शकबू की गुस्ताखियां - 3

शकबू की गुस्ताखियां

प्रदीप श्रीवास्तव

भाग 3

जैसे-जैसे हिंदुस्तान की आजादी करीब आती गई। जिन्ना का दो राष्ट्र का सिद्धांत जोर पकड़ता गया। जल्द ही यह तय हो गया कि विभाजन होकर रहेगा। अब शकबू के परिवार ने फिर निर्णय लिया कि जहां वह है वह हिस्सा पाकिस्तान में जाएगा यह तय है। और हालात जैसे हैं, उससे यह भी तय है कि बड़े पैमाने पर हिंसा होगी तो क्यों ना यह स्थान समय रहते ही छोड़ दिया जाए?

इस मुद्दे पर परिवार दो हिस्सों में बंट गया। एक वो जो हर सूरत में वहां से नहीं हटना चाहता था। जो होगा देखा जाएगा की सोच लिए वहीं रहने को अडिग था। तो दूसरा गुट हर हाल में हटना चाहता था। क्योंकि उसका मानना था कि हिंदू बहुत कम हैं, वह दंगों में मारे जाएंगे। यही गुट अंततः वहां से पानीपत के पास आकर बस गया।

शकबू कहता ‘लाला देश बंट गया। खून से लथपथ आज़़ादी तो बाद में मिली। लेकिन पानीपत में आ बसे हमारे पुरखे उन्नीस सौ चालीस के करीब ही ना जाने किन परिस्थितियों में हिंदू धर्म छोड़ कर मुसलमान बन गए। इस स्थित में परिवार की दो बुजुर्ग महिलाओं ने आत्महत्या कर ली कि वह अपना धर्म नहीं छोड़ेंगी। और कुछ सदस्यों ने परिवार से नाता तोड़ लिया। कहीं और चले गए। कहां गए उनका कुछ पता नहीं कर पाया। और लाला मैं इस्लाम ग्रहण करने वाले गुट का वंशज हूं।’

बेहद उदास स्वर में एक दिन शकबू ने कहा था। ‘लाला परिवार के जिस गुट ने जिस वजह से सिंध छोड़ कर पानीपत में शरण ली थी। वही गुट मुसलमान बना, बंट गया। दो सदस्य आत्म हत्या कर लेते हैं। जो गुट सिंध में ही डटा रहा वह आज भी हिंदू है। लाला सच कहूं तो मुझे जब अपने खानदान की कहानी याद आती है ना तो मुंह से यही निकलता है कि इस पृथ्वी पर सियासत से गंदी चीज, घिनौनी चीज कोई नहीं है। हिंदुस्तान के जो टुकड़े हुए, लाखों लोगों के खून से जो यह धरती लाल हुई, इसी सियासत के कारण हुई।’

शकबू जब यह कहना शुरू करता तो गुस्से से उसका चेहरा तमतमा उठता था। कहता ‘यह देश कभी न बंटता। लाखों लोग कभी मारे ना जाते। बहू, बेटियों की इज्जत ना लूटी जाती। बच्चों का कत्लेआम ना होता। मगर सियासी खेेल ने यह सब कराया। विश्व युद्ध के बाद तो पस्त हो चुके अंग्रेज ऐसे भी कुछ सालों से ज़्यादा हिंदुस्तान को अपने कब्जे में ना रख पाते। मगर अंग्रेजों की तरह पस्त हो चुके उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुके हमारे बहुत से नेताओं में भी धैर्य खत्म हो चुका था। सत्तालोलुपता बढ़ गई थी। यही कारण था कि आनन-फानन में अंग्रेजों की साजिश समझते हुए भी देश का बंटवारा स्वीकार कर लिया गया। कत्लेआम होता है तो होने दो। हमारे सपने पूरे हों बस यही सोचा और करा गया। अहिंसा का ढिंढ़ोरा पीटने वालों को मैं इसके लिए ज़्यादा जिम्मेदार मानता हूं। लाला अगर यह ना हुआ होता तो मेरा खानदान यूं टूट-टूट कर बिखरा ना होता। लोग बेमौत ऐसे ना मरते।

लाला मेरा कलेजा तड़प रहा है पाकिस्तान जाकर उस कटास राज मंदिर के दर्शन को जिसने अंग्रेजों जैसे जालिमों से मेरे परिवार को बचाया। जिसे घिनौनी सियासत ने तबाह किया। मैं वहां जाकर अपने खानदान के बचे हुए लोगों को गले लगाना चाहता हूं कि भाई मैं तुम्हारा खून हूं। उन्हें उनकी हिम्मत की दाद देना चाहता हूं कि पाकिस्तानी सरकार, कट्टरपंथियों के तमाम जुल्मों-सितम के बाद भी तुम अपना अस्तित्व बचाए हुए हो।’ शकबू एक बार इतना भावुक हुआ कि यह सब बताते-बताते रो पड़ा। बोला ‘यार वहां के जैसे हालात हैं उससे तो नहीं लगता कि अब वो भी अपना अस्तित्व ज़्यादा दिन बचा पाएंगे। कट्टरपंथियों के जुल्म वहां बढ़ते ही जा रहे हैं। मैं सोच रहा हूं कि किसी तरह उनके पास पहुंचूं और उन्हें भारत में आकर बसने के लिए तैयार करूं।’

सन् 2005 में जब पाकिस्तानी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय दबावों, नियमों के चलते कटास राज मंदिर और उसके करीब के मंदिरों के पूरे समूह के जीर्णोद्धार का काम शुरू किया तो शुभारंभ के लिए भारत से भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को बुलाया। शकबू ने उसी समय वहां जाने की सोची। मगर ऐन वक्त पर कागज पत्रों में कोई कमी आ गई। वह नहीं जा पाया। तब उसने हफ्तों चुन-चुन कर ज़िम्मेदार लोगों को एक से एक गंदी-गंदी गालियां दीं।

मगर जिद्दी शकबू तीन महीने बाद कटास राज मंदिर गया। भरसक अपने खानदान को ढूंढ़ा। मगर निराश लौटा। आते समय मंदिर के पवित्र सरोवर का जल ले आया था। मुझे भी दिया था। कहा था ‘लाला जानते हो मुझे इस जल में अपने खानदान के लोगों के अक्स दिखते हैं।’ यह संयोग देखिए कि बाद में पाकिस्तानी सरकार ने भी आडवाणी को उस पवित्र सरोवर का पवित्र जल भेजा था। शकबू ने बड़ा दुख व्यक्त किया था वहां के अल्पसंख्यकों और उनके पूजा स्थानों की दयनीय हालत पर। उन पर होने वाले बर्बर अत्याचारों पर। इसके लिए वह पूरी तरह से सियासतदानों, मज़हबी धर्मांधों को दोषी ठहराता।

मेरा शकबू एक ऐसा इंसान था जो सामने वाले को एक लापरवाह, मस्तमौला मुंह फट इंसान दिखता। लेकिन सच में वह अंदर-अंदर चिंतन मनन मंथन करने वाला व्यक्ति था। वह तमाम मुद्दों पर आए दिन कुछ न कुछ ऐसी बातें कहता जो गहन चिंतन मनन के बाद ही हो सकती थीं। पाकिस्तान से लौटने के महीने भर बाद एक दिन उसने कहा ‘लाला सियासती चालों ने हिंदुस्तान को कितना सिकोड़ दिया है। पाकिस्तान, बंगलादेश बन गए। अंग्रेजों, अन्य बहुतों ने सियासत ने हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन को लड़ा-भिड़ा कर अलग कर रखा है। अगर इन सबको जोड़ दो तो मुझे लगता है विश्व में सब से बड़ी संख्या हिंदुओं की है।’

फिर एक दिन बोला कि ‘जो लोग यह कहते, सोचते हैं कि शिक्षा के विस्तार के साथ आतंकवाद समाप्त हो जाएगा वो मूर्ख हैं। सही मायने में जाहिल हैं।’ फिर तमाम वैश्विक आतंकी घटनाओं का ब्यौरा रख कर बोला ‘इन घटनाओं को अंजाम देने वाले अधिकांश पढे़-लिखे थे। वास्तव में जब तक यह भावना रहेगी दुनिया के किसी भी धर्म में कि मेरा धर्म श्रेष्ठ है। इसको मानने वाले को ही जीने का हक है। तब तक दुनिया से अशांति, जंग, आतंक खत्म नहीं होगा।’ मैं कहता ‘इतना सोचते हो तो आगे बढ़कर दुनिया बदल डालने की कोशिश क्यों नहीं करते?’ तो हंस कर कहता। ‘लाला अपनी क्षमता जानता हूं। तथ्य यह है कि मैं चिंतन मनन कर सकता हूं लेकिन जहां तक बदलने का सवाल है, मैं दुनिया तो क्या अपना मोहल्ला, अपना परिवार बदलने की भी क्षमता नहीं रखता।’

ऐसा बेबाक शकबू अपनी नई बेगम शाहीन को लाने के कुछ महीनेां बाद ही मुझे टूटता हुआ दिखा। पस्त और हारता दिखा। दो महीना भी पूरा नहीं हुआ था कि एक दिन बोला ‘लाला कुछ समझ नहीं पा रहा हूं कि शाहीन को लाकर गलत किया या कि सही।’ मैंने कहा ‘ऐसा सोचने की जरूरत क्यों पड़ी? अब तो तौफीक तुमसे और शाहीन से अच्छे से पेश आने लगा है। शाहीन से तो वह इतना घुल-मिल गया है कि लगता ही नहीं कि यह वही व्यक्ति है जो कुछ महीने पहले उस महिला को देखना भी नहीं चाहता था। यह तो तुम बता ही चुके हो।’ तो शकबू बोला। ‘हां कहा तो था, सही ही कहा था। लेकिन यार मुझे अब जो चीज परेशान कर रही है वह है शाहीन का विहैवियर। जो इन दिनों खुलकर सामने आ गया है।’ मैंने कहा ‘उसके व्यवहार में ऐसा क्या हो गया कि तुम्हारे जैसा आदमी चार दिन में इतना चिंता में पड़ गया।’

शकबू बोला ‘लाला असल में मुझे लगता है इस उम्र में शाहीन को लाकर मैंने गलती कर दी। और शाहीन को कहूंगा कि उसने मेरे जैसे उम्रदराज आदमी से एक जवान की अपेक्षा करके मूर्खता की। तुम जब मना करते थे कि यह कदम ना उठाओ। वह एक युवती है। गर्म खून है। एक दहकती भट्टी है। शांत नहीं कर पाओगे उसकी आग। तो नहीं सुनता था तुम्हारी बात। आंख, नाक, कान, सब तो उसकी बदन की तपिश ने बंद कर दिए थे।

तुम्हारी बात सच निकल रही है। वह तुम्हारे अनुमान से कहीं ज़्यादा धधकती हुई है। इतना ही नहीं अपनी आग शांत करने के लिए एक तरह से मुझसे ज्यादती भी करती है। फिर भी शांत नहीं होती। वह एक जलजले की तरह टूट पड़ती है। मुझे डर लगता है कि कहीं कोई रात! रात ही क्यों कोई भी दिन मेरे साथ किसी हादसे का दिन ना बन जाए। जब टोकता हूं तो बड़ी बेशर्मी से लड़ पड़ती है कि एक जवान लड़की की तरफ कदम बढ़ाते वक्त सोचा नहीं था। मैं जवाब देता हूं तो तुमने क्यों नहीं सोचा एक बूढ़े व्यक्ति की तरफ कदम बढ़ाते हुए। यह सुनते ही और भड़क जाती है। कहती है यह काम तुम्हारा था मेरा नहीं।

अभी दो दिन पहले ही सारी प्रॉपर्टी अपने नाम लिखने को कह दिया। लाला मैं वाकई में उसके सामने पस्त हो जाता हूं। आगे का रास्ता बड़ा बेढब नजर आ रहा है।’ इसके बाद शकबू जब भी बात करता शाहीन की ही बात करता। निकाह से पहले जहां उसको लेकर तमाम फूहड़ अश्लील बातें करता था। वहीं अब उसके कारण हो रही तकलीफों की बातें करता। और शाजिया को बीच में जरूर लाता। कि ‘वह बेमिसाल थी। वैसी नेक दिल औरत शायद ही कोई हो। ना जाने तब कौन सा शैतान हावी हो गया था मुझ पर कि उसकी कदर ना की। ऐसा जख्म दिया कि मर गई।’

कुछ ही दिन बीते होंगे कि शकबू मिलने के लिए घर आया। कुछ ही देर में यह कह कर मेरे होश उड़ा दिए कि तौफीक और शाहीन के बीच संबंध हैं। मैंने चौंक कर कहा ‘शकबू क्या पागलपन है। तुम वाकई सठिया गए हो। यह कहते हुए तुम्हें संकोच नहीं हुआ। अरे कुछ तो शर्म करो। रिश्ते का कुछ तो ख्याल रखो।’ इस पर वह गंभीर होकर बोला, ‘मैं जानता था कि तुम भी यकीन नहीं करोगे। जब तुम नहीं सुन पा रहे हो तो और कौन है मेरा सुनने वाला? तुम तो शाजिया से भी पहले मेरे सुख-दुख के साथी रहे हो। लेकिन आज तुम भी यकीन नहीं कर पा रहे हो। वाकई अब मैं सचमुच अकेला हो गया हूं इस दुनिया में। अब यह दुनिया मेरे लिए नहीं है। चलता हूं लाला... अब तक जो कहा सुना हो माफ करना।’ यह कहते-कहते शकबू की आंखें भर आई थीं।

वह कुर्सी से उठने को हुआ तो मैंने उसे फिर बैठा दिया। मैं भी भावुक हो गया था। मेरी भी आंखें नम हो गईं थी। मैंने कहा ‘कैसी बात करते हो शकबू। जीते जी तुम्हें छोड़ने की सोच भी नहीं सकता। दुबारा यह कभी न कहना, सोचना भी नहीं। मगर तुम जो कह रहे हो यह भी तो हो सकता है कि वह तुम्हारा वहम हो।’इस पर शकबू ने कई ऐसी बातें बताईं जो उसके शक को पुख्ता कर रही थीं। मगर मैं फिर भी यकीन नहीं कर पा रहा था। शकबू को किसी तरह समझा-बुझा कर घर भेजा कि यकीन करो कि ऐसा कुछ नहीं होगा। इसके दस-बारह दिन बाद ही एक दिन सवेरे-सवेरे शकबू का फ़ोन आया कि ‘तबियत बहुत खराब है। डॉक्टर के यहां चलना है। यहां किससे कहूं कोई सीधे मुंह बात नहीं कर रहा।’

मैं ड्राइवर लेकर पहूंचा तो देखा तौफीक था नहीं, शाहीन कुछ काम से कह कर घंटे भर पहले निकल गई थी। वह पी. एच. डी. कर रही थी। अपनी थीसिस पूरी करने में लगी थी। शकबू यही बताता था। उसने रास्ते में यह भी बताया कि ‘शाहीन पिछले दस दिन से उसके साथ कमरे में नहीं सो रही है। साथ ही यह भी जोड़ा कि दिन हो या रात तौफीक, शाहीन की हंसी, ठिठोली यहां तक की छीना-झपटी भी चलती रहती है। लगता है जैसे नवविवाहित जोड़ा है। उसे इस तरह इग्नोर करते हैं जैसे वह वहां है ही नहीं।’ मैं उसकी बातें सुन-सुन कर परेशान होता रहता कि आखिर अपने मित्र का दुःख दूर कैसे करूं? मगर जैसे शकबू के लिए इतना ही दुख काफी नहीं था।

डॉक्टर ने किडनी, लीवर में गंभीर समस्या बता दी। इतनी गंभीर कि जान को खतरा है। और ट्रीटमेंट पी.जी.आई. में ही संभव है। तौफीक, शाहीन को खबर कर दी थी लेकिन मैं डॉक्टर से शकबू का चेकप करवा कर घर पहुंच गया मगर वह दोनों घंटे भर बाद पहुंचे। मैंने उन दोनों को शकबू की बीमारी के बारे में बताया तो शाहीन बड़ी लापरवाही से बोली थी ‘अरे प्राइवेट डॉक्टर ऐसे ही बढ़ा-चढ़ा कर बोलते हैं। मुझे कोई बड़ी प्रॉब्लम नहीं दिखती।’

लेकिन मेरे और शकबू के प्रेशर में उसे पी.जी.आई. में दिखाया गया। शक सही था बीमारी बेहद गंभीर हो चुकी थी। बड़े सोर्स के बाद पांचवें दिन भर्ती किया गया। वहां दो महीने ट्रीटमेंट के बाद शकबू ठीक हुआ था। हॉस्पिटल में मैं उसे देखने रोज जाता था। बिना नागा। लेकिन तौफीक, शाहीन कई बार ऐसा भी हुआ कि पहुंचे ही नहीं। कई बार मेरे बेटे ने परिवार के एक सदस्य के वहां होने की भूमिका पूरी की।

शकबू जब ठीक होकर घर पहुंचा तो बहुत कमजोर था।

अब मुझे शाहीन से कोई उम्मीद नहीं थी। उसका शकबू को लेकर बेरूखापन अब मैं भी साफ देख रहा था। शकबू ने मेरी सलाह पर एक नौकर रख लिया। जो उसकी देखभाल कर सके। देखते-देखते तीन महीने निकल गए, शकबू पूरी तरह ठीक हो गया। मगर फिर भी उसे पूरी देखभाल की जरूरत थी। इस बीच मैंने देखा कि तौफीक और शाहीन को मेरा वहां जाना अच्छा नहीं लग रहा है। उनकी बेरूखी जब ज्यादा हो गई तो मैंने जाना कम कर दिया।

फ़ोन पर शकबू के संपर्क में रहता। उससे यह सब बात नहीं बताई कि वह और दुखी होगा। ना जाने की वजह बताते हुए उसे कुछ ना कुछ बहाना बना देता था। जल्दी ही शकबू हालात से इतना हार गया कि फोन पर रो देता। मेरा मन उसका रोना सुनकर तड़प उठता। उसके आंसुओें की रोज-रोज एक ही वजह थी शाहीन। शकबू रोज उसकी एक-एक हरकत बताता।

कहता ‘अपनी आंखों से कुकर्म का यह नंगा नाच देखने से अच्छा है कि मैं मर जाऊं। अब बर्दाश्त नहीं होता। दोनों की बेशर्मी इस हद तक बढ़ गई है कि मेरी कोई परवाह ही नहीं। कई बार तो ऐसा लगता है जैसे मुझे चिढ़ा-चिढ़ा कर, दिखा-दिखा कर सब किया जा रहा है।'

शकबू कहता कि ‘तौफीक तो लगता है जैसे मुझसे बदला ले रहा है।’ शकबू की तकलीफ से मेरा तन-मन खौल उठता। मन करता जाऊं और सारे फसाद की जड़ उस चुड़ैल को बालों से पकड़ कर खींचते हुए बाहर फेंक दूं। जब बात चलती तो सुगंधा भी उसे कोसती। शकबू शाहीन के बीच मधुर संबंधों की कुल मियाद मात्र दो महीने रही। उसके बाद उनके बीच छत्तीस का आंकड़ा चलता रहा। एक दिन सुबह सुगंधा के साथ बैठा चाय पी रहा था कि तभी शकबू का फोन आया, नंबर उसका था लेकिन बात उसका नौकर दानिश कर रहा था। उसने हांफते हुए कहा ‘साहब जीने से गिर गए हैं। उनकी हालत बहुत गंभीर है।’

मैंने कहा तुरंत आ रहा हूं। उसकी आवाज से मैं समझ गया था कि मामला बेहद गंभीर है। पहुंचा तो देखा खून से सने कपड़ों को पहने शकबू बेड पर पड़ा है। डॉक्टर मरहम पट्टी करके उन्हें हॉस्पिटल ले जाने को कह रहा था। शकबू होश में था। मुझे देखते ही उसकी आंखों से आंसू झरने लगे। उसने बड़े अस्पष्ट शब्दों में कुछ कहा जिसका आशय समझते ही मेरा खून खौल उठा। मैंने जलती नजर तौफीक और शाहीन पर डाली। लेकिन स्थिति की नजाकत को देखते हुए किसी तरह खुद को रोका क्योंकि तब शकबू को हॉस्पिटल पहुंचाना पहला जरूरी काम था। शकबू को लेकर ट्रामा सेंटर पहुंचे।

मेरा जिंदादिल, मेरे बचपन का यार, दुनिया के बड़े-बड़े लोगों पर जीत हासिल करने वाला अपनी नामुराद औलाद, बेगम के छल-कपट, व्यभिचार के आगे परास्त हो गया। ट्रामा सेंटर से बीस घंटे बाद उसका शरीर उसके घर लाया गया। जो सही मायने में घर कहां मकान रह गया था। घर के नहीं मकान के खूबसूरत लॉन में अपने यार को एक सफेद कफन ओढे़ लेटा देखकर मेरा मन, दिल चीत्कार कर उठा। लाख रोकने के बावजूद आंसू बह चले। मेरा यार कमीनी औलाद के चलते आखिर में मुझसे अपनी बात भी ठीक से कह नहीं पाया था।

मन में आया कि पुलिस को सच बताकर दोनों नामुरादों को उनके किए की सजा दूं। पहुंचा दूँ फांसी के फंदे पर। अपने यार के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए फिर से पहन लूं अपना वह काला लाबादा और जज से कहूं कि यही दोनों हैं मेरे यार के कातिल। मैं हूं चश्मदीद गवाह, ये दफा तीन सौ दो के अपराधी हैं। इन्हें मौत की सजा दीजिए। यह एक रेयर ऑफ रेयरेस्ट केस है। यह लोगों के लिए एक नजीर बनना चाहिए। मगर ठहर गया यह सोचकर कि दुनिया में अपने यार की थुक्का-फजीहत नहीं कराऊंगा। यह कराने से अब मेरा शकबू लौट तो आएगा नहीं। पोस्टमार्टम अलग होगा। यार की मिट्टी नहीं खराब कराऊंगा। दिल पर पत्थर रख कर अपने प्यारे शकबू को सुपुर्दे खाक किया। फिर लौट कर उसके घर की तरफ कभी रुख नहीं किया।

आज होटल का यह विज्ञापन देख कर। उसकी पंद्रहवीं मंजिल के स्विमिंग पूल को देखकर कभी इसी शहर के एक होटल में बिताई एक रात याद आ गई। जब हम दोनों यार अपनी बेगमों के साथ शादी के कुछ महीनें के बाद की एक रात जी रहे थे। शकबू होता तो निश्चित ही यह ऐड देखकर फोन करता कि ‘लाला क्या ख़याल है इस रूफ टॉप स्विमिंग पूल के बारे में। लाला कुछ तो होना ही चाहिए।’ फिर ठठा कर हंस पड़ता। सुगंधा मेरी आदत को जानते हुए फिर एक कप ऑर्गेनिक टी लिए हुए आई। मगर मन इतना कषैला हो गया था कि मैंने चाय पीने से मना कर दिया। काश शकबू में भी कुछ चीजों को मना करने की आदत होती।

समाप्त

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Yogini 6 महीना पहले

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Sunhera Noorani 6 महीना पहले

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Bhanu Pratap Singh Sikarwar 6 महीना पहले

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