यशस्विनी - 33 Dr Yogendra Kumar Pandey द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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यशस्विनी - 33

विवेक और प्रज्ञा

आश्रम के प्रवेश द्वार के पास बने आगंतुक कक्ष में विवेक के पहचान पत्र की जांच की गई। विवेक को इस आश्रम में पहुंचकर एक दिव्य शांति का अनुभव हुआ। थोड़ी देर बाद एक साधक पास आया।उसने विवेक को पूरे आश्रम क्षेत्र का भ्रमण कराया। इस आश्रम के लगभग हर क्षेत्र से पार्श्व में हिमालय पर्वत दिखाई देता है।अब शाम होने वाली है और धीरे-धीरे हिमालय के श्वेत धवल शिखर एक गहरे स्याह आवरण में परिवर्तित हो रहे हैं। हिमालय क्षेत्र की ठंडक अब धीरे-धीरे तीव्रता से महसूस हो रही है।पहाड़ों के मध्य एक स्थान पर विशाल साधना कक्ष बना हुआ है, तो थोड़ी ऊंचाई पर साधकों के रहने के लिए अनेक कक्ष।एक ऊंचाई वाली जगह पर भगवान श्री बद्रीनाथ का एक छोटा मंदिर है जहां वे मां लक्ष्मी के साथ विराजित हैं,तो इसके ठीक पीछे अपेक्षाकृत नीचे एक समतल जगह पर पाकशाला है। पाकशाला के पीछे औषधालय है, तो इसी के साथ लगा हुआ औषधि वन है, जहां अनेक तरह के औषधीय पौधे दिखाई दे रहे हैं। आचार्य जी का गुफायुक्त कक्ष दूर से ही पहचान में आ जाता है। यहां के प्रवेश द्वार के पास एक साधक नियुक्त है।इस भवन के बाह्य उपरी भाग में हरे राम, हरे राम, राम राम हरे - हरे, हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण- कृष्ण, हरे - हरे का बीज मंत्र उकेरा हुआ है।बैठक कक्ष में भगवान श्री कृष्ण के अर्जुन को गीता उपदेश देने की घटना की एक  सुंदर कलाकृति दीवार पर टंगी है।ज्ञात हुआ कि आचार्य जी अभी निज साधना कक्ष में ध्यानरत हैं। विवेक उस साधक के साथ बाहर निकले।एक स्थान पर विशाल प्रयोगशाला थी। इसका द्वार बाहर से बंद है लेकिन खिड़की से कक्ष के भीतर झांकने पर भौतिकी के अनेक उपकरण दिखाई दे रहे हैं।यहां के पुस्तकालय में पहुंचकर विवेक चमत्कृत हो गया। एक आश्रम में हजारों पुस्तकें इतने व्यवस्थित ढंग से रखी हुई हो सकती हैं, यह उसने सोचा भी नहीं था। विवेक पुस्तकालय के भीतर गया।

          पुस्तकालय में चार-पांच साधक अनेक ग्रंथों का अध्ययन कर रहे हैं।एक कुर्सी पर एक सुंदर नवयुवती बैठी हुई है।उसके मुख पर दिव्य आभा है।उसका ध्यान किताबों से अधिक अपने मोबाइल फोन पर है। उसने विवेक के साथ चल रहे साधक से पूछा,"क्या यहां मोबाइल फोन का टावर काम नहीं करता?"  

      "नहीं देवी!यहां मोबाइल टावर काम नहीं करता और अगर कभी नेटवर्क आता- जाता भी है तो इससे यहां कोई अधिक फर्क नहीं पड़ता।"साधक ने उत्तर दिया।

उस युवती ने कहा,"फिर आप लोग कम्युनिकेट कैसे कर पाते हैं दुनिया से?"

  तभी एक गंभीर आवाज गूंजी,"पुत्री इसकी आवश्यकता ही नहीं होती,क्योंकि यहां वे लोग आते हैं जो सत्य की खोज में हैं,जो शांति की खोज में हैं,जो इस बाहरी दुनिया की उथल-पुथल और अति यांत्रिक होते जा रहे साजो समान से मुक्ति का कोई तरीका ढूंढना चाहते हैं।"

      यह सुनकर पहले से पुस्तकें पढ़ रहे साधकों ने उठकर उस व्यक्ति को प्रणाम किया। गेरुए वस्त्रधारी वे व्यक्ति स्वामी मुक्तानंद थे।वे दो तीन दिनों के अपने प्रवास के बाद आश्रम लौट चुके थे और संयोग से सीधे पुस्तकालय क्षेत्र में थे।

"प्रणाम स्वामी जी!"विवेक और उस युवती ने एक साथ हाथ जोड़कर कहा।

मुस्कुराते हुए स्वामी जी ने कहा "आशीर्वाद!तो आप दोनों यहां पहुंच गए हैं।स्वागत है आप दोनों का। आप प्रज्ञा हैं? जनवाणी टीवी चैनल की रिपोर्टर?"

"जी स्वामी जी!"प्रज्ञा ने आश्चर्य मिश्रित भाव से कहा।

"और आप विवेक हैं। साइंस ग्रेजुएट, आचार्य सत्यव्रत ने आपको विशेष रूप से आपके मन में उमड़ - घुमड़ रहे प्रश्नों के समाधान के लिए भेजा है।"स्वामी जी ने हंसते हुए विवेक से कहा।

"सत्य स्वामी जी, पर आपने कैसे अनुमान लगा लिया?"विवेक ने जिज्ञासावश पूछा।"

"भाई सत्यव्रत ने मुझ तक सूचना भिजवा दी थी। मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था। अगर उन्होंने सूचना नहीं भिजवाई होती तो भी मुझे विश्वास था कि तुम अवश्य आओगे।"

स्वामी मुक्तानंद ने कहा।

        आश्चर्य मिश्रित भाव से विवेक ने धन्यवाद दिया। अब प्रज्ञा ने स्वामी जी से प्रश्न किया," पर मैं तो बिना सूचना के आई हूं स्वामी जी! आपने मेरा नाम ठीक-ठीक कैसे ज्ञात कर लिया?"

      मुस्कुराकर स्वामी जी ने कहा,"अब आप लोग सारे प्रश्नों के उत्तर अभी ज्ञात कर लेंगे या यहां रुक कर समझने की कोशिश करेंगे?"

प्रज्ञा झेंप गई। उसने कहा,"जो आज्ञा स्वामी जी! मैं यहां कुछ दिन रुकूंगी और मेरे चैनल द्वारा दिए गए विशेष टास्क को पूरा करूंगी।"

  "मैं जानता हूं प्रज्ञा! तुम जाना तो चाहती थी पश्चिम एशिया जहां हमास और इजरायल के बीच चल रहे युद्ध को तुम्हें कवर करना था, लेकिन तुम आ गई हो इस ऐसी जगह पर जहां इतनी शांति है कि यह शांति सुबह कभी-कभी चिड़ियों की चहचहाहट से ही टूटती है।"स्वामी जी ने धीर गंभीर वाणी में कहा।

   "सत्य कहा स्वामी जी!वह संघर्ष क्षेत्र दुनिया के कुछ सबसे पुराने अनसुलझे संघर्षों में से एक है,जहां हर पक्ष कहता है कि वह सही है और दूसरा गलत।जहां एक तरफ के हमले में निर्दोष बूढ़ों,बच्चों और महिलाओं को मृत्यु, अमानुषिक पीड़ा और युद्ध यातना - प्रताड़ना झेलनी पड़ती है तो दूसरी ओर की जवाबी कार्यवाही की चपेट में आतंकवादियों और युद्ध लड़ाकुओं के साथ-साथ पहले पक्ष की भी अनेक माताएं अपने बच्चों को खो देती हैं और विधवा हो जाती हैं। ऐसे युद्धों में दोनों और भारी विध्वंस होता है।"प्रज्ञा ने अपने मन की व्यथा व्यक्त की और एक तरह से इस आश्रम में आने का उद्देश्य भी बता दिया।

      अब स्वामी जी ने विवेक की ओर देखा,मानो कहना चाहते हों, आप भी कह लीजिए।

विवेक ने संक्षेप में कहा,"मेरी चिंता ऐसे युद्ध के क्षेत्र में बार-बार होते मानवाधिकारों के उल्लंघन और विशेष रूप से समाज में नारियों पर भोग की मानसिकता रखने वाले लोगों के कुकृत्यों के किसी स्थाई समाधान को लेकर है।"

      स्वामी जी,"मैं समझ गया विवेक! लेकिन अभी आप लोग अपने- अपने कक्षों में विश्राम करें।इन स्थितियों पर भी आगे चर्चा अवश्य होगी और आप लोग कोई न कोई समाधान जरूर प्राप्त करेंगे।"

स्वामी मुक्तानंद पुस्तकालय से वापस जा चुके थे।इस आश्रम में केवल पुरुष साधक रहते हैं।वे गुरु मुक्तानंद के मार्गदर्शन में योग साधना का अभ्यास करते हैं।ऐसा नहीं है कि यहां की आश्रम व्यवस्था को नारियों की उपस्थिति से कोई परहेज है या उनके यहां आने पर मनाही है या वे उन्हें साधना पथ में बाधक समझते हैं पर यहां की कठोर दिनचर्या और दुर्गम भौगोलिक स्थिति को देखते हुए सामान्य तौर पर उन्हें कुछ ही दिनों रहने की अनुमति मिलती है। विभिन्न विश्वविद्यालयों की महिला शोधार्थी और सार्वजनिक क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहीं अनेक महिलाएं यहां समय-समय पर आती हैं और अपना कार्य पूरा कर या संबंधित शोध के बारे में जानकारी इकट्ठा कर वे लौट जाती हैं। 

क्रमशः 

योगेंद्र