने कुछ नहीं छोड़ा। मैंने वो पाया जो मैं तीस साल से खोज रही थी।

क्योंकि सबसे बड़ा घर वो नहीं जो तुम बनाते हो। सबसे बड़ा घर वो है जो तुम्हारे दिल में होता है। और मेरा घर हमेशा से यहीं था - इस समुद्र किनारे, आदित्य के साथ।

नानी ठीक कहती थीं। कभी-कभी तुम्हें अपनी जड़ों पर लौटना पड़ता है, ताकि तुम सही मायने में उड़ सको।

और अब मैं उड़ती हूँ - हर दिन, उसके प्यार में, उस ज़िंदगी में जो मुझे तीस साल पहले मिलनी चाहिए थी।

रेत ने याद दिलाया - प्यार कभी देर से नहीं आता। वो बस इंतज़ार करता है, सही वक्त का।
 
 समाप्त

लेखक की बात: इस कहानी को पढ़ने के लिए धन्यवाद।

यह कहानी उन सभी के लिए है जो मानते हैं कि प्यार कभी देर से नहीं आता, बस सही समय का इंतज़ार करता है। जो समझते हैं कि सफलता सिर्फ बड़े शहरों और बड़े पदों में नहीं, बल्कि अपने दिल की आवाज़ सुनने में है।

कभी-कभी हमें अपनी जड़ों पर लौटना पड़ता है, ताकि हम सही मायने में समझ सकें कि हम कहाँ हैं और कहाँ होना चाहते हैं।

मीरा और आदित्य की कहानी हमें याद दिलाती है कि कुछ रिश्ते समय से परे होते हैं। कुछ प्यार इतने गहरे होते हैं कि तीस साल की दूरी भी उन्हें मिटा नहीं सकती।

अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई, तो इसे अपने उन दोस्तों और परिवार के साथ साझा करें जो प्यार, इंतज़ार, और दूसरे मौके में विश्वास करते हैं।

क्योंकि हर दिल में एक कहानी छुपी होती है। हर समुद्र किनारे एक याद बसी होती है। और हर प्यार एक मौका चाहता है।

यह कहानी आपकी है। इसे अपने दिल में रखें।