नेहरू फाइल्स - भूल-108-109 Rachel Abraham द्वारा पत्रिका में हिंदी पीडीएफ

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नेहरू फाइल्स - भूल-108-109

[ 11. अक्खड़पन, दूसरों के साथ गलत व्यवहार ]

भूल-108 
मामूली अकादमिक उपलब्धियाँ, 
महत्त्वपूर्ण मुद्दों की शोचनीय जानकारी, फिर भी... 

“उसे कुछ नहीं पता, फिर भी वह सोचता है कि वह सब कुछ जानता है। यह स्पष्ट रूप से उसके राजनीतिक कॅरियर को दरशाता है।” 
—जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, मेजर बारबरा 

एक तरफ जहाँ नेहरू की अकादमिक उपलब्धियाँ बेहद मामूली थीं, वहीं दूसरी तरफ महत्त्वपूर्ण मामलों को लेकर उनकी जानकारी तथा समझ और भी अधिक शोचनीय थी, जो उनकी नीतियों के कुल नतीजों से पूरी तरह से स्पष्ट है। इसके बावजूद उन्होंने जिस प्रकार से खुद को प्रस्तुत किया, दूसरों को नीचा दिखाया, वह बिल्कुल ऐसे था, जैसे वे सबसे प्रतिभाशाली, सर्वज्ञानी और सबसे बुद्धिमान नेता हों। 
वे एक स्नातक थे और उन्होंने बार की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। एम.जे. अकबर ‘नेहरू : द मेकिंग अ‍ॉफ इंडिया’ में लिखते हैं— 
“आखिरकार, जब वे (जवाहरलाल) दूसरी कक्षा की अर्धवार्षिक परीक्षा में उत्तीर्ण हुए तो मोतीलाल ने शानदार आयोजन किया। मोतीलाल को इस बात का पूरा भरोसा था कि उनका बेटा अनुत्तीर्ण होगा, इसलिए ऐसा औसत परीक्षा परिणाम भी उत्सव की वजह बना। मोतीलाल दिल से चाहते थे कि उनका बेटा भारतीय सिविल सेवा में जाए। वे आई.सी.एस. को ‘दुनिया की सबसे श्रेष्ठ सेवा’ कहते थे। लेकिन एक कमजोर द्वितीय (जवाहरलाल नेहरू का स्तर) ने कैंब्रिज के अंत तक मोतीलाल को यह मानने पर मजबूर कर दिया कि उनका बेटा आई.सी.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाएगा। सन् 1911 में उनका (जवाहरलाल नेहरू का) खर्चा 800 पाउंड था, जो एक आम छात्र के तीन साल के खर्चे निकालने के लिए बहुत था।” (अकब./74-77) 

अब इसकी तुलना आंबेडकर के साथ करें तो लंदन में पढ़ाई के दौरान पैसे बचाने के लिए वे अकसर या तो एक समय का भोजन नहीं करते थे या फिर पेट भर भोजन नहीं करते थे। ‘डॉ. आंबेडकर : लाइफ ऐंड मिशन’ (डी.के.) में धनंजय कीर लिखते हैं कि आंबेडकर लंदन में सिर्फ 8 पाउंड प्रतिमाह में गुजारा करते थे! इसका मतलब हुआ—96 पाउंड प्रतिवर्ष। अब इसकी तुलना नेहरू के 800 पाउंड प्रतिवर्ष से करें; और इसमें नेहरू के पिता द्वारा कई अन्य आवश्यकताओं पर किए गए खर्चे शामिल नहीं हैं। आंबेडकर ने ऐसा बाधाओं को पार करते हुए सन् 1912 में बॉम्बेविश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में स्नातक किया। इसके बाद बड़ौदा के महाराजा की छात्रवृत्ति पर वह सन् 1913 में न्यूयॉर्क गए और 1915 में मास्टर अ‍ॉफ आर्ट्स की डिग्री हासिल की। उसके बाद सन् 1916 में कोलंबिया विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट इन फिलॉसफी की। इसके बाद वे लंदन चले गए, जहाँ उन्होंने ग्रेज इन फॉर लॉ और लंदन स्कूल अ‍ॉफ इकोनॉमिक्स (एल.एस.ई.) में दाखिला लिया। उन्होंने एल.एस.ई. से अपना दूसरा डॉक्टरेट पूरा किया और साथ ही वे बैरिस्टर भी बन गए। 

एक तरफ जहाँ नेहरू अपनी स्नातक की पढ़ाई ही पूरी कर पाए, आंबेडकर ने लंदन में अपनी परीक्षा में शीर्ष स्थान हासिल किया। सुभाषचंद्र बोस कैंब्रिज के एक शानदार छात्र थे, जिन्होंने आई.सी.एस. परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली थी। डॉ. राजेंद्र प्रसाद एक महान् विद्वान् थे, जो अपनी कक्षा में हमेशा अव्वल रहते थे। उनके परीक्षक ने एक बार उनकी उत्तर-पुस्तिका पर लिखा—‘परीक्षार्थी परीक्षक से बेहतर है।’ (अरु/159) 

ब्रिगेडियर बी.एन. शर्मा ने लिखा—“अपने पिता के रसूख के बल पर हैरो पब्लिक स्कूल में दाखिला पानेवाले नेहरू पढ़ाई में कभी औसत से बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाए और बाद में भी उनकी कानूनी प्रैक्टिस खराब ही रही। वे कभी भी खुद को ज्ञान की तलाश में या फिर किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए औरों से अलग नहीं कर पाए। नेहरू महानता के लिए ही पैदा हुए थे और इसकी एक बहुत बड़ी वजह थे उनके पिता। हम भारतीय हमेशा से ही गोरी चमड़ी के प्रति कमजोर रहे हैं। नेहरू भारतीय जनमानस की इस कमजोरी के अपरिहार्यलाभार्थी थे।” (बी.एन.एस./7) 

एक ब्रिटिश इतिहासकार एवं राजनीतिक निबंधकार और यू.सी.एल.ए. में इतिहास व समाजशास्त्र के प्रोफेसर पेरी एंडरसन ने लिखा— 
“नेहरू ने उच्‍च शिक्षा का आनंद लिया था, लेकिन गांधी ने नहीं और एक बौद्धिक विकास भी, जो गहन धार्मिक विश्वास के कब्जे में नहीं था। लेकिन इन अनुकूल परिस्थितियों का वह लाभ नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था। ऐसा लगता है कि उन्होंने कैंब्रिज में बहुत कम सीखा; प्राकृतिक विज्ञान में एक औसत डिग्री प्राप्त की, जिसका बाद में कोई नामो-निशान नहीं था। बार परीक्षाओं में उनका प्रदर्शन बेकार था और जब वे अपने पिता के नक्शे-कदम पर चलते हुए कानून की प्रैक्टिस करने आए, तो भी अधिक सफल नहीं रहे। इसकी तुलना सुभाष चंद्र बोस के साथ करें, जो कैंब्रिज में दर्शनशास्त्र के एक प्रतिभाशाली छात्र थे, भारतीय सिविल सेवा की कुलीन परीक्षा को उत्तीर्ण करनेवाले पहले स्थानीय, जिन्होंने बाद में देशभक्ति के चलते इसमें शामिल होने से इनकार दिया, असाधारण है। लेकिन एक उदासीन शुरुआत आनेवाले दिनों में सफल होने के रास्ते में बाधा नहीं बनी और इस बीच नेहरू एक शानदार वक्ता और सफल लेखक बन गए। हालाँकि, वे कभी साहित्यिक स्वाद या मानसिक अनुशासन का स्वाद नहीं चख पाए। उनका सबसे महत्त्वाकांक्षी कार्य ‘डिस्कवरी अ‍ॉफ इंडिया’, जो सन् 1946 में प्रकाशित हुआ, श्वार्मेरी (भावुक उत्साह) का एक स्टीम बाथ है। नेहरू की तुलना आंबेडकर से करना पूरी तरह से अनुचित होगा, क्योंकि आंबेडकर अछूतों के नेता थे, जो अधिकांश कांग्रेस नेताओं से कहीं अधिक ज्ञानी थे और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एवं कोलंबिया में कहीं अधिक प्रशिक्षित थे। आंबेडकर को पढ़ना एक अलग दुनिया में प्रवेश करना है।” (यू.आर.एल.7) 

नेहरू की पुस्तकों में विषयों की सिर्फ सतही जानकारी मौजूद है। आपको उनकी पुस्तकों में उस विषय का कोई आलोचनात्मक मूल्यांकन देखने को नहीं मिलेगा—चाहे वे इतिहास पर हों या राजनीति पर अथवा अर्थशास्त्र पर। नेहरू की पुस्‍तक ‘ग्लिंप्सेस अ‍ॉफ वर्ल्ड हिस्टरी’ में समाजवाद और मार्क्सवाद को समर्पित कई अध्याय मिलेंगे, लेकिन उनमें कहीं भी रूस की दयनीय स्थिति के बारे में एक भी शब्द नहीं मिलेगा। उनका बरताव आलोचनात्मक होने के बजाय रूमानी है। वे मार्क्सवाद की बात करते हैं, लेकिन एडम स्मिथ या अन्यों या फिर उस दौर की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था—अमेरिका—को लेकर कोई विपरीत कवरेज नहीं मिलेगी। उनकी पुस्तकों में प्रतिस्पर्धी विकल्पों का मूल्यांकन और आकलन करने का बहुत कम प्रयास किया गया है। वे मार्क्सवाद पर अपने अध्याय में राज्य के नियंत्रणों और उसके हित के बारे में बात करते हैं, पर कभी भी यह सवाल नहीं उठाते कि राज्य स्वयं माफिया जैसा हो सकता है और सबसे बड़ा शोषक। यह माना जाता है कि राज्य एक अच्छा, न्यायपूर्ण, दयालु एवं करुणा से भरा होगा। इसके अलावा वे उद्यमशीलता, व्यक्तिगत पहल और इस तरह के अन्य महत्त्वपूर्ण कारकों जैसी चीजों को छूते तक नहीं हैं। अर्थव्यवस्था को प्रभावित करनेवाले महत्त्वपूर्णपहलुओं पर समग्र कवरेज के अभाव में उन्हें प्रस्तुत करने का तरीका बेहद सतही प्रतीत होता है। नेहरू ने खुद को इतिहास, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेश नीति का एक छात्र होने जैसी कल्पना की वास्तव में, इन विषयों पारंगत, अपनी लिखी गई पुस्तकों के आधार पर और जिस तरह से उन्होंने उपदेश दिया था। लेकिन दुःख की बात है कि उन्होंने इतिहास के सबक को नजरअंदाज कर दिया, जैसाकि उनकी नीतियों के परिणामों ने साबित किया। 

एम.ओ. मथाई ने लिखा—“सामान्य धारणा के बिल्कुल विपरीत, न तो चर्चिल और न ही नेहरू व्यापक रूप से पढ़े-लिखे लोग थे। उन्होंने अपने जीवन में जितना पढ़ा, उससे कहीं अधिक लिखा और बोला।” (मैक/55)

 रुस्तमजी ने लिखा—“कुछ मौकों पर, जब उन्हें (नेहरू को) कोई कहानी सुनानी होती थी, जैसे किसी रात्रिभोज के मौके पर, तो वे ऐसी अप्रचलित कहानी के साथ सामने आते थे, जिन पर शायद ही किसी को हँसी आए। हालाँकि, वे (नेहरू) कभी-कभार सार्वजनिक बैठकों में बुद्धि और हास्य का प्रयोग करते थे, लेकिन वे भी किशोर वय ही होते थे।” (रुस्त./56) 
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भूल-109 
लॉर्ड वाले तौर-तरीके : गांधीवादी सादगी को अलविदा 

गांधी ने जवाहरलाल नेहरू के बारे में ऐसा कहा था, “वे वही बोलते हैं, जो उनके दिमाग में सबसे ऊपर होता है; लेकिन वे हमेशा करते वही हैं, जो मैं चाहता हूँ। मेरे चले जाने के बाद वे वही करेंगे, जो मैं कर रहा हूँ। तब वे मेरी भाषा भी बोलने लगेंगे।” अगर गांधी स्वर्ग से अपने चेले के कृत्यों को देख रहे होंगे तो वे निश्चित ही चौंक गए होंगे। नेहरू के वफादार रफी अहमद किदवई ने यह कहा था, “जवाहरलाल ने न सिर्फ गांधी का, बल्कि गांधीवाद का भी अंतिम संस्कार कर दिया है।” 

नेहरू—जो हमेशा राजाओं, महाराजाओं, नवाबों व सामंतों के खिलाफ बोलते रहते थे—ने लॉर्ड वाले और सामंती तरीकों को अपनाया और अपने ‘लोकतांत्रिक’ शासन के दौरान बढ़ावा दिया। अपने गुरु की सादगी के बिल्कुल उलट, नेहरू ने वायसरायों जैसे आडंबरपूर्ण आचरण को अपनाया। स्वतंत्रता के बाद गांधीजी ने सुझाव दिया था कि आजाद भारत के गवर्नर जनरल को एक सामान्य आवास में रहना चाहिए, न कि एक विशाल और भव्य वायसराय हाउस में (जिसे बाद में ‘राष्ट्रपति भवन’ का नाम दिया गया), जिसे एक सार्वजनिक अस्पताल में बदल दिया जाना चाहिए। लेकिन नेहरू ने सलाह दी कि एक उपयुक्त वैकल्पिक आवास उपलब्ध नहीं है! भव्यता में वायसराय हाउस के बाद अगर किसी स्थान का नाम आता था तो वह था ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ का निवास, जिसे ‘फ्लैगस्टाफ हाउस’ कहा जाता था। अपने यॉर्क रोड के निवास को छोड़ने के बाद नेहरू ने इस शानदार घर को हथिया लिया, जिसे बाद में ‘तीन मूर्ति भवन’ का नाम दिया गया। अन्यों ने भी नेहरू के उदाहरण को अपनाया और बड़े व विशाल बँगलों को कब्जा लिया। ब्रिटिशों ने जान-बूझकर इन महलों और बँगलों को डिजाइन किया था, ताकि स्थानीय निवासियों को दूरस्थ दिखाया जा सके और उनका सम्मान पाया जा सके। आजाद भारत के नेताओं का उनके नक्शे-कदम पर चलने का क्या मतलब था? 

नेहरू के सचिव एम.ओ. मथाई ने इसका विरोधाभास सामने रखा— 
“10 डाउनिंग स्ट्रीट में ब्रिटिश प्रधानमंत्री निवास में उनके व्यक्तिगत उपयोग के लिए कुछेक कक्ष ही हैं। बाकी सभी कक्षों में दफ्तर हैं और कुछ एक कक्षों का तो सभी उपयोग करते हैं। समृद्ध स्वीडन के समाजवादी व लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री टेग इर्लेंडर 20 वर्षों तक तीन कमरों के फ्लैट में रहे थे। उनकी पत्नी अध्यापिका थीं। स्वीडिश सरकार ने उन्हें कार तक उपलब्ध नहीं करवाई थी। प्रधानमंत्री और उनकी पत्नी के पास एक छोटी सी कार थी, जिसे वे स्वयं चलाते थे। वे चालक रखने तक की हैसियत में नहीं थे। धनी अ‍ॉस्ट्रेलिया के लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री जोसफ शिफले अपने कार्यालय के पास दूसरे दर्जे के एक होटल में दो कमरे लेकर रहते थे। उनकी पत्नी को अपने फार्म पर रहना ही पसंद था, क्योंकि वे कैनबरा के सामाजिक भँवर में फँसना नहीं चाहती थीं। प्रधानमंत्री को कार नहीं दी गई थी। वे होटल से अपने कार्यालय तक पैदल ही आते-जाते थे।” (मैक/82-3) 

कितनी बड़ी विडंबना है! अमीर पश्चिमी देशों के गैर-गांधीवादी नेता गांधी जैसे हो रहे थे, जबकि हमारे गरीब व दयनीय और आजादी के बाद के भारत के ‘गांधीवादी’ नेता राजाओं तथा महाराजाओं के उन तौर-तरीकों को अपनाते जा रहे थे, जिनके सामंती और विशेषाधिकार प्राप्त जीवन का वे, विशेषकर नेहरू, ताउम्र विरोध करते आ रहे थे! 

नेहरू की पसंदीदा सिगरेट लाने के लिए विशेष उड़ान : मध्य प्रदेश राजभवन की वेबसाइट के अनुसार— “नेहरू की भोपाल-यात्रा के दौरान राजभवन के कर्मचारियों को याद आया कि नेहरू को पसंदीदा सिगरेट ‘555’ ब्रांड राजभवन में उपलब्ध नहीं है। खाना खाने के बाद नेहरूजी की सिगरेट पीने की आदत थी। कर्मचारियों ने तुरंत नेहरू की पसंदीदा सिगरेट का पैकेट लाने के लिए इंदौर एक विमान भेजा, जो पहले से ही इंदौर हवाई अड्डेपर तैयार रखा था। 

एस. निजलिंगप्पा ने ‘माय लाइफ ऐंड पॉलिटिक्स’ में लिखा— 
“लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने (नेहरू ने) एक खासी बड़ी इमारत 17 यॉर्क रोड को छोड़ दिया और राष्ट्रपति भवन से सटे दूसरे सबसे बड़े आधिकारिक निवास में पहुँच गए। ऐसा करने की उनकी वजह थी आवश्यक आधिकारिक गरिमा। मैं इसके बिल्कुल उलट, विएतनाम के राष्ट्रपति हो ची मिन्ह का उदाहरण देना चाहूँगा। मैंने उन्हें जब दिल्ली की यात्रा के दौरान देखा तो उनके पास सिर्फ कुछ कपड़े और दो जोड़ी सैंडल थे तथा वे एक छोटे से घर में रहते थे। लेकिन स्वतंत्र भारत में सादा जीवन एक अपवाद बन गया था। दिल्ली में अपने पूरे प्रवास के दौरान सरदार वल्लभभाई पटेल, कार्यालय सँभालने से पहले और बाद में भी, औरंगजेब रोड पर एक छोटे से घर में रहते थे, जो उनके और उनकी बेटी के लिए पर्याप्त था।” 

दुर्गा दास ने लिखा— 
“श्रीमती (विजयलक्ष्मी) पंडित (नेहरू की बहन) ने मुझे बताया, ‘मैं कभी भी अहमद (उनका वरदीधारी सेवक) के बिना यात्रा नहीं करती। अहमद को मेरे साथ देखकर आम लोगों के मेरे मंत्री होने का पता चल जाता है। वे अहमद की वरदी को सलाम करते हैं।’ नेहरू ने खुद इस बात को अच्छे से समझा था और जब वे प्रधानमंत्री बने तो कहीं भी आने-जाने पर उनके पास नौकरों और सुरक्षाकर्मियों का एक पूरा जत्था रहता था—कई बार तो वायसराय जितना।” (डी.डी./185) 

राजीव गांधी ने भी भारतीय नौसेना के ‘आई.एन.एस. विराट’ का दुरुपयोग अपने व्यक्तिगत काम के लिए किया था, जब वे अपने दोस्तों और परिजनों को लेकर 10 दिनाें की छुट्टी मनाने लक्षद्वीप गए थे (विवरण के लिए यू.आर.एल.100 देखें)। उनसे पूर्व जवाहरलाल नेहरू सन् 1950 में अपने परिवार के साथ इंडोनेशिया की यात्रा के लिए युद्धपोत ‘आई.एन.एस. दिल्ली’ का उपयोग कर चुके थे। (यू.आर.एल.100)