चेकपोस्ट:चाणक्य - 2 Ashish jain द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

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चेकपोस्ट:चाणक्य - 2

अध्याय २: रिकवरी मोड और अक्षय खन्ना वाली एक्टिंग

द मुहाना ऑपरेशन्स: 'रडार' से 'इंटरसेप्टर' तक
जैसे ही आशीष जैन अपनी एक्टिवा को गली के मुहाने पर मोड़ते हैं, फ़िज़ाओं में एक सनसनी फैल जाती है। चाणक्य, जो अभी तक एक पुराने 'काले बोरे' की तरह मिट्टी में निढाल पड़ा था, अचानक सक्रिय हो जाता है। उसके कान, जो दिखने में भले ही गधे जैसे लंबे हों, असल में वो ३६० डिग्री घूमने वाले सोफेस्टिकेटेड सेंसर हैं। वो हवा की गति, एक्टिवा के टायर का घर्षण और आशीष भाई के परफ्यूम की खुशबू को एक साथ स्कैन करते हैं।
जैसे ही आशीष मुहाने पर 'एंट्री' मारते हैं, चाणक्य अपनी गर्दन को झटके से पीछे घुमाता है। यह वो पल होता है जब उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आती है—वैसी ही शातिर चमक, जैसी फिल्म 'इत्तेफाक' में अक्षय खन्ना की आँखों में कातिल को ढूंढते वक्त होती है। वह एक पल के लिए आशीष की तरफ देखता है, मानो कह रहा हो, "आ गए मिस्टर जैन? हम तो आपके बिस्किटों की राह में अपनी पलकें (और कान) बिछाए बैठे थे।"
जादुई रिकवरी: बुढ़ापा गया तेल लेने!
अगले ही पल, एक चमत्कार होता है। वह कुत्ता जो अभी तक अपनी कमर सीधी नहीं कर पा रहा था, अचानक 'रिकवरी मोड' में आ जाता है। उसके अंदर की 'बुढ़ापे वाली थकान' ऐसे गायब होती है जैसे किसी पुरानी खटारा गाड़ी में नाइट्रो बूस्टर लग गया हो। वह "सर्रर्र" से भागकर सड़क के बीचों-बीच ऐसी पोज़ीशन लेता है जैसे किसी बॉर्डर पर 'इमरजेंसी नाकाबंदी' कर दी गई हो।
यह चाणक्य का 'सिग्नेचर स्टेप' है। वह जानता है कि अगर वह किनारे खड़ा रहेगा, तो आशीष भाई शायद हाथ हिलाकर निकल जाएं। इसलिए वह सीधे 'नो-गो ज़ोन' में खड़ा हो जाता है। आशीष भाई को ब्रेक मारनी ही पड़ती है। एक्टिवा के रुकते ही, शुरू होता है दुनिया का सबसे बड़ा 'वन-मैन ड्रामा शो'।
अक्षय खन्ना का बाप: द ग्रेट 'कु-कु' ट्रेजेडी
आशीष भाई जैसे ही गाड़ी रोकते हैं, चाणक्य अपनी 'बिस्किट कूटनीति' का ब्रह्मास्त्र निकालता है। वह अक्षय खन्ना की तरह अपने चेहरे की मांसपेशियों को सिकोड़ता है, आँखों में आंसू (नकली ही सही) लाता है और एक ऐसी आवाज़ निकालता है— "कु-कु... कु-कु..."।
भाई साहब, यह आवाज़ साधारण नहीं है। इसमें मदर इंडिया का दुख, शोले की बेबसी और अक्षय खन्ना के उन किरदारों की शातिर मासूमियत घुली होती है जहाँ वो चुपचाप रहकर ही सामने वाले का गेम बजा देते हैं। आशीष अक्सर अपनी बीवी से कहते हैं, "अरे ये साला अक्षय खन्ना का भी बाप है एक्टिंग में! अगर ये मुंबई चला जाए, तो नवाजुद्दीन सिद्दीकी की छुट्टी कर दे!" चाणक्य की इस "कु-कु" में ऐसा दर्द होता है मानो उसने पिछले दस सालों से अन्न का दाना न देखा हो। वह अपना सिर थोड़ा तिरछा करता है, एक कान को नीचे झुकाता है और आशीष को ऐसे देखता है जैसे वो आशीष जैन न होकर कोई 'मसीहा' हों जो सीधे स्वर्ग से पारले-जी के पैकेट लेकर अवतरित हुए हैं।
मार्केटिंग गुरु: इमोशनल ब्लैकमेल का मास्टरक्लास
आशीष जैन दिल के बहुत साफ़ इंसान हैं, वो जानते हैं कि यह सब शुद्ध 'मार्केटिंग' है। उन्हें पता है कि अभी १० मिनट पहले चाणक्य ने पड़ोस वाली दुकान से कुछ न कुछ झपटा होगा। लेकिन चाणक्य की एक्टिंग इतनी 'कन्विंसिंग' होती है कि आशीष भाई का तर्क (Logic) फेल हो जाता है।
चाणक्य आशीष के पैर के पास आकर बैठ जाता है और धीरे से अपना सिर एक्टिवा के फ्लोरबोर्ड पर टिका देता है। यह वह मास्टर स्ट्रोक है जिसे अक्षय खन्ना अपनी सस्पेंस फिल्मों में इस्तेमाल करते हैं—सामने वाले को पूरी तरह इमोशनल कर दो ताकि वो अपनी सुरक्षा (जेब) भूल जाए। चाणक्य का चेहरा चिल्ला-चिल्लाकर कहता है— "आशीष भाई, इस दुनिया में कोई किसी का नहीं है, सिवाय आपके और उस सुनहरे बिस्किट के! लाओ भाई हफ्ता, बुढ़ापा काट रहा हूँ!"

क्लाइमेक्स: हाथ सीधा पॉकेट में!
अंत में, वही होता है जो चाणक्य की स्क्रिप्ट में लिखा होता है। आशीष जैन मुस्कुराते हैं, अपना सिर हिलाते हैं और उनका हाथ सीधा एक्टिवा की डिक्की या अपनी पॉकेट की ओर बढ़ जाता है। जैसे ही बिस्किट के पैकेट की पन्नी की 'कड़कड़ाहट' होती है, चाणक्य की "कु-कु" वाली आवाज़ अचानक बंद हो जाती है।
उसकी आँखों में अब वो अक्षय खन्ना वाला 'मिशन अकाम्प्लिश्ड' वाला भाव आ जाता है। वह जानता है कि शिकार फंस चुका है। आशीष जैन बिस्किट का पैकेट निकालते हैं, और चाणक्य अपनी पलटन को 'म्यूट' इशारा करता है— "खड़े हो जाओ लड़कों, हफ्ता आ गया है!" आशीष को पता है कि वो लूट रहे हैं, पर चाणक्य की उस 'शातिर मासूमियत' के आगे वो खुशी-खुशी लुटने को तैयार हो जाते हैं।