शहर की चकाचौंध से दूर, एक पुराने और टूटे हुए मकान में अंजलि अपनी बीमार माँ के सिरहाने बैठी रो रही थी। डॉक्टर ने साफ़ कह दिया था कि अगर तीन दिन के अंदर माँ का ऑपरेशन नहीं हुआ, तो उन्हें बचाना नामुमकिन होगा।
ऑपरेशन का खर्चा— पाँच लाख रुपये।
एक अनाथ लड़की, जो दूसरों के घरों में ट्यूशन पढ़ाकर बमुश्किल अपना घर चलाती थी, उसके लिए पाँच लाख रुपये किसी पहाड़ की चोटी को छूने जैसा था।
"भगवान, मैं कहाँ से लाऊँ इतने पैसे? कोई तो रास्ता दिखाओ," अंजलि ने सिसकते हुए ऊपर वाले से गुहार लगाई।
तभी उसकी सहेली रिया का फोन आया। रिया ने उसे एक बड़े बिज़नेसमैन 'रुद्र प्रताप सिंह' के बारे में बताया, जो अक्सर जरूरतमंदों की मदद करते थे। लेकिन रिया की आवाज़ में एक अजीब सा डर था, "अंजलि, वो मदद तो करेंगे... पर सुना है रुद्र प्रताप सिंह बिना किसी 'कीमत' के कुछ नहीं करते। उनके पास जाने का मतलब है आग से खेलना।"
अंजलि के पास सोचने का वक्त नहीं था। माँ की आखिरी उम्मीद वही थी।
अगले ही पल, अंजलि रुद्र प्रताप सिंह के आलीशान बंगले के बाहर खड़ी थी। भारी दरवाज़ा खुला और सामने काली शर्ट पहने, आँखों में एक अजीब सी सख्ती और चेहरे पर राजसी अहंकार लिए रुद्र खड़ा था।
अंजलि ने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, "मुझे... मुझे मदद चाहिए। मेरी माँ की जान दांव पर है।"
रुद्र ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और एक ठंडी मुस्कान के साथ बोला, "पाँच लाख रुपये मिल जाएंगे। लेकिन बदले में तुम्हें एक साल तक मेरी 'शर्तों' पर रहना होगा। बिना सवाल किए, बिना किसी शिकायत के। क्या तुम्हें यह सौदा मंजूर है?"
अंजलि की रूह कांप गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह मदद है या उसकी बर्बादी की शुरुआत। लेकिन पीछे मुड़कर देखा तो अस्पताल का बिस्तर और माँ की धुंधली आँखें थीं।
"मंजूर है," अंजलि ने भारी मन से कहा। उसे नहीं पता था कि उसने पैसों के लिए नहीं, बल्कि अपनी ज़िंदगी का सौदा कर लिया था।
पहली शर्त
अंजलि ने जैसे ही 'मंजूर है' कहा, उसे लगा जैसे उसके गले में किसी ने अदृश्य फंदा कस दिया हो। रुद्र की आँखों में एक अजीब सी चमक आई— जीत की चमक।
उसने अपनी मेज की दराज से एक चेक निकाला, उस पर पाँच लाख की रकम भरी और अंजलि की ओर बढ़ा दिया। "यह लो। तुम्हारी माँ के ऑपरेशन के लिए। लेकिन याद रखना अंजलि, अब तुम इस दहलीज के बाहर कदम तभी रखोगी जब मैं चाहूँगा।"
अंजलि ने कांपते हाथों से चेक लिया। उसकी आँखों से आँसू गिरकर उस चेक पर पड़े। वह बिना कुछ बोले मुड़ी, लेकिन रुद्र की भारी आवाज़ ने उसे वहीं रोक दिया।
"रुको! सौदा अभी पूरा नहीं हुआ है। मेरी पहली शर्त अभी बाकी है।"
अंजलि धीरे से पलटी। "जी... क्या शर्त है?"
रुद्र धीरे-धीरे चलकर अंजलि के बिल्कुल करीब आ गया। उसके महंगे परफ्यूम की खुशबू अंजलि के नथुनों से टकराई, जो इस वक्त उसे डरा रही थी। रुद्र ने उसके चेहरे के पास झुककर कहा, "आज रात से तुम इस आलीशान बंगले के किसी कमरे में नहीं, बल्कि पिछवाड़े बने उस छोटे से स्टोर रूम में रहोगी। और याद रहे, सूरज ढलने के बाद तुम इस घर की चारदीवारी के अंदर नहीं दिखनी चाहिए। तुम यहाँ सिर्फ मेरी एक 'परछाई' बनकर रहोगी, जिसे कोई देख न सके।"
अंजलि सन्न रह गई। "लेकिन... इतना बड़ा बंगला है, तो स्टोर रूम क्यों?"
रुद्र ने उसके बालों की एक लट को अपनी उंगली पर लपेटा और सख्ती से कहा, "सवाल मत करो अंजलि! यह पहली शर्त है। तुम्हें खुद को इस दुनिया से और यहाँ आने वाले मेहमानों से छिपाकर रखना होगा। तुम मेरी वो सच्चाई हो जिसे मैं दुनिया को नहीं दिखाना चाहता।"
अंजलि की आँखों में अंधेरा छाने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि रुद्र उसे छिपाना क्यों चाहता है? क्या इस बंगले की दीवारों के पीछे कोई ऐसा राज़ है जिसे रुद्र दुनिया से छिपा रहा है? या फिर अंजलि सिर्फ उसके किसी बड़े खेल का एक मोहरा है?
रात हुई। अंजलि उस सीलन भरे स्टोर रूम में अकेली बैठी थी। तभी उसे बंगले के मुख्य हिस्से से किसी के चिल्लाने और कांच टूटने की आवाज़ आई। वह डरकर खड़ी हो गई।
क्या रुद्र प्रताप सिंह के उस आलीशान बंगले में कोई और भी था?
लेखिका का नोट
"दोस्तों, क्या रुद्र अंजलि को किसी बड़े खतरे से बचा रहा है या उसे किसी मुसीबत में डाल रहा है? अंजलि को उस रात स्टोर रूम में क्या सुनाई दिया? जानने के लिए अगला Chapter का इंतज़ार करें! अगर कहानी पसंद आ रही है, तो कृपया 'Review' दें और मुझे फॉलो करें।"