ख़ौफ़ और तबाही - 1 Md Siddiqui द्वारा क्राइम कहानी में हिंदी पीडीएफ

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ख़ौफ़ और तबाही - 1

यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है। इसमें दर्शाए गए सभी पात्र, स्थान और घटनाएँ कल्पना पर आधारित हैं। किसी भी वास्तविक व्यक्ति स्थान या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है।

अंधकार का साम्राज्य और आगमन


अंधकारनंद केवल एक नाम नहीं था वह डर की ऐसी भाषा था जिसे समझने के लिए शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती थी उसकी आँखों में बुद्धि थी दिमाग़ में राजनीति और हाथों में पूरा साम्राज्य वह तीनों भाइयों में सबसे शांत दिखने वाला लेकिन सबसे ख़तरनाक था क्योंकि वह कभी ग़ुस्से में नहीं मारता था वह सोच‑समझ कर नस काटता था उसके दो छोटे भाई विनाशराज अघोर और कालसिंह तिमिरगहन खुलेआम आतंक थे जिनके नाम से गाँव खाली हो जाते थे जिनके कदमों की आवाज़ से औरतें दरवाज़े बंद कर लेती थीं और मर्द ज़मीन की तरफ़ देखने लगते थे।
तीनों भाइयों का साम्राज्य इतना बड़ा था कि उसकी सीमा पर सूरज भी डर कर देर से निकलता था एक हज़ार की निजी सेना गोला‑बारूद के भंडार तोपें, बंदूकें और इंसानों से भी सस्ता समझा जाने वाला इंसान अगर साम्राज्य को मज़दूर चाहिए होते तो सेना सीधे गाँवों पर टूट पड़ती घर जलते चीख़ें गूंजतीं और जो झुकता नहीं था वह अगली सुबह दिखाई नहीं देता था बच्चे भविष्य होते थे इसलिए उन्हें जीने नहीं दिया जाता था ताकि कोई बदला लेने वाला पैदा न हो।
हज़ार मज़दूरों को जंजीरों में बाँधकर साम्राज्य लाया जाता पत्थर तोड़वाए जाते महल खड़े करवाए जाते रात‑दिन एक कर दिया जाता और जो सिर उठाता उसका सिर उदाहरण बना दिया जाता विनाशराज अघोर इस काम में सबसे आगे था उसे मारने में मज़ा आता था वह हँसते‑हँसते मौत बाँटता था जबकि कालसिंह तिमिरगहन चुप रहता था लेकिन जब वार करता था तो पूरा इलाक़ा ख़ामोश हो जाता था।
इसी अंधेरे में उसी साम्राज्य से दूर एक छोटे से कस्बे में हीरो वीरान रहता था साधारण कपड़े तीखी आँखें और ज़िंदा रहने का अजीब सा मज़ाकिया अंदाज़ वह हालात पर हँसना जानता था शायद इसलिए क्योंकि रोना बहुत पहले छोड़ चुका था उसी कस्बे में एक लड़की जोया थी तेज़ बोलने वाली हिम्मती और डर से नफ़रत करने वाली दोनों की नोक‑झोंक से ही मोहब्बत शुरू हुई जहाँ वह कहती थी तुम बहुत बोलते हो और वह जवाब देता था क्योंकि चुप रहने वाले ही सबसे पहले मारे जाते हैं।
कॉमेडी तब पैदा होती थी जब मौत पास होती थी, और यही उनकी मोहब्बत की पहचान थी।
एक दिन वही कस्बा विनाशराज अघोर की नज़र में आ गया सेना आई आग लगी और उसी आग में हीरो का सब कुछ जल गया लेकिन वह नहीं जला उस रात उसने पहली बार डर के बजाय ग़ुस्सा चुना और उसी रात अंधकारनंद ने दूर अपने महल में शतरंज की चाल चली विनाशराज को भेजो ज़्यादा शोर मचाने लगा है।
विनाशराज अघोर को अंदाज़ा नहीं था कि जिस आदमी को वह मामूली समझ रहा है वही उसका अंत लिखेगा।
अंतिम टकराव में कोई भाषण नहीं था कोई दया नहीं थी बस एक सीधा हिसाब था डर बनाम हिम्मत और जब धूल बैठी विनाशराज अघोर ज़मीन पर पड़ा था उसकी हँसी हमेशा के लिए ख़ामोश हो चुकी थी।
दूर महल में अंधकारनंद ने मोहरा गिराया मुस्कराया और कहा 
अब खेल शुरू हुआ है

लेकिन उसी खेल की पहली क़ुर्बानी उसी रात लिख दी गई क्योंकि विनाशराज अघोर जिसने मौत को खिलौना समझा था उसी मौत के सामने पहली बार बेबस खड़ा था वीरान की आँखों में न कोई भाषण था न दया सिर्फ़ हिसाब था और एक ही वार में विनाशराज अघोर का आतंक हमेशा के लिए ख़ामोश हो गया उसका नाम उसकी हँसी और उसका डर उसी मिट्टी में मिल गया जिसे वह रौंदता फिरता था।
आग की राख के बीच खड़ा था वीरान अब सिर्फ़ एक आम आदमी नहीं बल्कि शुरुआत और उसके पास खड़ी थी ज़ोया जिसने पहली बार बिना डर उसके हाथ को थामा जहाँ न मज़ाक था न हँसी सिर्फ़ एक वादा था कि यह लड़ाई यहीं नहीं रुकेगी।
दूर कहीं अंधकारनंद की आँखों में हल्की सी चमक आई और कालसिंह तिमिरगहन की ख़ामोशी और गहरी हो गई क्योंकि साम्राज्य ने अपना पहला खून खो दिया था और असली युद्ध अब शुरू होने वाला था